बाढ़ जिनका हर साल सब कुछ ले जाती है, चुनाव में भी वो खाली हाथ

सीतापुर (उत्तर प्रदेश)। हर साल पहाड़ों से छोड़े जाने वाले पानी से सैकड़ो घर बाढ़ के पानी में बह जाते है। अगर इस दौरान कोई बीमार हो जाता है तो इलाज के आभाव में दम तोड़ देता। क्योंकि गाँव मे जाने के लिए सारे रास्ते बंद हो जाते है। ऐसे में गाँव तक एम्बुलेंस तो दूर की बात खाली पैदल चलना दूभर हो जाता है।

उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिला मुख्यालय से करीब 70 किलोमीटर की दूरी पर स्थित बेहटा ब्लॉक के रतौली गाँव में हर साल बाढ़ की चपेट आ जाने से सैकड़ों परिवार बेघर हो जाते हैं, ऐसे इन लोगों को सड़क के किनारे झुग्गी झोपड़ी बना कर के बसर करना पड़ता है। कच्चे मिट्टी के रास्तों में इतनी ने गाड़ियां नहीं निकल पाती है जिसके कारण लोगो को काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।

ग्रामीण आशुतोष द्विवेदी बताते हैं, "अगर अचानक से कोई बीमार पड़ जाए तो हम लोगों को 50 किलोमीटर दूर चक्कर काट कर भदफ़र होते हुए लहरपुर ले जाना पड़ता है ऐसे में कई बार लोगो को अपनी जान तक गंवानी पड़ी है।

रतौली से पूर्व प्रधानमंत्री अटल जी तक चमका चुके है अपनी राजनीति

वर्ष 1960 में जब जनसंघ पार्टी थी तो पूर्व प्रधानमंत्री भारतरत्न अटल बिहारी बाजपेयी भी एक रात रतौली में बिता कर के अपनी राजनीति को चमका चुके हैं। अक्टूबर 2004 में सपा सरकार में जब मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री हुआ करते थे उस समय जब भाजपा के विपक्षी दल के नेता लाल जी टण्डन ने भी रतौली गाँव में भ्रमण कर के बाढ़ से निजात दिलाने व गाँव में अस्पताल व स्कूल देने का वादा किया था लेकिन आज तक पूरा नही हुवा। 2010 में कांग्रेस सरकार के प्राकृतिक आपदा जल संसाधन एवं संसदीय कार्यमंत्री पवन बंसल, क्षेत्रीय सांसद जितिन प्रसाद ने भी जनता को ठेंगा दिखाया।

गंदे पानी को पीते हैं उसी में नहाते हैं

गाँव की महिलाओं ने बताया कि इतनी सरकार आ चुकी है लेकिन हम लोगो की कोई सुनने वाला नही गाँव में एक भी सरकारी हेण्डपम्प नहीं, जो हैं भी वो खराब पड़े हुए हैं ऐसे में हम लोग शारदा नदी का ही गन्दा पानी पीते हैं और और उसी पानी मे नहाते हैं, ये पानी से पीने से बीमार हम लोग हो जाते है, लेकिन मजबूरी है जान जोखिम में डाल कर के पानी पीना पड़ता है, अभी हाल ही में नदी में दो मगरमच्छ भी आ गए थे। तो अब पानी भरने में भी डर लगता है।

सड़क न होने से बच्चों की नहीं हो रही शादियां

गाँव में सड़क न होने से लड़कों की शादियां तो दूर की बात लड़कियों की शादियां करने से लोग हिचकिचाते हैं। ऐसे में गाँव के 70% तक बच्चों की शादियां नहीं हो रही, कोई जल्द शादी करने के लिए तैयार नही होता है।

गाँव में स्कूल न होने के कारण 50 किलोमीटर दूर चक्कर काट कर के स्कूल जाना मुश्किल होता है, इधर नदी तैरना खतरे से खाली नहीं साबित हो रहा है। तो ऐसे में बच्चे स्कूल की जगह इधर उधर गाँवो में सौ सौ रुपये में मजदूरी करने को मजबूर होते है।

राहत के नाम पे मिलता है ठेंगा

बाढ़ कटान के नाम पर सरकार से पुनर्वास के लिए हर वर्ष करोड़ों रूपये आते हैं, हम लोग रास्ता ही देखते रह जाते है की कब हम लोगो के पुनर्वास के लिए भी सरकार कोई सकारात्मक ठोस कदम भी उठा रही है।

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