एक बार फिर मक्का की फसल बर्बाद कर रहा फॉल आर्मीवर्म

पिछले कुछ सालों में देश के अलग-अलग राज्यों में फॉल आर्मीवर्म का प्रकोप देखा गया है, जहां पर मक्का की फसल नहीं होती वहां पर गन्ने जैसी फसलों को भी यह कीट नुकसान पहुंचाता है।

Ajay MishraAjay Mishra   3 April 2021 7:47 AM GMT

एक बार फिर मक्का की फसल बर्बाद कर रहा फॉल आर्मीवर्म

कन्नौज में मक्के की फसल में फॉल आर्मीवर्म के बारे में किसानों को जागरूक करते कृषि अधिकारी। 

कन्नौज। एक बार फिर मक्का की फसल में फॉल आर्मीवर्म दिखने लगे हैं, पिछले कुछ साल में देश के अलग-अगल हिस्सों में फॉल आर्मीवर्म ने मक्का की फसल को काफी नुकसान पहुंचाया था।

उत्तर प्रदेश के कन्नौज के जिला कृषि अधिकारी राममिलन सिंह परिहार ने गांव कनेक्शन को बताया कि वह किसी काम से निकले थे। इसी दौरान ब्लॉक कन्नौज क्षेत्र के गांव रौनी हुसैनपुर निवासी रामनरेश के खेत में खड़ी मक्का फसल में फॉल आर्मी वर्म कीट देखा। सम्बंधित किसान को बुलाया और जानकारी की।

जिला कृषि अधिकारी ने किसानों को सावधान रहने की बात कहते हुए जागरूक करने के लिए ब्लॉकों में टीमों का गठन भी कर दिया है। जिला कृषि अधिकारी आगे बताते हैं, "रामनरेश को कीट से बचने के उपाय भी बताए गए। कहा कि विदेशी कीट न्यून स्तर पर है। इससे बचाव करना जरूरी है, नहीं तो फसल को करीब 50 फीसदी तक नुकसान हो सकता है। उन्होंने बताया कि करीब 60 हजार हेक्टेयर जमीन पर कन्नौज में मक्का की फसल होती है।"

किसानों को दी अधिकारी ने यह सलाह

जिला कृषि अधिकारी/प्रभारी जिला कृषि रक्षा अधिकारी राममिलन सिंह परिहार ने बताया कि किसान खेतों में पक्षियों को बिठाने के लिए आठ से 10 वर्ड परचर (टी या वाई आकार की छह से आठ फुट लंबी लकड़ी) का प्रयोग प्रति एकड़ में करें। शाम को खेत में चार से पांच जगह फेरो मैन ट्रेप (प्रकाश प्रपंच) का प्रयोग कर सकते हैं। लकड़ियों पर पक्षी बैठते हैं, वह फसल में जब कीट देखेंगे तो उसका शिकार करेंगे, इससे कमी आएगी।

किसान यह प्रयोग भी कर सकते हैं

जिला कृषि अधिकारी का तर्क है कि 30 से 35 दिन की फसल में नौ अनुपात एक बालू और चूना मिलाकर मक्का की फसल पर बुरकाव करें। साथ ही नीम ऑयल पांच मिली लीटर प्रति लीटर पानी में मिलाकर फसल में छिड़काव करें। रसायनिक उपचार के लिए इमामेक्टिन वेन्जोऐट प्वाइंट चार ग्राम प्रति लीटर थायोमेक्सॉन 12.6 प्रतिशत एवं लैम्डासाइहैलोथ्रिन 9.5 प्रतिशत की प्वाइंटर पांच मिली मात्रा को प्रति लीटर पानी में मिलाकर आवश्यकता के तहत छिड़काव करें।

पिछले पंजाब के लुधियाना में इस कीट को देखा गया था। फोटो: अरेंजमेंट

विदेशी कीट ऐसे पहुंचाता है फसल को नुकसान

विदेशी कीट सूड़ी की तरह होता है। यह पत्तियों में छेद कर देता है। बाहरी किनारों पर उत्सर्जित पदार्थों जो भूसे के बुरादे की तरह मटमैला या काला होता है, उससे नुकसान पहुंचता है।

एक हजार तक अंडे देता है कीट

मादा फॉल आर्मीवर्म कीट एक बार में आठ सौ से एक हजार अंडे पत्तियों की निचती सतह पर देती है। जो एक झिल्ली की आक्रति से ढके होते हैं और दो से तीन दिन में कीट की सूड़ी जाल की तरह फसल के पौधे में फैल जाती है।

जैविक नियंत्रण विभाग लखनऊ के सम्पर्क में हैं अधिकारी

करीब तीन साल पहले जिले में विदेशी कीट फॉल आर्मीवर्म की पहचान हुई थी। इस बार भी प्रकोप शुरू हो गया है। उसकी रोकथाम और किसानों को जागरूक करने के लिए ब्लॉकों में दो-दो सदस्यीय टीमें गठित कर दी गईं हैं। जिला कृषि अधिकारी राममिलन सिंह परिहार ने बताया कि जनपद के आठों ब्लॉकों में प्रभारी कृषि रक्षा इकाई और सहायक विकास अधिकारी कृषि रक्षा की टीमें गठित हो गईं हैं। यह टीमें किसानों के सम्पर्क में रहेंगी। मक्का की फसल में लग रहे फॉल आर्मीवर्म कीट के बारे में जानकारी भी जुटाएंगी। किसानों को भी इस कीट से बचने के लिए टिप्स दिए जाएंगे। जिला कृषि अधिकारी का कहना है कि भारत सरकार के लखनऊ में स्थित जैविक नियंत्रण विभाग के भी सम्पर्क में वह हैं।

साल 2018 में पहली बार देखा गया था कीट

इस कीट को सबसे पहले भारत में पहली बार 18 मई 2018 को कर्नाटक के शिवामोगा में देखा गया। बाद में फॉल आर्मीवर्म को तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, गुजरात, छत्तीसगढ़, केरल, राजस्थान, झारखण्ड, मिजोरम, मणिपुर, नागालैंड, त्रिपुरा, मेघालय, अरूणाचल प्रदेश और सिक्किम में हानिकारक स्तर तक किसानों के खेतों में रिपोर्ट किया गया।

मुख्य रूप से मक्का का एक कीट है। यदि मक्का की फसल उपलब्ध नहीं होती है तो यह ज्वार की फसल पर आक्रमण करता है। यदि दोनों ही फसलें उपलब्ध नहीं हैं तो यह अन्य फसलों जैसे- गन्ना, चावल, गेहूं, रागी, चारा घास आदि जो कि घास कुल की है पर आक्रमण करता है। यह कपास और सब्जियों को भी नुकसान पहुंचा सकता है। फॉल आर्मीवर्म के वयस्क पतंगे तीव्र उड़ान भरने वाले होते हैं जो मेजबान पौधों की तलाश में 100 किलोमीटर से भी अधिक उड़ सकते हैं।

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