किसानों को रैट फीवर से खतरा, जान भी जा सकती है

Ashwani NigamAshwani Nigam   31 March 2017 5:54 PM GMT

किसानों को रैट फीवर से खतरा, जान भी जा सकती हैखेत में किसान।

लखनऊ। खेत-खलिहानों में काम करने वाले किसानों और मजदूरों के लिए चूहा एक बड़ा दुश्मन बन रहा है। एक तरफ जहां यह फसलों और अनाजों को नुकसान पहुंचा रहा है वहीं इसकी वजह से किसानों को रैट फीवर नामक बीमारी हो रही है, जो सीधे किडनी को प्रभावित करती है।

बैक्टीरिया और वायरस से फसल और कृषि उत्पाद को होने वाले नुकसान से बचाने के लिए अनुसंधान करने वाले राष्ट्रीय जैविक स्ट्रैस प्रबंधन संस्थान, रायपुर के वैज्ञानिक डाॅ. टीपी राजेन्द्रन ने बताया '' अभी तक लोग मानते थे कि चूहा सिर्फ खाद्यान्न को ही नुकसान पहुंचता है लेकिन शोध में पता चला है कि चूहे से रैट-फीवर नामक बीमारी खासकर खेतों में काम करने वालों को हो रही है। सबसे खतरनाक बात यह है कि सामान्य जांच में इस बीमारी के बारे मे पता ही नहीं चलता है। समय रहते अगर इसका इलाल नहीं हुआ तो इसके वायरस किडनी को प्रभावित करते हैं। ''

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उन्होंने बताया कि चूहे के मल-मूत्र से प्रभावित अनाज के जरिए यह बीमारी पशुओं के साथ ही लोगों में पहुंचती है। उन्होंने कहा कि इस बीमारी से प्रभावित होने पर शुरुआत में बुखार आता है। इसके बाद लेप्टोसपायरिया नामकी बीमारी होती है। इसके वायरस किडनी पर हमला करते हैं और जिससे आम आदमी की जान भी जा सकती है। डाॅ. राजेन्द्रन ने कहा कि इस बीमारी का खतरा गांवों में अधिक है।

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राष्ट्रीय जैविक स्ट्रैस प्रबंधन संस्थान ने किसानों ओर पशुओं पर रेट फीवर बीमारी केा लेकर शोध किया जिसमें पता चला कि जिन खेतों और खिलहानों में चूहे अधिक होते हैं वहां पर काम करने वाले लोगों में यह बीमारी ज्यादा होती है। ऐसे में किसानों केा इस बीमारी से बचाने के लिए राष्ट्रीय जैविक स्ट्रेस प्रबंधन संस्थान ने आम लोगों के बीच जागरुकता कार्यक्रम चलाने के साथ 72 प्रशिक्षक तैयार किए हैं। जो किसानों के बीच जाकर इस बीमारी से कैसे बचा जाए इसकी ट्रेनिंग दे रहे हैं।

रैट फीवर मनुष्यों के साथ ही जानवरों को भी अपनी चपेट में ले रहा है। राष्ट्रीय जैविक स्ट्रेस प्रबंधन संस्थान ने अपनी शोध में बताया है कि चूहों के मल-मूत्र चारे के साथ पशुओं के पेट में चले जाते हैं। जिससे रैट फीवर का वायरस उनके अंदर भी विकसित होने लगता। इसे पशु बीमार हो जाता और अगर समय पर इलाज नहीं हुआ तो उसकी मौत हो सकती है।

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राष्ट्रीय जैविक स्ट्रैस प्रबंधन संस्थान के निदेशक डाॅ. जगदीश कुमार ने बताया कि इस संस्थान की स्थापना साल 2012 में की गई थी। इसका संचालन भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद की तरफ से किया जाता है। इस संस्थान की तरफ से पूरे देश के किसानों की फसलों को चूहे से बचाने के लिए अखिल भारतीय चूह प्रबंधन परियोजना चल रही है। सस्थान के वैज्ञानिक फसलों के साथ ही मवेशियों और किसानों-मजदूरों को जीवाणु और विषाणु से होने वाली बीमारियों से बचाने के लिए लगातार शोध कर रहे हैं।

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