Hridayesh Joshi

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  • बदमिजाज मौसम की मार और किसान लाचार

    इंदौर से 40 किलोमीटर दूर सकलोडा गांव के किसानों की कई बीघे ज़मीन पर लगी फसल मौसम की भेंट चढ़ गई है। बुधवार मध्य रात्रि के बाद हुई बारिश और ओलावृष्टि ने यहां किसानों पर एक बार फिर चोट की। पाला पड़ने से किसानों की फसल को पहले ही काफी नुकसान हुआ है और अब उन्हें सब कुछ बरबाद हुआ लगता है। देपालपुर...

  • प्रसूति गृहों में महिलाओं की स्थिति पूरे देश की स्वास्थ्य व्यवस्था का आइना

    लखनऊ। राजस्थान के तमाम सरकारी अस्पतालों के प्रसूति गृहों में महिलाओं के साथ जो हो रहा है, वह हमारी स्वास्थ्य व्यवस्था की नाकामी के साथ साथ हमारे समाज का भी एक घिनौना चेहरा पेश करता है। समाचार पत्र दैनिक भास्कर ने राज्य के 13 जिलों के 92 अस्पतालों का दौरा कर एक रिपोर्ट छापी है जो प्रसव के लिये...

  • कैसे करें एंटीबायोटिक्स का इस्तेमाल: डॉक्टरों के लिए विशेष गाइडलाइन्स

    इस समय एंटीबायोटिक्स के प्रयोग के मामले में लोगों में काफी कन्फ्यूजन है। कहा जा रहा है कि एंटीबायोटिक्स का प्रयोग सीधे लीवर और किडनी को प्रभावित करता है। वहीं दूसरी तरफ आमधारणा यह भी है कि कोई भी बीमारी बिना एंटीबायोटिक्स के प्रयोग से ठीक भी नहीं हो सकती। इसी संबंध में गांव कनेक्शन के सीनियर...

  • सूख रही हैं जल-स्रोतों से निकलने वाली नदियां

    गगास घाटी का एक दृश्य, सैकड़ों हेक्टेयर में फैले उपजाऊ तट पर गगास नदी के जरिए सिंचाई की जाती है। फोटो: हृदयेश जोशीपहाड़ की चोटी से एक समृद्ध हरी-भरी घाटी दिखती है। गेहूं, सरसों, बाजरा और तरह-तरह की सब्ज़ियों से भरे खेत नज़र आते हैं। खेतों की ओर इशारा करते 27 साल के भूपेंद्र सिंह बिष्ट की...

  • कौन था वह ज़िद्दी किसान जो गांधी को चम्पारन ले कर गया?

    मोहनदास करमचंद गांधी 45 साल की उम्र में 1915 में जब भारत लौटे तो ज़मीन एक क्रांति के लिये तैयार थी। अपने राजनीतिक गुरु गोपालकृष्ण गोखले की सलाह पर वह करीब एक साल तक सक्रिय राजनीति से दूर ही रहे और उन्होंने भारत का व्यापक दौरा किया। दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटे गांधी को उस वक्त अपने देश के बारे में...

  • क्या न्यूनतम आय गारंटी का दांव व्यवहारिक और कारगर है?

    कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने न्यूनतम आय गारंटी यानी यूनिवर्सल बेसिक इंकम (यूबीआई) की बात कहकर लोकसभा चुनावों में नई हलचल मचा दी है। अब बीजेपी का संकट यह है कि यूबीआई के बारे में खुद प्रधानमंत्री के प्रमुख आर्थिक सलाहकार रहे अरविन्द सुब्रमण्यम ने कहा था कि यह बहुत ललचाने वाली और आकर्षक योजना है।...

  • सौर ऊर्जा में अच्छी तरक्की लेकिन रूफटॉप सोलर के मामले में फिसड्डी

    सौर ऊर्जा के संयंत्र लगाने और कार्बन रहित ऊर्जा (सौर, पवन और जलविद्युत) की उत्पादन क्षमता के लक्ष्य हासिल करने की दिशा में तो भारत ने पिछले कुछ सालों में अच्छी तरक्की की है, लेकिन छतों पर लगने वाले सोलर पैनल (Rooftop Solar) और उससे बिजली हासिल करने के मामले में उसका प्रदर्शन फिसड्डी ही है। भारत...

  • उत्तर भारत में दम घोंटने वाले हाल और एक्शन प्लान के नाम पर सरकार का झुनझुना

    एक ओर देश की राजधानी दिल्ली में वायु प्रदूषण का स्तर गंभीर बना हुआ है और दूसरी ओर यूपी की राजधानी लखनऊ में एक एनजीओ द्वारा लगाये गये कृत्रिम फेफड़े दो दिन में ही मटमैले पड़ गये। यह तथ्य बताते हैं कि हम बहुत ख़तरनाक प्रदूषण की ज़द में हैं और सांस की बीमारी का शिकार होने के साथ हमारे फेफड़ों और ख़ून...

  • हम टिक-टिक करते टाइम बम पर बैठे हैं… कहां जायें?

    'मैं किसी काम का नहीं रह गया हूं। ज़मीन पर पड़ी पेंसिल तक नहीं उठा सकता। चलने फिरने में दिक्कत होती है। कभी सोचता हूं कि मैं क्यों जिन्दा हूं। इस उम्र में छड़ी लेकर चलता पड़ता है मुझे शर्म आती है।' पुणे से आये 49 साल के दिनेश पिल्लई पहली नज़र में देखने में ठीक-ठाक लगते हैं लेकिन 2004 में हुई...

  • पलायन से टक्कर: विपरीत हालात में उम्मीद जगाते ये नायक

    गांवों से शहरों की ओर पलायन विकट समस्या बनता जा रहा है। उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्य में पलायन की समस्या अधिक विकराल है क्योंकि यहां जनजीवन का पर्यावरण और पारिस्थितिकी से भी करीबी रिश्ता है। सरकार खुद मानती है कि आज राज्य के 1000 से अधिक राज्य खाली हो चुके हैं और अलग अलग आंकलन इस संख्या को 3500 के...

  • उत्तराखंड में सास को बचाने के लिये 15 मिनट तक तेंदुए से जूझती रही बहू

    उत्तराखंड की चौखुटिया और द्वाराहाट तहसील के कई इलाकों में इन दिनों तेंदुए का आतंक पसरा है। पिछले तीन हफ्तों में तेंदुए ने की ग्रामीणों पर हमला किया और दो लोगों को जान से मार डाला है। आतंक इतना अधिक है कि यहां लोग अंधेरा होने के बाद घरों से नहीं निकल रहे। पिछली 23 दिसंबर को तेंदुए ने चौखुटिया के...

  • Auschwitz Concentration Camp : जहां हिटलर के आतंक के निशान आज भी मौजूद हैं

    पोलैंड। विश्व इतिहास के सबसे रक्त रंजित पन्नों में है बीसवीं सदी। दो विश्व युद्ध और लम्बे शीत युद्ध के अलावा हिंसा के कई अध्याय इसमें शामिल हैं। अलग-अलग अनुमान बताते हैं कि 7 से 8 करोड़ लोग तो दो विश्व युद्धों में ही मारे गये। लेकिन इसके अलावा इसी दौर में टर्की में ऑटोमन साम्राज्य की सरपरस्ती में...

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