पंजाब में महिलाएं क्यों उगाने लगीं अपने लिए घरों में सब्जियां? क्या हैं इसके फायदे

पंजाब की करमजीत कौर उन हजारों महिलाओं में से एक हैं जिन्होंने कैंसर जैसी घातक बीमारियों से बचने के लिए अपने घरों में सब्जियां उगानी शुरू की हैं। उनका कहना है इससे कई फायदे मिले हैं, देखिए वीडियो

Arvind ShuklaArvind Shukla   30 Sep 2019 12:50 PM GMT

बठिंडा/मुक्तेश्वर/फरीदकोट (पंजाब)। करमजीत कौर के पास बड़ा सा घर, कई एकड़ जमीन, ट्रैक्टर और कई दर्जन गाय भैंस भी हैं। उनका परिवार पंजाब के संपन्न किसानों में आता है, लेकिन वो अपने लिए देसी तरीकों से सब्जियां खुद उगाती हैं, उनका कहना है घर के लोगों को कैंसर जैसी बीमारियों से बचाना है तो अपना उगाया खाना पड़ेगा।

पंजाब के श्री मुक्तसर जिला जिले के कोटली गांव की रहने वाली करमजीत कौर (35 वर्ष) उन हजारों महिलाओं में से एक हैं जिन्होंने डीएपी-यूरिया जैसी रासायनिक खादों और कीटनाशकों की मदद से उगाए गए अनाज और सब्जियों से नुकसान को देखते हुए अपने घर के पास की खाली जमीन पर सब्जियां उगानी शुरू की हैं। पंजाब के गांवों में घर के आसपास और खेतों के किनारे तो शहरों में छत, बॉलकनी और खाली पड़े प्लाटों में अर्बन फार्मिंग (सब्जियां) कर रहे हैं। किचन गार्डन के फायदों को देखते हुए जैविक खेती करने वाले किसानों की संख्या भी बढ़ रही है।

पंजाब के मुक्तसर जिले के कोटली गांव में अपनी किचन गार्डन में करमजीत कौर (गुलाबी सूट में)। फोटो- अरविंद शुक्ला

करमजीत कौर की बगीची (किचन गार्डन) में लौकी, धनिया, कद्दू, हरी मिर्च समेत आधा दर्जन से ज्यादा मौसमी सब्जियां लगी हैं। करमजीत के मुताबिक, उनके सात लोगों के परिवार में करीब 60-100 रुपए की सब्जी रोज लगती थी, अब वो पैसे भी बचते हैं और खाना भी बिना जहर (पेस्टीसाइड मुक्त) मिल रहा है।

घर की बगीची की जरूरत के सवाल पर करमजीत की पड़ोसी सरबजीत कौर 'गाँव कनेक्शन' से बताती हैं, "एक मां ही इस बात को समझ सकती है कि अपने बच्चों को जहर नहीं खिलाना है।"

हरित क्रांति के दुष्परिणामों का सामना कर रहे पंजाब की आबोहवा तक दूषित हो गई है। कैंसर जैसी बीमारियां हर साल सैकड़ों लोगों की जान ले रही हैं। करमजीत और सरबजीत मालवा के उस इलाके से हैं, जहां देश में सबसे ज्यादा कीटनाशक का इस्तेमाल किया जाता है।

सितंबर 2019 में भारत के राष्ट्रीय सलाहकार राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन सीएम पांडे ने एक वीडियो जारी कर किसानों से अपील की कि वो कीटनाशकों का इस्तेमाल न करें। जरूरत पड़ने पर जैव कीटनाशकों का उपयोग करें।

उन्होंने अपने वीडियो में कहा कि पंजाब-हरियाणा में देश के औसत का तीन गुना ज्यादा कीटनाशक डाला जा रहा है। पंजाब-हरियाणा का औसत 0.75 किलोग्राम प्रति हेक्टयर है जबकि बाकी देश में 0.29 किलो प्रति हेक्टयर है। कीटनाशकों के फल, फूल और सब्जियों पर घातक परिणाम देखे गए हैं।

पंजाब के गाँव जितने हरे भरे दिखाई देते हैं, खेत में उतना ही जहर भरा हुआ है। अब कैंसर सिर्फ एक बीमारी नहीं है किडनी, त्वचा रोग समेत कई गंभीर किस्म के रोग लोगों को हो रहे। गाँवों में उग रहा वो शहर के लोग खा रहे इसलिए हमने गाँवों में जैविक किचन गार्डन और शहर में अर्बन फार्मिंग का काम शुरू किया। -उमेंद्र दत्त, कार्यकारी निदेशक, खेती विरासत मिशन, पंजाब

उमेंद्र दत्त, कार्यकारी निदेशक, खेती विरासत मिशन, पंजाब

बठिंडा जिले के गुनयाना इलाके के सुखविंदर सिंह मकानों के लिए शटरिंग के कारोबारी हैं। उन्होंने अपने दफ्तर के पीछे की जमीन पर सब्जियां उगा रखी हैं।

'गाँव कनेक्शन' से बात करते हुए सुखविंदर कहते हैं, "आजकल हम लोग सारा जहर खा रहे। बच्चे-बड़े सब बीमारियों का शिकार हो रहे हैं। मेरे घर पर जगह नहीं है तो हमने यहां (दुकान) के पीछे बिना कीटनाशक वाली सब्जियां बो रखी हैं।"

आगे कहते हैं, "इसमें सिर्फ बीज और पानी का खर्च है। थोड़ी बहुत खाद (गोबर-कंपोस्ट) डाल रखी है, तो सबसे बड़ा फायदा है ये है कि ये मेरी आंखों के सामने उगती हैं, सेहत के लिए फायदेमंद हैं।"

पंजाब के गांव और शहर के लोगों को बिना रासायनिक खाद और कीटनाशकों के खेती करने के लिए गैर सरकारी संगठन खेती विरासत मिशन प्रेरित कर रहा है। 'गाँव कनेक्शन' के बात करते हुए विरासत मिशन के कार्यकारी निदेशक उमेंद्र दत्त कहते हैं,"पंजाब के शहर जितने चमकदार और गाँव जितने हरे भरे दिखाई देते हैं, खेत में उतना ही जहर भरा हुआ है। अब कैंसर सिर्फ एक बीमारी नहीं है किडनी, त्वचा रोग समेत कई गंभीर किस्म के रोग लोगों को हो रहे।"

"और ये सभ्यता का संकट है क्योंकि गाँवों में उग रहा वो शहर के लोग खा रहे इसलिए हमने गाँवों में जैविक किचन गार्डन और शहर में अर्बन फार्मिंग का काम शुरू किया। हजारों लोग हमारे साथ जुड़े हैं, अब बदलाव आ रहा है,"वह आगे कहते हैं।

आजकल हम लोग सारा जहर खा रहे। बच्चे-बड़े सब बीमारियों का शिकार हो रहे हैं। मेरे घर पर जगह नहीं है तो हमने यहां (दुकान) के पीछे बिना कीटनाशक वाली सब्जियां बो रखी हैं।- सुखविंदर सिंह, बठिंडा, पंजाब


खेती विरासत मिशन (जैतो) की एसोसिएट डॉयरेक्टर रुपसी गर्ग कहती है, "हरित क्रांति के बाद पंजाब में सामाजिक और आर्थिक स्तर पर कई बदलाव हुए। औरतों की भूमिका खेती-बाड़ी से खत्म हो गई थी। दूसरी बड़ी समस्या स्वास्थ्य और पोषण है।"

रुपसी कहती हैं, "बच्चों को जो खाना दिया जा रहा है वो सेहतमंद नहीं है। इसलिए हम लोगों ने किचन गार्डन के माध्यम से औरतों को बीच काम शुरू किया। घर के पास जो थोड़ी जगह थी वहां मौसमी सब्जियां बोई जानी शुरू हो गईं।"

अपनी बात को जारी रखते हुए रुपसी गर्ग कहती हैं, "साल 2008 में बरनाला और फरीदपुर के चार गाँवों से बगीची की शुरुआत हुई थी और 2019 में 50 गाँवों तक काम पहुंच गया है। पांच हजार से ज्यादा महिलाएं किचन गार्डिनिंग से जुड़ी हैं। फिरोजपुर, मुक्तसर, अमृतसर में भी काम जारी है। इसका फायदा ये मिला कि लोगों को सेहतमंद सब्जियां मिलने लगीं और उनके पैसे भी बचने लगे।'


"साल 2008 में बरनाला और फरीदपुर के चार गाँवों से बगीची की शुरुआत हुई थी और 2019 में 50 गाँवों तक काम पहुंच गया है। पांच हजार से ज्यादा महिलाएं किचन गार्डिनिंग से जुड़ी हैं। इसका फायदा ये मिला कि लोगों को सेहतमंद सब्जियां मिलने लगीं और उनके पैसे भी बचने लगे। -रूपसी गर्ग, एसोसिएट डॉयरेक्टर, केवीएम

मुक्तेश्वर जिले के कोटली गाँव की दलजीत कौर के लिए किचन गार्डन कमाई का जरिया भी बन गए हैं। उन्होंने अपने घर के सामने खाली पडी जगह में भिड़ी, करेला, शिमला मिर्च, ग्वार फली समेत कई सब्जियां लगा रखी हैं।

वो अपनी जुबान में कहती हैं, "असी घर वास्ते बगीची लगादें से, सनु यै हवा की बाजार की सब्जी सेहत के लिए ठीक न थी।"वो आगे बताती हैं, "एक कैनाल में मेरी ये बगीची है, जिसमें 5-7 किलो रोज सब्जियां होती है। मैं इनमें गोबर की खाद और फसल में एक दो बार लस्सी छिड़कती हूं। खुद खाती हूं और आसपास की महिलाओं को भी बेच देती हूं तो 80-150 रुपए की आमदनी भी हो जाती है।"

दलजीत कौर के पति को एसिडिटी समेत कई समस्याएं हैं वो ज्यादा पढ़ी लिखी नहीं है लेकिन कहती हैं उन्हें इतना पता है कि उनके पति को यूरिक एसिड समेत कई बीमारियां खाद (यूरिया) और स्प्रे (कीटनाशकों) के चलते हुई है।

पंजाब भारत का सबसे उपजाऊ क्षेत्र रहा है। यहां का कुल भौगोलिक क्षेत्रफल 50.36 लाख हेक्टेयर है। इसमें से करीब 42.23 लाख हेक्टेयर क्षेत्र खेती के लिए इस्तेमाल किया जाता है। इसमें 98 फीसदी खेतों तक पानी पहुंचता है। किसानों के लिए बिजली फ्री है। गेहूं धान समेत कई फसलों का बंपर उत्पादन होता है। लेकिन इसका स्याह पहलू ये है कि पंजाब में उर्वरक-कीटनाशकों के अंधाधुंध प्रयोग ने किसानों को कर्जदार और बीमार भी बनाया है।

रिपोर्टिंग सहयोग- दिति बाजपेई

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