मध्य प्रदेशः डेंगू और वायरल बुखार के मामले बढ़ते ही सीधी में झोलाछाप डॉक्टरों के पास पहुंच रहे लोग

मध्य प्रदेश में अब तक कम से कम 2,500 डेंगू के मामले सामने आ चुके हैं। और इधर वायरल बुखार के मामले भी तेजी से बढ़े हैं। ऐसे में सीधी जिले के लोग ग्रामीण स्वास्थ्य ढांचे के न होने की शिकायत कर रहे हैं। वे इलाज के लिए बंगाली या फिर झोलाछाप डॉक्टरों के पास जा रहे हैं। स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की शिकायत है कि ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्र जर्जर हैं और केविड-19 की दूसरी लहर से कोई सबक नहीं सीखा गया है।

Anil TiwariAnil Tiwari   22 Sep 2021 6:57 AM GMT

मुगवारी (सीधी), मध्य प्रदेश। जंगली कहार की पत्नी और उनके छोटे बेटे को पिछले कई दिनों से तेज बुखार है। हालांकि, मुगवारी गांव का यह दिहाड़ी मजदूर अभी तक उन्हें जांच और दवा के लिए अस्पताल लेकर नहीं गया है।

कहार ने गांव कनेक्शन को बताया, "सब लडकियां बच्चा बीमार हैं। मेरे परिवार के सभी लोगों की तबियत खराब है। छोटे बेटे और उसकी मां का अभी तक बुखार नहीं उतरा है। मैं उन्हें प्राइवेट डॉक्टर 'बंगालीवा' के पास ले गया था। उन्होंने कुछ दवाएं दीं है लेकिन उनकी स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ है।" वह थोड़ा अफसोस के साथ कहते हैं, " मैं गरीब आदमी हूं। अपनी पत्नी और बेटे को सीधी में अस्पताल नहीं ले जा सकता। वह यहां से नौ किलोमीटर दूर है।" कान्हर दिहाड़ी मजदूर हैं और जी-तोड़ मेहनत के बावजूद एक दिन में 150 से 200 रुपये से ज्यादा नहीं कमा पाते हैं।

मध्य प्रदेश में सीधी जिले के मुगवारी गांव में कहार के परिवार की तरह, गांव के कई लोग तेज बुखार से जूझ रहे हैं। कहार के मोहल्ले में 15 घर हैं। पिछले 10 दिनों में, इनमें से कम से कम 30 लोगों को 'बुखार' और बुखार से जुड़ी अन्य बीमारियां होने की जानकारी मिली है।


सीधी में ग्रामीण, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (PHC) या जिला अस्पताल में इलाज करवाने नहीं जाते हैं। इसकी बजाय वे बंगालीवा पर भरोसा करते हैं। गांव में स्थानीय भाषा में झोला छाप डॉक्टरों को बंगालीवा कहा जाता है। अक्सर, बंगालीवा जो भी दवा देते हैं उससे कुछ आराम मिल जाता है। ग्रामीणों के अनुसार, उनके पास कोई अन्य विकल्प नहीं है। क्योंकि गांव में सरकारी ग्रामीण स्वास्थ्य बुनियादी ढांचा है ही नहीं।

गांवों में घर-घर में फैले तेज बुखार और उसका ढंग से इलाज न करवाने की खबरें चिंताजनक हैं। मध्य प्रदेश में डेंगू के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, राज्य में डेंगू के कम से कम 2,500 मामलों की पुष्टि की गई है। और मच्छर जनित बीमारी से कम से कम पांच लोगों की मौत हुई है।


13 सितंबर को, जबलपुर में डेंगू के 498 मामले सामने आए थे। राज्य का यह सबसे अधिक प्रभावित जिला है। राज्य की राजधानी भोपाल से ऐसे 254 मामलों की पुष्टि हुई है तो वहीं इंदौर में 225 डेंगू के मामले सामने आए हैं।

मध्य प्रदेश में डेंगू के बढ़ते मामलों पर केंद्र सरकार की नजर है। हाल ही में केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव ने डेंगू बुखार और होने वाली मौतों पर मध्य प्रदेश सहित 11 राज्यों को पत्र लिखा है। जिसमें आंध्र प्रदेश, गुजरात, कर्नाटक, केरल, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, ओडिशा, राजस्थान, तमिलनाडु और तेलंगाना शामिल हैं।

ग्रामीण स्वास्थ्य प्रणाली, जो अभी-अभी कोविड-19 महामारी की दूसरी लहर के हमले से उबरी है, एक बार फिर बढ़ते 'बुखार' और अन्य वेक्टर जनित बीमारियों से बोझिल हो रही है।


सीधी के मुख्य चिकित्सा स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) आईजी गुप्ता ने गांव कनेक्शन को बताया, "यह सच है कि वायरल बुखार के मामले बढ़ रहे हैं। अस्पतालों में भर्ती मरीजों की संख्या क्षमता से अधिक है। बेड खाली नहीं हैं जिसके चलते हमें फर्श पर मरीजों का इलाज करना पड़ रहा है। "

झोलाछाप डाक्टरों से इलाज कराना मजबूरी

वायरल बुखार की चपेट में आए मुगवारी गांव के स्थानीय निवासियों की शिकायत कि यहां प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र तो है, लेकिन सिर्फ कागजों पर। इसलिए उन्हें सभी बीमारियों के इलाज के लिए बंगालीवा पर ही निर्भर रहना पड़ता है।

मुगवारी गांव के रामपाल रावत रिक्शा चलाते हैं। उन्होंने गांव कनेक्शन को बताया, "स्वास्थ्य केंद्र में कभी कोई डॉक्टर होता ही नहीं है। कोई डॉक्टर-वॉक्टर नहीं आता वहां (कोई डॉक्टर नहीं आता है)।" वह आगे कहते हैं, "जब भी कोई बीमार होता है, तो हम उसे इलाज के लिए अपने गांव से तीन किलोमीटर दूर बंगालीवा के पास ले जाते हैं। सबसे पास वाला सरकारी अस्पताल तो यहां से नौ किलोमीटर दूर है।"


इसी गांव के रामशिरोमणि रावत के घर में भी कई लोगों को बुखार था। वह उन्हें बंगालीवा के पास ले गए थे। जब गांव कनेक्शन ने उनसे पूछा कि क्या उनके गांव में स्वास्थ्य केंद्र काम करता है और वहां कोई डॉक्टर है? उन्होंने कहा, "कभी नहीं।"

फूलमती कान्हर को भी 'बुखार' है। उन्होंने गांव कनेक्शन को बताया कि स्थानीय झोलाछाप 'डॉक्टर' बंगालीवा ने उन्हें कुछ दवाएं दी थीं। लेकिन उनकी हालत में ज्यादा सुधार नहीं है। वह कहती हैं, "मुझे जिला अस्पताल जाना है लेकिन वह यहां से नौ किलोमीटर दूर है। बंगालीवा से दवा लेने के अलावा दूसरा कोई रास्ता नहीं है। "

मुगवारी में ही शुभम सिंह के परिवार के तीन सदस्यों को पिछले कुछ दिनों से तेज बुखार है। लेकिन अभी तक उन्हें कोई ढ़ंग का इलाज नहीं मिला है। सिंह गांव कनेक्शन से कहते हैं, "हम उन्हें बंगाली डाक्टर के पास ले गए। उसने कुछ दवाएं भी दीं । लेकिन वे अभी भी पूरी तरह से ठीक नहीं हैं। अब इन सभी को एक या दो दिन में सीधी अस्पताल लेकर जाएंगे। "


मुगवारी में जो बुखार फैला है, वह सामान्य वायरल बुखार नहीं हो सकता है। मुगवारी गांव की आशा (मान्यता प्राप्त सामाजिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता) ने गांव कनेक्शन को बताया कि लगभग 400 लोगों की आबादी में तकरीबन 30-40 लोगों में डेंगू जैसे लक्षण नजर आ रहे थे।

'बंगालीवा' – से इलाज कराना सस्ता

रामपाल रावत ने गांव कनेक्शन को बताया, "बंगालीवा चेकअप के लिए बीस रुपए (बीस रुपए) चार्ज करते हैं। और उनकी दवाएं भी ज्यादा महंगी नहीं होतीं। लेकिन बड़े अस्पताल में चेकअप के लिए 200 से 500 रुपए ले लेते हैं और वहां की दवा काफी महंगी होती है।"

वह बताते हैं, "कभी-कभी, बंगालीवा की दवाएं उल्टा असर कर देती है। हमें साइड-इफेक्ट्स भी हो जाते है। लेकिन यह जोखिम तो लेना ही पड़ेगा। हमारे पास निजी अस्पतालों में इलाज कराने के लिए पैसे नहीं हैं।"


अत्यधिक गरीबी, ग्रामीण स्वास्थ्य सुविधाओं की बदहाली और शिक्षा की कमी तो एक कारण है ही मगर इसके साथ-साथ ग्रामीणों के उनके मन में फैला अंधविश्वास भी उन्हें सरकारी और निजी अस्पतालों में जाने से रोकता है। और वे काला जादू करने वाले झोलाछाप डॉक्टरों पर ज्यादा विश्वास करने लगते हैं।

56 साल के रामशिरोमणि रावत, रामपाल के पड़ोसी हैं। ओझा (जादु टोना करने वाले बाबा) पर उन्हें पूरा विश्वास है। वह उसके कट्टर आस्तिक हैं। बड़ी खुशी के साथ वह गांव कनेक्शन को बताते है, "जब भूत लगता है तो डॉक्टर के पास जाने से ठीक नहीं होगा। बाबा ही ठीक करते हैं।'

दूसरी लहर से कोई सबक नहीं सीखा?

गांव कनेक्शन ने प्रभावित गांवो का दौरा किया तो पता चला कि मडवा और तेदवा टोला गांवों के साथ मुगवारी को स्वास्थ्य सेवा उपलब्ध करवाने वाले उप-स्वास्थ्य केंद्र में कोई डॉक्टर नहीं था। यह पद काफी समय से खाली पड़ा है। दो हजार से ज्यादा ग्रामीणों की सेवा के लिए डिज़ाइन किए गए इस स्वास्थ्य केंद्र को एक नर्स चला रही है। ग्रामीणों ने शिकायत करते हुए कहा कि वह नर्स भी कभी-कभार ही केंद्र में आती है।

स्वास्थ्य कार्यकर्ता और जबलपुर उच्च न्यायालय में प्रैक्टिस करने वाले रीवा के वकील नित्यानंद मिश्रा ने गांव कनेक्शन को बताया कि कोविड की दूसरी लहर के दौरान ग्रामीण भारत में जो कुछ भी हुआ, उस दर्दनाक अनुभव को भुला दिया गया है। ग्रामीण स्वास्थ्य प्रणाली को मजबूत नहीं किया गया है।


स्वास्थ्य कार्यकर्ता ने कहा, "बुनियादी ढांचे की कमी डॉक्टरों को सीधी में रहने से रोकती है। वे ग्रामीण क्षेत्रों, यहां तक कि जिला अस्पताल में भी जाने के लिए तैयार नहीं होते हैं क्योंकि उनके रहने की कोई ढ़ंग की व्यवस्था नहीं की जाती है।"

मिश्रा बताते हैं, "स्वास्थ्य विभाग में कई पद खाली पड़े हैं। सरकार उन्हें भरने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखा रही है। दूसरी लहर के दौरान, स्वास्थ्य विभाग ने अनुबंध के आधार पर काफी लोगों को काम पर रखा था और अब जब कोविड नियंत्रण में है, तो उन सभी को बर्खास्त कर दिया गया। "

स्वास्थ्य कर्मियों ने मध्य प्रदेश में डेंगू और बुखार दोनों के मामले बढ़ने की चेतावनी दी हैं।

सीधी जिला अस्पताल के एक डॉक्टर ने नाम न बताने की शर्त पर कहा, "पिछले महीने से मरीजों की संख्या दोगुनी हो गई है। अस्पताल प्रशासन इलाज के लिए प्रयासरत है, लेकिन चिकित्सकों और बिस्तरों की कमी के कारण सभी का इलाज नहीं हो पा रहा है।"


राधाकिशन गुप्ता एक निजी चिकित्सक हैं, जो मुगवारी से लगभग 1.5 किलोमीटर दूर कुचवाही गांव में एक क्लिनिक चलाते हैं। उन्होंने गांव कनेक्शन को बताया कि पिछले कुछ हफ्तों में बुखार के मरीजों की संख्या में अचानक से काफी तेजी आई है।

वह कहते हैं, "पहले, मैं रोजाना 10 से 15 लोगों को देखा करता था, लेकिन अब औसतन 30 से 40 लोग इलाज के लिए आते हैं। उनमें से ज्यादातर वायरल बुखार से पीड़ित हैं।


सरकार की प्रतिक्रिया

इस बीच सीधी में डेंगू की रोकथाम के प्रयास चल रहे हैं। जिले के मलेरिया अधिकारी हरिओम सिंह ने गांव कनेक्शन को बताया कि जिले में अब तक डेंगू के तीन मामलों की पुष्टि हो चुकी है।

उन्होंने कहा, "हम चीजों पर नजर रख रहे हैं और जरुरत पड़ने पर खून की जांच भी की जाएगी। डेंगू के मच्छर साफ पानी जैसे टायर, कूलर और खुले टैंकरों में छोड़े गए पानी में पैदा होते हैं। यह लोगों की जिम्मेदारी है कि वे खुले में पानी न इकट्ठा होने दें।"

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