छोटे किसानों के लिए फायदेमंद होगी देसी मुर्गी पालन की नई तकनीक

केंद्रीय पक्षी अनुसंधान संस्थान और भारतीय पशुचिकित्सा अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिकों ने 'गिरीग्राम तकनीक पार्क' मॉडल तैयार किया है। इसमें मुर्गियों के खाने में बरसीम, केंचुआ और मोरिंगा दिया जाता है

Divendra SinghDivendra Singh   27 Jan 2020 11:26 AM GMT

बरेली (उत्तर प्रदेश)। मुर्गीपालन में सबसे ज्यादा फीड पर खर्च होता है, इस मॉडल से एक एकड़ में मुर्गी पालन करने से मुर्गियों के फीड का खर्च सत्तर फीसदी तक कम किया जा सकता है। छोटे किसानों के लिए यह मॉडल कमाई का बेहतर जरिया बन सकता है।

केंद्रीय पक्षी अनुसंधान संस्थान और भारतीय पशुचिकित्सा अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिकों ने 'गिरीग्राम तकनीक पार्क' मॉडल तैयार किया है। इसमें मुर्गियों के खाने में बरसीम, केंचुआ और मोरिंगा दिया जाता है। इस मॉडल के बारे में केंद्रीय पक्षी अनुसंधान संस्थान के निदेशक डॉ. वीके सक्सेना बताते हैं, "मुर्गी पालन देश में दो तरीके से हो रहा है, एक तो बैकायार्ड में और दूसरा व्यवसायिक तरीके से। एक बार फिर से बैकयार्ड पोल्ट्री फार्मिंग को बढ़ावा मिल रहा है, इस समय देश में तीस प्रतिशत बैकयार्ड मुर्गी पालन हो रहा है। इसमें कई तरीके के मॉडल बनाने की कोशिश की गई, बैकयार्ड मुर्गी पालन करने वालों को कम से कम लागत में पोल्ट्री के लिए घर तैयार कर सकें। आसानी से मिलने वाले सामान जैसे, बांस और पराली से घर बनाएं जा सकें। केंद्रीय मंत्री गिरीराज सिंह का भी यही मानना था कि इस तरह का कोई सिस्टम विकसित किया जाए। बस उन्हीं के प्रेरणा से हमने इस मॉडल की शुरूआत की है।"

क्या है 'गिरीग्राम तकनीक पार्क'

गिरीग्राम तकनीक पार्क' मॉडल के बारे में निदेशक डॉ. वीके सक्सेना कहते हैं, "हमने एक एकड़ क्षेत्र में इस मॉडल को बनाया है, इसमें हमने तीन तरह के मैटेरियल से घर बनाएं हैं। आगे चलकर हम यह भी देखेंगे कि जो हमने अलग-अलग तरह के घर बनाएं हैं, उसका पोल्ट्री के रख रखाव पर क्या प्रभाव पड़ता है, इसमें एक तो हमने फाइबर और आयरन को मिलाकर दो घर बनाए हैं और बाकी में हमने बांस की खपच्चियों से घर बनाएं हैं, जिस तरह से हम ग्रामीण क्षेत्रों में घर देखते हैं। ये पूरा एरिया एकड़ का है, प्रति घर 18 बाई 20 फीट एरिया के बनाए गए हैं, इसमें मुर्गियों के झूलने के लिए बनाया गया है, क्योंकि मुर्गियों की आदत होती है, ये ऊपर बैठकर झूलती हैं। यहां मुर्गियां पूरी तरह से प्राकृतिक परिवेश में रहती हैं, अभी हमने यहां असील नस्ल की मुर्गियों को रखा है, यह सबसे मशहूर नस्ल होती है।"

इस मॉडल का जिक्र करते हुए केंद्रीय पशुपालन, मत्स्य एवं डेयरी मंत्री गिरीराज सिंह कहते हैं, "अभी जो छुट्टा पशुओं की समस्या है, हमने इसके लिए मॉडल विकसित किया है, जिसमें दो पशुओं के गोबर से केंचुआ खाद, केंचुओं को मुर्गी पालन और मछली पालन में चारे के रूप में दे सकते हैं।"

मुर्गियों को पूरी तरह से प्राकृतिक परिवेश में रखा जाता है।

मुर्गियों को दिया जाता जैविक फीड

"मुर्गियों के खाने के लिए यहां पर बरसीम भी लगा रखी है, ये मुर्गियां बड़े चाव से बरसीम खाती हैं, इन्हें जो हम दाना दे रहे हैं, सिर्फ 30-40 प्रतिशत तक दे रहे हैं। एक एकड़ में हमने चार हजार मुर्गियां रखने का प्लान बनाया है, अगर इसमें हम चार हजार मुर्गियों को रखते हैं तो देसी मुर्गियों का 50-60 प्रतिशत अंडा उत्पादन होता है। तो 2000 से 2500 के बीच में इनका अंडा उत्पादन होता है। ये सारे देसी नस्ल की मुर्गियों के अंडे हैं और इन्हें पूरी तरह से जैविक फीड भी दिया गया है। इन्हें बरसीम, मोरिंगा के साथ ही मक्का और चावल की किन्नी खिलाई जाती है, और पूरी तरह से जैविक परिवेश में रहते हैं, "डॉ. वीके सक्सेना ने आगे बताया।

मुर्गियों को चारे में बरसीम और मोरिंगा दिया जाता है।

वो आगे बताते हैं, "देसी अंडों की कीमत दस रुपए तक होती है, अगर बड़े मेट्रो शहरों की बात की जाए तो 15 से 20 रुपए तक बिक जाता है। अगर दस रुपए भी इनकी कीमत मानों तो 20 हजार से 25 हजार रुपए हर दिन के मिल जाएंगे। वो भी सिर्फ अंडे से जबकि अगर इसमें दूसरी चीजों की बात करें तो वर्मी कम्पोस्ट भी बन रहा और आप इनके साथ ही फूलों और सब्जियों की खेती भी कर सकते हैं।"

इस मॉडल से छुट्टा जानवरों से होगा फायदा

इस मॉडल को ऐसा बनाया है कि मुर्गियों के चारे साथ ही वर्मी कम्पोस्ट भी मिले। इस बारे में र भारतीय पशुचिकित्सा अनुसंधान संस्थान के प्रधान वैज्ञानिक डॉ. रणवीर सिंह कहते हैं, "देखिए इस परियोजना का मुख्य उद्देश्य है जो हमारे देश में बेसहारा पशुओं की समस्या है, उसके गोबर को कैसे हम लाभदायक बनाएं, जिससे किसानों की आमदनी बढ़े, तो उसी परियोजना को ध्यान रखते हुए, इस परियोजना से पिछवाड़ा मुर्गी पालन, केंचुआ पालन, सहजन और जैविक कचरे का पुनर्चक्रण किया जा रहा है

यहां जो केंद्रीय पक्षी अनुसंधान संस्थान और भारतीय पशुचिकित्सा अनुसंधान संस्थान की तकनीकियां हैं, दोनों संस्थानों की तकनीकियों से ये मॉडल विकसित किया गया है।

मुर्गियों को जय गोपाल केंचुआ खिलाने के बाद कैरी के वैज्ञानिकों ने देखा कि मुर्गियों को केंचुआ खिलाने से उसे 57 प्रतिशत प्रोटीन, 11 प्रतिशत मिनरल्स, छह प्रतिशत फैट मिलता है।

फसल अवशेष का भी सही उपयोग

"जैसे पूरे देश में सबसे बड़ी समस्या बेसहारा गायों की है और जो पराली है, हमारी यही कोशिश है कि जो भी नई तकनीक विकसित करें वो पर्यावरण प्रिय होनी चाहिए, और मुर्गियों के लिए सस्ता आहार मिले। इन सबको ध्यान में रखते हुए सीएआरआई और आईवीआरआई ने इस मॉडल को विकसित किया है, "डॉ. रणवीर सिंह ने आगे कहा।

जय गोपाल केंचुआ से बनेगी अच्छी खाद और मुर्गियों के लिए फीड भी

एक एकड़ में ये मॉडल विकसित किया गया है, इसमें आईवीआरआई ने जो जय गोपाल केंचुआ विकसित किया है, उसका समावेश किया है और पराली के एक निश्चित अनुपात को मिलाकर केंचुआ पालन किया जा रहा है। और उसके साथ ही इसे मुर्गियों को खिलाया जा रहा है, केंचुआ प्रोटीन का एक बहुत अच्छा साधन है, कैरी के वैज्ञानिकों ने देखा कि मुर्गियों को केंचुआ खिलाने से उसे 57 प्रतिशत प्रोटीन, 11 प्रतिशत मिनरल्स, छह प्रतिशत फैट मिलता है।

केंद्रीय पक्षी अनुसंधान संस्थान और भारतीय पशुचिकित्सा अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिकों ने विकसित किया है यह मॉडल

यह मुर्गियों के लिए बहुत ही सस्ता और अच्छा आहार मुर्गियों के लिए हो सकता है। मुर्गी पालन का व्यवसाय करने वालों के सामने सबसे बड़ी समस्या महंगे आहार की होती है, इसको कैसे सस्ता करें, यही एक तरीका है। एक किलो गोबर के साथ नौ किलो जैविक कचरे में मिलाकर उसमें केंचुआ पालन कर सकते हैं। और जय गोपाल केंचुआ में बच्चे देने की क्षमता बहुत अधिक होती है, तो इनकी संख्या बहुत तेजी से बढ़ती है। यही नहीं ये बहुत ज्यादा और बहुत कम तापमान में भी जिंदा रह सकते हैं। इस तरह केंचुआ पालन से मुर्गियों का आहार तो मिलेगा ही अच्छी जैविक खाद भी किसानों को मिल जाती है। इससे किसानों को दो तरह की आय मिल जाती है, एक तो केंचुआ जैविक खाद से दूसरी मुर्गियों के लिए आहार भी मिल जा रहा है।

सरकार का पूरा प्रयास है कि किसानों की आय कैसे बढ़ाए और जिस तरह से देश में छोटे जोत वाले किसानों की संख्या बढ़ रही है। उन किसानों के लिए ये मॉडल फायदेमंद हो सकता है।

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निदेशक

केंद्रीय पक्षी अनुसंधान संस्थान

फोन: 91-581-2303223; 2300204; 2301220; 2310023;

ईमेल :[email protected]; [email protected]

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