जानें करेले में किस तरह करें संकर बीज का उत्पादन

जानें करेले में किस तरह करें संकर बीज का उत्पादनप्रतीकात्मक तस्वीर

लखनऊ। वैसे तो करेले को गर्मी और वर्षा दोनों मौसमों में उगाया जा सकता है लेकिन संकर बीज के उत्पादन के लिए मौसम जितना गर्म को उतना अच्छा रहता है क्योंकि इस मौसम में कीड़े लगने का खतरा कम रहता है। तापमान 25 से 35 डिग्री के बीच रहे तो फसल अच्छी तरह बढ़ती और उसमें ज़्यादा फलन होता है। बीजों के जमाव के लिए 22 से 25 डिग्री तक का तापमान अच्छा होता है।

क्या होता है संकर बीज

संकर बीज यानि हाइब्रिड सीड वे बीज कहलाते हैं जो दो या अधिक पौधों के संकरण (क्रास पालीनेशन) द्वारा उत्पन्न होते हैं। संकरण की प्रक्रिया अत्यंत नियंत्रित व विशिष्ट होती है।

संकर बीज उत्पादन के लिए कैसा हो खेत

जिस खेत में आपको संकर बीज के उत्पादन के लिए फसल उगानी हो वहां अपने आप उग आने वाले पौधों पर रोग लगानी होगी। इसके अलावा इस बात पर भी ध्यान देना होगा कि खेत की मिट्टी बलुई या दोमट और उपजाऊ होनी चाहिए। खेत समतल होना चाहिए और उसमें जल निकासी व सिंचाई व्यवस्था भी अच्छी होनी चाहिए।

संकर बीज उत्‍पादन फसल के लिए चयनित खेत स्‍वैछिक रूप से उगने वाले पौधों से मुक्‍त होना चाहिए तथा खेत की मिटटी बुलई दोमट या दोमट व उपजाऊ होनी चाहिए। खेत समतल तथा उसमें जल निकास व्‍यवस्‍था के साथ सिचाई की समुचित व्‍यवस्‍था होनी चाहिए।

कहां से लें बीज

संकर बीज के उत्पादन के लिए पैतृक जननो के बीज सम्‍बधित कृषि अनुसंधान संस्‍थान या कृषि विश्‍वविद्यालय से ही लेने चाहिए।

पृथक्‍करण दूरी

संकर बीज उत्पादन के लिए फसल तैयार करते वक्त इस बात का भी ध्यान रखें कि करेले की अन्य प्रजातियों की फसल से इसकी दूरी कम से कम 1000 मीटर होनी चाहिए। अगर नर व मादा पैतृकों की बुवाई अलग अलग खन्‍डो में की गयी है तो उनके बीच कम से कम 5 मी. की दूरी आवश्‍यक है ।

पुष्‍प जैविकी

करेला उभयलिंगाश्री पौधा है। यह वे पौधे होते हैं जिनमें नर व मादा फूल एक ही पौधे पर लगते हैं। फूलों का रंग पीला व नर फूलों के डंठल मादा फूलों से लम्‍बे होते हैं। मादा फूलों में नीचे करेले जैसी आकृतिया होती हैं। नर फूलों की संख्‍या मादा फूलों से बहुत अधिक होती है। करेले की फसल में पुष्‍पन सुबह 5.30 से 9.30 बजे के बीच होता है। नर फूलों में परागण प्रात: 7.30 तक प्रचुर मात्रा में मिलते हैं। करेले की फसल की यह भी खास बात है कि इसमें फूल सिर्फ एक दिन के लिए ही खिलतें हैं।

किस तरह मिलाएं खाद और उर्वरक

फसल अच्छी हो इसके लिए 25-30 टन गोबर की खाद या कम्‍पोस्‍ट खाद को बुवाई से 25-30 दिन पहले एक हैक्टेयर खेत में मिलाना चाहिए। अच्छा रहेगा बुवाई से पहले नालियों में 50 किलो डीएपी, 50 किलो म्‍यूरेट आफ पोटास का मिश्रण प्रति हैक्‍टेयर के हिसाब से (500 ग्राम प्रति थमला) मिलाएं। 30 किलो यूरिया बुवाई के 20-25 दिन बाद व 30 किलो यूरिया 50-55 दिन बाद पुष्‍पन व फलन के समय डालना चाहिए। यूरिया सांय काल मे जब खेत मे अच्‍छी नमी हो तब ही डालना चाहिए।

कितना डालें बीज और किस तरह करें बुवाई

मादा पैतृक के लिए 1.75 किग्रा तथा नर पैतृक के लिए 0.5 किग्रा बीज प्रति एकड़ पर्याप्‍त होता है। पौध तैयार करके बीज फसल लगाने पर बीज मात्रा में कमी की जा सकती है। बुवाई पूर्व बीजों को बाविस्‍टीन (2 ग्रा प्रति किलो बीज दर से) के घोल में 18-24 घंटे तक भिगोये तथा बुवाई के पहले निकालकर छाया में सुखा लेना चाहिए। बीज 2 से 3 इंच की गहराई पर करना चाहिए। बुआई दो प्रकार से की जाती है (1) सीधे बीज द्वारा (2) पौध रोपण द्वारा संकर बीज उत्‍पादन के लिए बुवाई/रोपाई नालियों में केवल एक तरु करनी चाहिए तथा नालिया बनाते समय क्षेत्र विशेष में हवा की दिशा का ध्‍यान मे रखना चाहिए। उत्‍तर भारत में बुवाई/रोपाई नालियों में मेंढो पर पूर्व दिशा में करना चाहिए तथा नालिया उत्‍तर दक्षिण दिशा मे बनाते हैं।


फसल अंतरण

नाली से नाली की दूरी 2 मी., पौधे से पौधे की दूरी 50 सें.मी. तथा नाली की मेढ़ों की ऊंचाई 50 सेमी रखनी चाहिए। नालियां समतल खेत में दोनो तरफ मिट्टी चढ़ाकर बनाएं। खेत मे 1/5 भाग मे नर पैतृक तथा 4/5 भाग में मादा पैतृक की बुवाई अलग अलग खण्‍डों में करनी चाहिए।

परागण विधि

करेले में नर और मादा फूल एक ही पौधे में लगते हैं इसलिए इसमें संकर बीज उत्‍पादन के लिए हाथ से परागण करना ही अच्छा रहता है और इसकी प्रचलित विधि भी यही है। इस विधि में मादा पैतृकों में से नर फूलों को खिलने से पहले ही तोड़ दिया जाता है। साथ ही मादा फूलों को भी खिलने से दिन पहले शाम के समय बटर पेपर बैग (7.5x12 से.मी) में बंद कर देते हैं। लिफाफे में हवा आने जाने के लिए 5-6 छेद अवश्‍य करें। इसी प्रकार नर पैतृक पौधों में नर फूलों को भी बटर पेपर बैग या नमी ना सोखने वाली रूई से अच्‍छी तरह ढक देते हैं। अगले दिन नर खंड से नर फूलों को तोड़कर इक्‍कटठा कर लें व मादा पैतृक में मादा फूल का लिफाफा हटाकर हाथ से परागकोष को रगड़कर या परागकणों को इक्‍कट‍्ठा करके ब्रुश से परागण करें। परागण के तुरन्‍त बाद मादा फूलों को दोबारा ढक दें। मादा फूलों का बटर पेपर बैग 8-10 दिन बाद ही हटायें। एक पौधे पर इस प्रकार से 4-5 फल तैयार करें। अधिक फल बनने से फल पूरी तरह विकसित नहीं हो पाते।

किस तरह करें फसल की देखभाल

जिस खेत में संकर बीज का उत्पादन किया जाए उसका चार अवस्‍था में निरीक्षण करना चाहिए। प्रथम पुष्‍पन से पूर्व, जिसमें मादा व नर पैतृकों की बढ़वार, पत्‍ते की आकृति रंग व ऊपर के हिस्से पर रोएं आदि को देखकर फालतू के पौधे को निकाल दें। दूसरी व तीसरी बार पुष्‍पीय लक्षणों एवं फलों के आधार पर अवांछनीय पौधों को पहचानकर निकालते हैं। चौथी बार फलों की तुड़ाई व पकने पर फलों के विकास, रंग आकार एवं रोग आदि की स्थिति को ध्‍यान में रखकर अवांछनीय पौधों व फलों को हटाएं।

इस तरह तोड़ें फसल और निकालें बीज

करेले की फसल में फल फल परागण के 28 से 30 दिन बाद पकने लगते हैं। जब फल नारंगी हो के हो जाएं तब ही इन्हें तोड़ना चाहिए क्‍योंकि कम पके फल में बीज पूरी तरह से वकिसत नहीं होते हैं। अधिक पकने पर फल फट जाते हैं और बीज का नुकसान होता है और कभी-कभी पक्षियों द्वारा भी बीज का नुकसान हो जाता है। पके फलों को दो भागों में फाड़कर हाथ से बीजों को निकाले तथा रेत या साफ मिट्टी से मसलकर बीजों से चिपचिपी झिल्‍ली को हटा देना चाहिए। इसके बाद बीजों को साफ बहते पानी में धुलाई करके तेज धूप में सुखाना चाहिए।

बीज उपज

उत्‍तर भारत में दक्षिण भारत की अपेक्षा बीज उपज बहुत कम होती है। दिल्‍ली में 15 से 18 बीज प्रति फल जबकि रानीबेनूर में औसत 25 से 28 बीज प्रति फल मिल जाते हैं। इसी प्रकार दिल्‍ली में 4 से 6 फल प्रति पौधा जबकि रानीबेनूर में औसत 15 से 18 फल प्रति पौधा मिलते हैं। उत्‍तर भारत में 30-45 किग्रा तथा दक्षिण भारत में 150-180 किग्रा बीज प्रति एकड़ उपज मिलती है। 1000 बीजों का भार 150 से 170 ग्राम होता है।

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