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उत्तराखंड: कोरोना संकट में उत्तरकाशी के ग्राम प्रधान से सबको सीखना चाहिए

Divendra SinghDivendra Singh   30 May 2020 6:44 AM GMT

आए दिन क्वारंटाइन सेंटर्स की खबरें आती रहती हैं, कि कहीं पर खाना-पानी नहीं मिल रहा तो कहीं पर दूसरी कई असुविधाएं हो रहीं हैं, इस बीच क्वारंटाइन सेंटर से लोगों के भागने की खबरें भी आती रहती हैं। ऐसे में उत्तराखंड के इस ग्राम प्रधान की पहल लोगों को सीख दे सकती है।

उत्तराखंड में उत्तरकाशी जिले के असी गंगा घाटी में अगोड़ा गाँव, जहां तक पहुंचने के लिए छह किमी पैदल जाना पड़ता है। प्रसिद्ध डोडिताल के रास्ते में पड़ने वाले अगोड़ा गाँव में हर साल इस समय पर्यटकों की भीड़ लगी रहती है। देश-विदेश से लोग यहां ट्रैकिंग के लिए आते हैं। इस बार यहां पर भी कोरोना की वजह से पर्यटक नहीं आए। लेकिन यहां पर भी देश के दूसरे गाँवों की तरह ही बाहर नौकरी कर रहे लोग वापस आए हैं।


देश के अलग-अलग राज्यों से लोग वापस तो आ गए, लेकिन उन्हें घर नहीं भेजा जा सकता था, क्योंकि उन्हें कुछ दिनों के क्वारंटाइन सेंटर पर रखना जरूरी होता है। लेकिन अब ग्राम प्रधान मुकेश पंवार के सामने समस्या आयी कि दो कमरे के सरकारी स्कूल में दस से ज्यादा लोगों को सोशल डिस्टेसिंग का पालन करते हुए क्वारंटाइन कैसे कर सकते हैं।

अगोड़ा में ज्यादातर लोगों का मुख्य रोजगार पर्यटकों को ट्रैकिंग पर ले जाना है। ग्राम प्रधान मुकेश भी लोगों को ट्रैकिंग पर ले जाते हैं, इसके लिए उन्होंने लाखों की कीमत का जरूरी सामान, जैसे टेंट, स्लीपिंग बैग वगैरह भी खरीद रखा है। उन्होंने सभी लोगों को इन्हीं टेंट में अलग-अलग सोशल डिस्टेसिंग का पालन करते हुए रखा है।


मुकेश बताते हैं, "हमारे गाँव रह रहे 80 पर्सेंट लोग एडवेंचर फील्ड में काम करते हैं, कुछ लोग ट्रैकिंग तो कुछ लोग वाटर राफ्टिंग तो कुछ स्नो स्कीइंग करते हैं। एक दिन मैंने अपने गाँव के व्हाट्सएप ग्रुप में लिखा कि जो हमारे गाँव में 28 लोग बाहर से आने वाले हैं, उन्हें स्कूल के तीन कमरों में कैसे रखा जाए। सभी लोगों ने कुछ न कुछ सुझाव दिया। उसी में से एक सुझाव ये भी था कि हम ट्रैकिंग के दौरान अपने ट्रैकर को जैसे एक-एक टेंट देते हैं, उसी तरह क्यों न कुछ किया जाए। क्योंकि ट्रैकिंग में भी हमारे साथ नार्मली 25-26 लोग तो रहते ही हैं। ये सुझाव मुझे भी पसंद आया।"


वो आगे कहते हैं, "तब हम लोग स्लीपिंग बैग, टेंट, टॉयलेट टेंट सब कुछ लेकर खाली बंजर पड़े खेत में ले गए, वहां पर सबके रुकने की व्यवस्था की, लोगों को वहा रहने भी अच्छा लग रहा है, क्योंकि स्कूल में हम क्या सुविधा दे सकते हैं। यहां वो ज्यादा अच्छे से रह रहे हैं।"

135 परिवारों का ये गांव प्रवासियों के लौटने पर उनका स्वागत रंग बिरंगे टेंट में उन्हें क्वारंटीन रखने की व्यवस्था जुटाकर कर रहा है। मुकेश पंवार कहते हैं, "रोजगार की तलाश में हमारे भाई बाहर गए थे, अब लौट रहे हैं तो हमारा भी फर्ज है कि इस संकट की घड़ी में उनकी मदद करें। जिंदा रहेंगे तो आगे बहुत काम मिलता रहेगा।"


मुंबई में एक रेस्टोरेंट में जॉब करने वाले संतोष पंवार भी गाँव लौटकर आए हैं। संतोष बताते हैं, "हमें यहां पर बहुत अच्छी सुविधा मिली है, हमारे ग्राम प्रधान ने सारी सुविधाएं की हैं। जितने दिन यहां रहेंगे आराम से तो रहेंगे।"

मुकेश पंवार की तरह ही पौड़ी जिले के भोपाटी गाँव की ग्राम प्रधान यशोदा रावत ने ग्रामीणों के साथ मिलकर लोगों को क्वारंटीन रखने को बकायदा गांव के खेतों में हट्स बनाए हैं। इसके लिए संसाधन भी ग्रामीणों से ही जुटाए गए और कोई सरकारी मदद नहीं मिली।

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