हाइिब्रड बीजों से परागण में कमी

हाइिब्रड बीजों से परागण में कमीकिसानों द्वारा खेतों में इस्तेमाल किए जा रहे हाइब्रिड बीज।

सुधा पाल

लखनऊ। किसानों द्वारा खेतों में इस्तेमाल किए जा रहे हाइब्रिड बीजों का असर शहद उत्पादन पर पड़ रहा है। इन बीजों के कारण मधुमक्खियों के परागण में कमी आ रही है।

अधिक मात्रा में हाइब्रिड बीजों से तैयार होने वाली फसलों के फूलों में देसी बीजों के मुकाबले कम पराग होता है। मधुमक्खियां हाइब्रिड बीजों से तैयार एक फूल के जरिए केवल 15 से 20 दिन तक ही उनसे अपना भोजन प्राप्त कर सकती हैं, जबकि देसी बीजों के फूलों से मक्खियां एक से डेढ़ महीने तक पराग ले सकती हैं।

कोहरा और ठंड से मधुमक्खियों को पराग नहीं मिल रहा। तीन साल से मौसम की मार मधुमक्खीपालकों पर पड़ रही है।
अमृत कुमार वर्मा, वरिष्ठ स्रोत सहायक, (उद्यान एवं खाद्य प्रसंस्करण विभाग, उप्र)

यही वजह है कि मक्खीपालक परागण के लिए जगह-जगह पलायन करने को मजबूर हैं। गोसाईगंज के मधुमक्खी पालक बृजेश कुमार बताते हैं, ‘कंपनियां भी हाइब्रिड बीजों को बढ़ावा दे रही हैं। कई लोगों ने तो यह काम भी छोड़ दिया है। अब दूसरा काम कर रहे हैं। यहां ज्यादातर युवा ही हैं जो इस व्यवसाय से जुड़े हैं।’ उद्यान व खाद्य प्रसंस्करण विभाग के महासंघ के अध्यक्ष बलराम सिंह ने बताया कि लगभग चार करोड़ रुपए तक के हाइब्रिड बीज किसानों द्वारा खरीदे जाते हैं और हर वर्ग के किसान के लिए सब्सिडी की धनराशि अलग है। जहां अनुसूचित वर्ग के किसानों को 80 फीसदी सब्सिडी दी जाती है वहीं सामान्य वर्ग के किसानों को 40 फीसदी दी जाती है।

यूकेलिप्टस-लीची परागण के लिए फायदेमंद

मधुमक्खीपालक बृजेश कुमार के अनुसार, ‘इस समय सरसों के फूल ही परागण के मुख्य स्रोत हैं। यूकेलिप्टस और लीची केके फूल भी परागण के अच्छे स्रोत हैं। लखनऊ के गोसाईंगंज क्षेत्र में सबसे अधिक संख्या में लोग मधुमक्खीपालन करते हैं। यही वजह है कि इस क्षेत्र को हनीब्लॉक भी कहा जाता है। यहां एक 1000 परिवार मधुमक्खीपालन व्यवसाय से जुड़े हैं लेकिन उत्पादन न होने की वजह से यहां भी कई लोगों ने काम छोड़ दिया था।

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