काम की तलाश में गए थे, वापस सिलिकोसिस लेकर आए

सिलिकोसिस की गंभीरता का अनुमान इस बात से ही लगाया जा सकता है कि इससे पीड़ित मरीजों के बचने की कोई उम्मीद नहीं बचती।

पुष्पेंद्र वैद्य, कम्युनिटी जर्नलिस्ट

अलीपुर/झाबुआ/धार(मध्य प्रदेश)। शैतान मन्नू इतने कमजोर हो गए हैं कि उनके शरीर की एक-एक हड्डियां गिनी जा सकती हैं, थोड़ा सा बैठने भर से ही सांसे तेज हो जाती हैं। डॉक्टर ने भी इलाज से अब मना कर दिया है। किस पल सांसे थम जाएं कुछ कहां नहीं जा सकता। पूरा परिवार भी शैतान को अब जिंदा लाश ही मानता है।

मध्य प्रदेश के झाबुआ, अलीपुर और धार जिले के कई गाँवों में यही हालात हैं। झाबुआ जिले के मांडली गाँव में रहने वाले शैतान कई साल पहले मजदूरी के लिए गुजरात गए थे। कुछ ही महीनों में पत्थर पिसाई के दौरान उड़ने वाली धूल फेफड़ों में सीमेंट की तरह जम गई। इन गाँवों कई लोग ऐसे हैं जिनकी मौत हो गई अभी सैकड़ों लोगों को मौत का इंतजार है।

अपने घर का काम करती सात बरस की गंगा, जिनके माँ-बाप की मौत सिलिकोसिस से हो गई थी।

अपने घर का काम करती सात बरस की गंगा, जिनके माँ-बाप की मौत सिलिकोसिस से हो गई थी।

झाबुआ जिले के ही कलिया वीरान गाँव की सात साल की गंगा अपने छोटे-छोटे भाई-बहनों के साथ अब अकेली रहती है। उसके माता-पिता पांच साल के भीतर ही बारी-बारी से चल बसे। इन्हीं बच्चों के लिए कालू और दीनू गुजरात की कांच बनाने वाली फैक्ट्रियों में मजदूरी करने गए थे। सिलिकोसिस से पीड़ित होने के बाद पति-पत्नी दोनों धीरे-धीरे सूखते गए और एक दिन उनकी सांसे थम गई। बच्चे अनाथ हो गए। इनकी परवरिश करने वाला कोई नहीं। थोडी सी जमीन और बड़े भाई-बहन छोटी-मोटी मजदूरी कर अपने पेट भर रहे हैं।

सिलिकोसिस की गंभीरता का अनुमान इस बात से ही लगाया जा सकता है कि इससे पीड़ित मरीजों के बचने की कोई उम्मीद नहीं बचती। तिल–तिल कर मरने और हर पल मौत के इंतज़ार के सिवा उनके पास कोई चारा नहीं होता।

कलिया विरान गाँव का ही 50 वर्षीय राजमल ना मजदूरी कर पाता है ना घर का कोई काम। फेफड़े जवाब दे चुके हैं। फेफड़े पत्थर में तब्दील हो गए हैं। ऊपर से फेफड़ों की हड्डियां दिखाई दे रही हैं, लेकिन भीतर सब कुछ खत्म हो चुका है। डॉक्टरों ने साफ कह दिया है जितने दिन जी जाओ उतनी तुम्हारी किस्मत। राजमल कई दिनों तक दाहोद के अस्पताल में भर्ती रहा। थोड़े दिन बाद फिर गाँव आ गया। यहां मजदूरी भी नहीं मिलती थी। मजदूरी के लिए दाहोद जाना पड़ता है। दो छोटे-छोटे बच्चे हैं। दो बीघा जमीन है। दूसरे लोग कुछ बो देते हैं। जो कुछ मिलता है। उसी से परिवार पेट भर लेता है।


सरकार की तरफ से सिवा सिलिकोसिस पीड़ित होने के प्रमाण पत्र के अलावा कुछ नहीं मिला। भिलू गजावा की पत्नी भंगु का पति भी पिछले साल चल बसा। भंगु भी सिलिकोसिस से पीड़ित है। उसकी जिंदगी भी अब ज्यादा दिन की नहीं है। अपने पति और खुद का सिलिकोसिस पीड़ित होने का प्रमाण पत्र लेकर यहां-वहां भटकती रहती है लेकिन फिलहाल कोई मदद नहीं मिल रही। इलाज के नाम पर सरकारी दवाखाने से कुछ गोलियां मिल रही है। बस इन्हीं के भरोसे आस बंधी है।

सिलिकोसिस से पीड़ित दिनेश रायसिंग कुमार कहते हैं, "डॉक्टर कहते हैं कि इस बीमारी का कोई इलाज नहीं, फिर भी हर कोई अलग-अलग प्राइवेट डॉक्टरों को दिखाता रहता है, कोई जमीन बेच रहा है, कोई बकरियां बेच रहा है, कुछ ने तो अपने घर भी बेच दिए, कई लोग चल बसे, अब उनके बच्चे अनाथ बचे हैं।"

कषलदरा के रहने वाले दिनेश रायसिंग पिछले साल खटिया पकड़ चुके थे। दिनेश साल 2002-03 में गुजरात के गोधरा और दाहोद में पत्थर पिसाई की मजदूरी के लिए गए थे। पत्थर पीस कर तैयार किए पाउडर से कांच बनाया जाता है। एक बोरी यानी 20 किलो की बोरी के बदले 50 रुपए मिलते थे। यहां काम नहीं था इसलिए पलायन कर वहां जाना पड़ा। दो-तीन महीनों में ही हालत खराब हो गई। वहां से तो कुछ ही महीनों में लौट आए लेकिन जिंदगी भर की बीमारी का दर्द हमेशा-हमेशा के लिए साथ ले आ गया। सांस चलती हैं। खांसी आती है। थोड़ा भी मेहनत का काम नहीं हो पाता। 35 साल की उम्र है। दो छोटे-छोटे बच्चे हैं। मौत हर दिन मंडराती है। किस दिन जिंदगी का पहिया थम जाए कुछ कहा नहीं जा सकता। दिनेश सिलिकोसिस पीडितों की लडाई भी लड रहे हैं।

सिलिकोसिस से पीड़ित ग्रामीण जिन्हें अब तक सिर्फ सिलिकोसिस का प्रमाणपत्र मिला है।

मध्यप्रदेश का आदिवासी बाहुल्य इलाका धार, झाबुआ और अलीराजपुर में हर साल बड़ी संख्या में रोजगार की तलाश में आदिवासी पलायन कर पड़ोसी राज्य गुजरात जाते हैं। डेढ दशक पहले कई गाँवों से बड़ी संख्या में आदिवासी कांच बनाने के लिए पत्थर की पिसाई करने वाले कारखानों में गए थे। यहां पिसाई के दौरान बारीक धूल कण सांस में घूल कर फेफड़ों में जमा हो गए। यह धूल सीमेंट की तरह फेफड़ों में चिपक गई। आदिवासियों को इस गंभीर बीमारी के बारे में पता चला तब तक कई लोग इसकी चपेट में आ चुके थे। तीन जिलों के 105 गाँवों में अब तक 589 लोगों की मौत हो चुकी है। 1132 लोग बीमारी से पीड़ितहैं। इस बीमारी से कुल 1721 लोग प्रभावित हुए थे।

वहीं सिलिकोसिस से पीड़ित दूसरे मरीज बताते हैं, "डॉक्टर ने बोला है कि जहां तक जीना है वहां तक घूम लो, बाकी हम इलाज कर रहे हैं और कुछ नहीं कर सकते हैं। अब घर में बताओ तो छोटे-छोटे बच्चे हैं डर जाते हैं।"

क्या है सिलिकोसिस

सिलिकोसिस फेफड़ों की बीमारी है। पत्थर या सीमेंट की खदानों जैसी धूल भरी जगहों पर लगातार काम करते रहने से नाक के जरिए धूल, सीमेंट या कांच के महीन कण फेफड़ों तक पहुंच जाते हैं। धीरे–धीरे व्यक्ति की शारीरिक क्षमता कम होती जाती है। वह हर दिन कमजोर होता जाता है और आखिर में मौत हो जाती है।

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