विलुप्त होती जेठी सांवा की खेती के लिए सरकार दे रही मदद

विलुप्त होती जेठी सांवा की खेती के लिए सरकार दे रही मददफोटो साभार: इंटरनेट

अश्वनी कुमार निगम

लखनऊ। स्वास्थ्य कारणों से पूरे देश में छोटे और मोटे अनाजों की मांग बढ़ रही है। बड़े बाजार से लेकर माल तक सांवा, कोदो और बाजरा जैसे अनाज की खपत बढ़ रही है लेकिन इसके बाद भी जानकारी के अभाव और सरकारी सहायता के अभाव में किसान मोटे अनाजों की खेती से मुंह मोड़ रहे हैं। ऐसी एक फसल जेठी सांवा है, जो उत्तर प्रदेश में विलुप्त होने की कगार पर है।

पहले आलू, सरसों और गन्ना की फसल कटने के बाद खाली हुए खेत में जेठी सांवा की खेती होती थी लेकिन अब यह देखने को नहीं मिलती है। ऐसे में उत्तर प्रदेश कृषि विभाग इसकी खेती को बढ़ावा देने के लिए सहायता दे रहा है। उत्तर प्रदेश कृषि विभाग के निदेशक ज्ञान सिंह ने बताया '' प्रदेश में जेठी सांवा की खेती केवल जायद में होती है। इसे जायद सांवा के रूप में भी जाना जाता है। किसान इसकी खेती कर सकें इसके लिए भावना नामक प्रजाति के बीज किसानों को उपलब्ध कराए जा रहे हैं। '' जेठी सांवा को चेना भी कहा जाता है।

नरेन्द्र देव कृषि एवं प्राैद्योगिकी विश्वविद्यालय के कृषि वैज्ञानिक डा. ए.के़ सिंह ने बताया, ''जेठी सांवा में भरपूर मात्रा में पोषक तत्व पाए जाते हैं साथ ही इसमें 11 प्रतिशत प्रोटीन की मात्रा पाई जाती है इसलिए जेठी सांवा को भोजन में शामिल करने से प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। ''

जेठी सांवा की खेती फरवरी महीने अंत से लेकर मार्च पूरे मार्च में की जाती है। यह फसल 65 से लेकर 70 दिन में पककर तैयार हो जाती है। उत्रर प्रदेश कृषि निदेशक ने बताया कि प्रदेश के सभी किसान जेठी सांवा की अच्छी पैदावार ले सके इसके लिए राज्य प्रजाति विमोचन समिति ने भावना प्रजाति को अपनी संस्तुति दी है। यह प्रजाति 12-15 कुंतल प्रति हेक्टेयर उपज देती है।

कृषि वैज्ञानिक डा. आर.के. यादव ने बताया कि जेठी सांवा की खेती के लिए किसानों को खेत की मिट्टी का विशेष ध्यान रखना चाहिए। उन्होंने बताया कि इसके लिए जलधारण शक्ति वाली मिट्टी अच्छी रहती है। इसके लिए दोमट, हल्की दोमट एवम मटियार जमीन अच्छी होती है। उन्होंने बताया कि खेत में जब पर्याप्त नमी हो तभी इसकी बुवाई करनी चाहिए। इसके अलावा बुवाई कतारों में 23 सेंटीमीटर की दूर पर करनी चाहिए। उन्होंने बताया कि 5 से लेकर 8 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर के हिसाब से इसकी बुवाई करनी चाहिए। चूंकि इसके बीज का छिलका कड़ा होता है ऐसे में बोने से पहले बीज को रातभर पानी में भिगोकर रखना चाहिए। बुवाई के समय इसके छानकर थोड़ा सुखाकर बोना चाहिए।

जेठी सांवा की फसल में सिंचाई काफी महत्वपूर्ण होती है। सिंचाई की संख्या, मौसम और मिट्टी की किस्म पर निर्भर करता है। कृषि वैज्ञानिक डॉ ए.के. सिंह के अनुसार अच्छी उपज पाने के लिए जेठी सांवा में 6 से लेकर 8 सिंचाई की जरूरत होती है। लेकिन सिंचाई हल्की होनी चाहिए। पहली सिंचाई पौधों में 2 से 3 पत्तियां आने पर करनी चाहिए। जेठी सांवा में झुलसा रोग लगने की भी संभावना रहती है। ऐसे में इस रोग से बचने के लिए 2 किलोग्राम जिंक मैंगनीज कार्बोमेट या जीरम 80 प्रतिशत 3 किलोग्राम को पानी में घोलकर पौधों पर डालना चाहिए। जेठी सांवा में जैसी ही पौधे का रंग पीला, भूरा ओर दउना कड़क चमकदार हो जाए तो समझ लेना चाहिए कि फसल पक गई। इसके बाद इसकी कटाई कराकर डंडे से पीटकर या बैलों को चलाकर इसका दाना अलग कर लेना चाहिए।

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