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वाराणसी: 'लॉकडाउन में भी गंगा में घरों से निकला मल-मूत्र तो जा ही रहा है, फिर पानी साफ कैसे हुआ हो सकता है'

ऐसा कहा जा रहा है कि लॉकडाउन में गंगा का पानी काफी साफ हुआ है, लेकिन पूरा सच क्या है ? हमें बता रहे हैं आईआईटी बीएचयू के प्रोफेसर और संकट मोचन फाउंडेशन के अध्यक्ष विशम्‍भर नाथ मिश्रा।

Mithilesh DharMithilesh Dhar   5 Jun 2020 11:15 AM GMT

लॉकडाउन के बाद से अब तक कई ऐसी रिपोर्ट आई हैं जिसमें बताया जा रहा है कि गंगा का पानी काफी साफ हो गया है। कई ऐसी तस्वीरें भी आई हैं जिसमें गंगा का पानी पारदर्शी नजर आ रहा, लेकिन क्या इतने भर से हम गंगा को साफ कह सकते हैं?

क्या सच में लॉकडाउन के दौरान गंगा का पानी स्वच्छ हुआ है, यह जानने के लिए गांव कनेक्शन की टीम पहुंची उत्तर प्रदेश के वाराणसी। वहां हमने बात की आईआईटी बीएचयू के प्रोफेसर और संकट मोचन फाउंडेशन के अध्यक्ष विशम्‍भर नाथ मिश्रा से। संकट मोचन फाउंडेशन की स्वच्छ गंगा रिसर्च लेबोरेटरी में गंगा के पानी की नियमित जांच होती है।

विशम्‍भर नाथ मिश्रा कहते हैं, "बनारस में 90 फीसदी रॉ सीवेज घरों से आता है। कानपुर का मामला अलग है क्योंकि वहां इंडस्ट्री है। लोग अब अपने घरों में हैं। जो बाहर थे वे भी अपने घर लौट आये हैं। ऐसे में लॉकडाउन रहे या ना रहे, ये गंदगी गंगा में तो आनी ही है। गंगा में फीकल कोलीफार्म की उपस्थिति का मतबल ही यही होता है गंगा में सीवेज का पानी आ रहा है। ऐसे में अब यह कहना है कि लॉकडाउन की वजह से गंगा जी प्रदूषित नहीं हैं, यह ठीक बात नहीं है। अब अगर हम बनारस की गंगा की बात करें तो इसके तीन जरूरी मानक हैं।"

मानव और मवेशियों के मल में बैक्टीरिया के एक समूह को फीकल कोलीफार्म कहते हैं।

संकटमोचन फाउंडेशन ने लॉकडाउन से पहले गंगा के पानी की जांच की थी। छह मार्च को वाराणसी के नगवा नाले के पास डीओ ( डिजॉल्व ऑक्सीजन) 3.6 मिलीग्राम प्रति लीटर था। तुलसी घाट पर 6.8 मिलीग्राम प्रति लीटर था जबकि लाकडाउन के बाद चार अप्रैल को नगवां नाले के पास ये बढ़कर 6.4 और तुलसीघाट पर 7.2 मिलीग्राम प्रति लीटर हो गया।

पानी में ऑक्सीजन की मात्रा का एक स्तर होता है। जब पानी में हानिकारक केमिकल की मात्रा अधिक हो जाती है, तो ऑक्सीजन कम हो जाती है। डिजॉल्व ऑक्सीजन एक लीटर में मिलीग्राम के हिसाब से मापी जाती है।

डीओ लेवल पांच मिलीग्राम प्रति लीटर के ऊपर अच्छा माना जाता है। इसका मतलब तो यह हुआ कि डिजॉल्व ऑक्सीजन की स्थिति में सुधार आया, लेकिन क्या गंगा का पाना इससे ही स्वच्छ हो गया?

इस बारे में विशम्‍भर नाथ मिश्रा कहते हैं, "गंगा मामलों के जानकार और यहां तक की सरकार ने भी कहा है कि हम बहुत कोशिश करेंगे तो गंगा को क्लास बी रिवर बना सकते हैं। क्लास बी रिवर का मतलब होता है कि पानी केवल स्नान योग्य है। मतलब सरकार की सारी कवायदें ठीक भी रहेंगी तब भी गंगा का पानी केवल नहाने योग्य बचेगा। पीने की तो बात ही नहीं कर सकते।"

विशम्‍भर नाथ मिश्रा का मानना है कि जब तक पानी में फीकल कोलीफार्म प्रति 100 मिलीलीटर 500 के अंदर नहीं आ हो जाता तब तक हम गंगा को साफ नहीं कह सकते। जो रिपोर्ट आ रही हैं, उन सबमें पूरी जानकारी दी ही नहीं जा रही है।

वे कहते हैं, "क्लास बी रिवर की बात करेंगे तो इसके अनुसार बीओडी (बायोकेमिकल ऑक्सीजन डिजॉल्व) लेवल 3 मिलीग्राम प्रति लीटर से कम होना चाहिए। डीओ (डिजॉल्व ऑक्सीजन) लेवल पांच मिलीग्राम प्रति लीटर के ऊपर होना चाहिए और फीकल कोलीफार्म प्रति 100 मिलीलीटर 500 के अंदर होना चाहिए। जब नदी का पानी इस स्तर होगा तब वह केवल नहाने योग्य होगा। आचमन और जल पीने की बात ही नहीं कर सकते। जब तक फीकल कोलीफार्म का स्तर शून्य नहीं हो जाता, तब तक वह पानी पीया नहीं जा सकता। हम जहां बैठे हैं (तुलसी घाट) यहां मार्च में फीकल कोलीफार्म एक मिलीमीटर पानी में 52,000 था, जोकि 500 के अंदर होना चाहिए। फिर लॉकडाउन के दौरान यह तीन गुना और ज्यादा बढ़ गया।"

लॉकडाउन के कारण बनारस के घाटों पर अब काफी सन्नाटा रहता है। तस्वीर अस्सी घाट की है। (मिथिलेश)

संकटमोचन फाउंडेशन की छह मार्च की रिपोर्ट देखेंगें तो उस दिन सामने घाट का टीडीएस (टोटल डीसॉल्व सॉलिड्स) 241, डीओ लेवल 7.2 और बीओडी लेवल 5.4 था, जबकि फीकल कोलीफार्म के संख्या प्रति मिलीलीटर के हिसाब से 43,000 था। नारायाण घाट पर इसकी संख्या प्रति मिलीलीटर के हिसाब से 22,000, नगवा में 37,000,000 तुलसी घाट पर 52,000, शिवालय घाट पर 62,000, आरपी घाट पर 37,000, त्रिलोचन घाट पर 44,000, खिर्की नाला में 52,000,000 और वरुण-गंगा के संगम के पास 64,000,000 था।


मानक कहते हैं कि नदी के पानी में डीडीएस (टोटल डीसॉल्व सॉलिड्स) की मात्रा 600 मिलीग्राम प्रति लीटर से कम होनी चाहिए।

फाउंडेशन की ओर से लॉकडाउन में चार अप्रैल को तुलसी घाट और नगवा घाट से नमूने लिये गये। जांच में सामने आया कि उस दिन सुबह के समय तुलसी घाट के पानी का टीडीएस 273, डीओ 7.2, बीओडी 7.8 और एफसीसी 202,000 था जबकि नगवा घाट की बात करें तो वहां का टीडीएस 474, डीओ 6.4, बीओडी 40-40 और एफसीसी 57,000,000 था।

विशम्‍भर नाथ मिश्रा कहते हैं कि लॉकडाउन की वजह से केमिकल का पानी नहीं आ रहा है। इसलिए पानी साफ दिख रहा है। अस्सी घाट के पास मार्च में एक मिलीमीटर पानी में फीकल कोलीफार्म की संख्या थी 37 मिलियन (37,000,000) था। अप्रैल में जब बात होने लगी कि गंगा का पानी साफ हो गया है तब उसका लेवल पहुंच गया 57 मिलियन।


अपनी बात जारी रखते हुए वे आगे कहते हैं कि हमारे यहां तो रामचरितमानस में लिखा है कि दरस परस मज्जन अरु पाना। बहुत से लोग गंगा का दर्शन करते हैं। बहुत से गंगा के पवित्र जल को अपने माथे लगाते हैं, बहुत से लोग गंगा में स्नान करते हैं और बहुत से लोग आचमन भी करते हैं। अब जहां आचमन की बात होगी, तो पानी में फीकल कोलीफार्म नहीं होना चाहिए। बहुत से लोग तो ऐसे में हैं जो पूरा जीवन गंगा जल के सहारे बिता देते हैं। फीकल कोलीफार्म वाला पानी कोई आदमी कैसे पी सकता है।

अब लॉकडाउन में अगर किसी को लगता है कि सब कुछ ठीक है तो उसे लगे। हम तो रोज देख रहे हैं। पानी जनित जितनी भी बीमारियां हैं, उन सबका कारण फीकल कोलीफार्म है। अगर वह आप नहीं हटा पाएंगे तो सफाई का कोई मतलब नहीं है।

बनारस में अभी दो नये एसटीपी लगाये गये हैं। एक दीनापुर में है जिसकी क्षमता 140 एमएलडी (मिलियन लीटर प्रतिदिन) है। दूसरा एसटीपी सतवां में लगाया गया है जिसकी क्षमता 120 एमएलडी है। एक में 60 एमएलडी सीवेज ट्रांसपोर्ट होकर जाता था दूसरे में 10 एमएलडी। अभी इनकी क्या स्थिति है उसका मालिक भगवान ही है। वरुणा में भी सीवजे को सीधे गिराया जा रहा है।

नगवा नाला से घरों से निकला गंदा पानी सीधे गंगा जाता है।

वर्ष 1986 में बनारस में जब गंगा सफाई की शुरुआत हुई थी तब बनारस का डिस्चार्ज लगभग 150 एमएलडी का था। तीन एसटीपी, एक डीएलडब्लू में, एक भगवानपुर में और एक दीनापुर में बनाये गये। इसकी टोटल क्षमता ही 102 एमएलडी की थी। अब बताइये ट्रीटमेंट की क्षमता आपकी वैसे ही कम है। और अब तो लगभग 350 एमएलडी डिस्चार्ज रोज हो रहा है।

संकटमोचन फाउंडेशन ने 20 मई, 22, 28 मई और एक जून को कुछ घाटों के पानी की जांच की। रिपोर्ट के अनुसार 20 मई को तुलसी घाट का टीडीएस 282, डीओ 6.8, बीओडी 10 और एफसीसी 83,000 था। नगवां घाट पर टीडीएस 330, डीओ 4.8, बीओडी 37 और एफसीसी 52,000,000 था।

इसी तरह फिर 22 मई को भी इन दोनों घाटों से नमूने लिये गये। इस रिपोर्ट में तुलसी घाट का टीडीएस 274, डीओ 7.0, बीओडी 9 और एफसीसी 76,000 था। नगवां घाट पर टीडीएस 330, डीओ 4, बीओडी 39 और एफसीसी 60,000,000 था।

मई 28 को तुलसी घाट पर एफसीसी की संख्या प्रति 100 मिलीटीलर में 68,000 और एक जून को इसी घाट पर एफसीसी का लेवल 57,000 था। अब इस रिपोर्ट को आधार मानेंगे तो ऐसा नहीं कहा जा सकता कि लॉकडाउन की वजह से फीकल कोलीफार्म की संख्या में बहुत ज्यादा बदलाव आया हो। यह कभी घटा तो कभी बढ़ा है।


विशम्‍भर नाथ मिश्रा के अनुसार यहां जिन एसटीपी (सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट) में पानी ट्रीट होता है उसमें फीकल कोलीफार्म की खत्म करने की कोई तकनीक नहीं है। गंगा एक्शन प्लान में इसका बाकायदा उल्लेख है कि गंगा से सभी तरह के प्रदूषण को खत्म किया जाये। और जब तक पानी किसी तरह से नुकसानदायक ना रहे तब वह ट्रीट माना जाये और दस पानी को दोबारा उपयोग में भी लाया जाये।"

ऐसे में जब पानी से फीकल कोलीफार्म खत्म ही नहीं होगा तो उसे ट्रीट कैसे माना जा सकता है। सीवेज के पानी को हल्के स्तर से ट्रीट किया जाता है और फिर उसे वापस गंगा में बहा दिया जाता है। बाकी जो क्षमता से ज्यादा है, वह गंदा पानी तो सीधे गंगा में बाहाया जा रहा है।

वे यह भी कहते हैं कि हम तस्वीरों में बता रहे हैं कि गंगा का पानी साफ हो गया है। गंगा तो वैसे ही सुंदर हैं। जब भी आप पानी के स्वच्छता की बात करेंगे तो जो भी रिपोर्ट आ रही है उसमें बताया जा रहा है कि बीओ लेवल में सुधार आया है। बीओ लेवल में सुधार तो होगा ही क्योंकि घाटों पर इंसानों की गतिविधियां कम हुई हैं। ऐसे में जो धूल या गंदगी है वह नीचे पानी में जमा है। इस कारण पानी की पारदर्शिता भी बढ़ी है।ऐसे में सवाल यह है कि जांचकर्ता फीकल कोलीफार्म की बात क्यों नहीं करते हैं। ऐसा भी नहीं है कि गंगा हर जगह प्रदूषित हैं। प्रदूषण वहां है जहां आबादी है। अब कोई गंगा के बीच जाकर पानी लेगा और उसकी जांच करेगा तो वह उसे साफ ही बतायेगा। अब बताइये, हम नहाने या पूजा करने गंगा के बीच में जाते हैं क्या ? पानी स्वच्छ तो वहां होना चाहिए जहां आबादी है।

इस बारे में हमने महामना मालवीय गंगा, नदी विकास एवं जल संसाधन प्रबंधन शोध केंद्र, काशी हिंदू विश्वविद्यालय वाराणसी के चेयरमैन प्रोफेसर बीडी त्रिपाठी से फोन पर बात की।


वे बताते हैं, "लॉकडाउन के दौरान गंगा का पानी 25 से 30 फीसदी तक कम हुआ है। बीओडी की मात्रा कम हुई है। डीओ की मात्रा काफी बढ़ी है। मानकों के आधार पर ये कहा जा सकता है कि गंगा के पानी में प्रदूषण का स्तर कम हुआ। हमने फीकल कोलीफार्म पर काम नहीं किया है।"

"लॉकडाउन में भीड़ कम है। काशी में शवों के जलने में 40 प्रतिशत से ज्यादा कमी आई है। 500 से अधिक मोटर वाहनों के वर्कशॉप बंद हैं। काशी में सिल्क फैब्रिक और आइवरी वर्क्स की करीब 1200 फैक्ट्रियां हैं। ये फैक्ट्रियां करीब 25 एमएलडी गंदा पानी छोड़ती थीं। लॉकडाउन में सैंपिलिंग के दौरान गंगा में मछलियां और कछुए भी देखे गये।" बीडी त्रिपाठी कहते हैं।

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