आज के नक्सलवाद से कितना अलग था 'Naxal Movement'? जानें नक्सलबाड़ी की दीपू हल्दर की जुबानी पूरी कहानी
Gaon Connection | Apr 18, 2026, 18:43 IST
नक्सलबाड़ी आंदोलन का आरंभ एक गहरी जमीनी और अधिकार की लड़ाई से हुआ था। दीपू हलदर बताती हैं कि यह हक का संघर्ष था जो किसानों और मजदूरों के लिए खड़ा हुआ। 1967 में जब गोलीकांड हुआ, तब यह आंदोलन और भी तीव्र हो गया। जमींदारों के शोषण के खिलाफ एक शक्तिशाली आवाज के रूप में सामने आया।
नक्सलबाड़ी के बारे में जानकारी देतीं दीपू हलदर
आज देश में जब भी नक्सलवाद की बात होती है, तो अक्सर उसकी तस्वीर हिंसा, मुठभेड़ों और सुरक्षा चुनौतियों के रूप में सामने आती है। लेकिन क्या यही वह आंदोलन था, जिसकी शुरुआत 1967 में नक्सलबाड़ी की जमीन से हुई थी? ' कानू सान्याल के साथ लंबे समय तक काम कर चुकीं दीपू हल्दर ने 'गाँव कनेक्शन' को बताया कि असल नक्सलबाड़ी आंदोलन दरअसल जमीन और अधिकार की लड़ाई थी, जिसे बाद में अलग रूप में पेश किया गया। उनके मुताबिक, उस दौर का आंदोलन किसानों, मजदूरों और आम लोगों के हक की लड़ाई पर आधारित था, जबकि आज जो नक्सलवाद दिखता है, वह उस मूल विचारधारा से काफी अलग हो चुका है। नक्सलबाड़ी की जमीन पर आज भी उस आंदोलन के निशान मौजूद हैं, जो याद दिलाते हैं कि इसकी शुरुआत किन हालात और सोच के साथ हुई थी।
दीपू हल्दर बताती हैं कि 24 मई 1967 को झाड़ू जोत इलाके में पुलिस कार्रवाई के दौरान किसानों और मजदूरों ने विरोध किया और हालात हिंसक हो गए। एक तीर लगने से पुलिस इंस्पेक्टर सोनम वांगदी की मौत हो गई, जिसके बाद आंदोलन ने तेज रूप लिया। अगले ही दिन, 25 मई को प्रसाद जोत में महिलाओं की बैठक के दौरान पुलिस पहुंची, जहां महिलाओं ने पुलिस की राइफल छीनकर सवाल किया कि वे वहां क्यों आए हैं। हालांकि पुलिस ने बाद में लौटते समय अंधाधुंध फायरिंग की, जिसमें दो बच्चों समेत 11 लोग मारे गए। यही घटना नक्सलबाड़ी आंदोलन के बड़े विस्फोट का कारण बनी और 25 मई को आज भी शहीद दिवस के रूप में याद किया जाता है।
दीपू हल्दर के मुताबिक, उस समय बटाईदार किसानों की हालत बेहद खराब थी। जमींदार पूरा धान अपने पास रख लेते थे और किसानों के हिस्से में कुछ नहीं आता था। कर्ज इतना ज्यादा था कि वह पीढ़ियों तक चलता था और कभी खत्म नहीं होता था। इसी शोषण के खिलाफ गुस्सा धीरे-धीरे बढ़ा और किसानों ने अपने हक के लिए आवाज उठानी शुरू की। कानू सान्याल, चारू मजूमदार और जंगल संथाल जैसे नेताओं ने इस आंदोलन को दिशा दी और किसानों को संगठित किया।
दीपू हल्दर का कहना है कि “नक्सलवाद” नाम की कोई अलग विचारधारा नहीं है। उनके अनुसार, यह आंदोलन असल में मार्क्सवाद, लेनिनवाद और माओ के सिद्धांतों से प्रेरित था, लेकिन बाद में इसे एक अलग नाम देकर पेश किया गया। वे कहती हैं कि इस आंदोलन की असली ताकत जनता और जन संगठनों में थी—“जैसे मछली पानी के बिना नहीं रह सकती, वैसे ही कोई भी संगठन जन आधार के बिना नहीं टिक सकता।”
दीपू हल्दर बताती हैं कि आंदोलन के भीतर ही दो अलग सोच उभर आई थीं। चारू मजूमदार का मानना था कि छोटे-छोटे हथियारबंद समूह बनाकर रात में पुलिस और जमींदारों पर हमला किया जाए। जबकि कानू सान्याल का कहना था कि यह रास्ता जनता से दूरी बना देगा और आंदोलन को कमजोर करेगा। उनका जोर था कि किसानों और आम लोगों को साथ लेकर ही आंदोलन आगे बढ़ सकता है। यही मतभेद आगे चलकर आंदोलन के अलग-अलग रूपों की वजह बना।
दीपू हल्दर साफ कहती हैं कि आज बस्तर या झारखंड में जो नक्सल गतिविधियां देखने को मिलती हैं, वे नक्सलबाड़ी की मूल भावना से काफी अलग हैं। उनके मुताबिक, आज की गतिविधियों में वह जन आधार और वैचारिक स्पष्टता नहीं दिखती, जो शुरुआत में थी। नक्सलबाड़ी आंदोलन किसानों के अधिकारों की लड़ाई था, जबकि आज इसे एक अलग ही रूप में देखा और समझा जाता है। उनके अनुसार, यह फर्क समझना जरूरी है, ताकि इतिहास और वर्तमान के बीच सही तुलना की जा सके।