पशुओं में दूध उत्पादन बढ़ा सकता है हर्बल उपचार

पशुओं में दूध उत्पादन बढ़ा सकता है हर्बल उपचार

ज्वोल (नीदरलैंड)। स्वादिष्ट भोजन बनाने में तो आपने मीठी नीम या करी पत्ते डालने के बारे में सुना ही होगा। त्वचा की कोमलता के लिए एलोवेरा का इस्तेमाल होता है। इन हर्बल औषधियों से पशुओं का बांझपन भी दूर किया जा सकता है। 

वर्ष 2002 से तमिलनाडु के तंजौर जिले में एक पशुचिकित्सा वैज्ञानिक इसी मुद्दे पर शोध कर रहे हैं कि बिना हार्मोन का इस्तेमाल किए, कैसे हर्बल औषधियों के उपयोग से पशुओं की प्रजनन क्षमता सुधारी जा सकती है। वो भी मुख्य रूप से गायों में। 

तमिलनाडु पशुचिकित्सा एवं जीव विज्ञान विश्वविद्यालय के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. एस. सतीश व उनकी टीम ने करी पत्ते से एक गाय का 30 दिन तक इलाज किया, इसके बाद उसमें गर्भधारण की प्रक्रिया सामान्य हो गई। बाँझपन दूर करने के लिए पशु को एलोवेरा, सहजन के पत्ते, करी पत्ता और हृदयजोत का मिश्रण दिन में चार बार 16 दिनों तक देने पर सफल परिणाम मिले।

राष्ट्रीय कृषि विज्ञान अकादमी द्वारा पशुओं पर 2013 में किए गए शोध के अनुसार बांझपन से जुड़ी समस्याओं से देश की गाय व भैंसों का 30-40 प्रतिशत हिस्सा प्रभावित है। दो से तीन करोड़ टन सालाना दूध के नुकसान के साथ ही, सालाना 50,000 करोड़ रुपये के दुग्ध व्यवसाय की हानि होती है।        

डॉ. सतीश बताते हैं, ''पशुओं के प्रजनन अंगों को लगातार काम करना होता है, लेकिन एक  स्थिति आती है कि इन अंगों का कार्य रुक जाता है, और प्रजनन क्रिया बाधित हो जाती है। इसे एनस्ट्रम कहते हैं। इस समय गाय में अंडोत्सर्ग (गर्भधारण के लिए अंडाणु बनने की प्रक्रिया) नहीं होती।"

''हर्बल औषधीय मिश्रण के लगातार इस्तेमाल करके बांझपन को दूर करने की सफलता दर 60 फीसदी है।ÓÓ डॉ. सतीश कहते हैं, ''इन हर्बल दवाइयों की मदद से बांझपन का इलाज इसलिए हो पाता है कि यह मिनरल से भरपूर होती हैं। इनमें हार्मोन जैसे अवयव होते हैं।"

डॉ. सतीश ने पारंपरिक उपचार के जानकारों से ज्ञान लेकर डॉ. सतीश ने इस हर्बल औषधीय मिश्रण का प्रयोग 30 संकर गायों पर किया। अब तक वो 150 गायों के बांझपन का सफलतापूर्वक इलाज कर चुके हैं।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पशुओं के इलाज के लिए प्राकृतिक औषधियों के प्रयोग को बढ़ावा देने के प्रयास शुरू हो गए हैं। हाल ही में नीदरलैंड के ज्वोल प्रांत में पशुचिकित्सा पर हुए अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में चार देशों नीदरलैंड, यूगांडा, इथोपिया और भारत के वैज्ञानिक, डेयरी चिकित्सक और विशेषज्ञों ने एंटीबायोटिक के बजाए प्राकृतिक उपचारों से इलाज पर चर्चा की। 

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