सिक्किम में कमाई करा रहा अंगोरा खरगोश, ऊन से बनाते हैं कई तरह के उत्पाद

यहां के किसानों को अंगोरा रैबिट प्रोजेक्ट से काफी फायदा हुआ है। क्योंकि चुबा के कई किसान भेड़ चराने वाले थे और पहले से ही भेड़ की ऊन की बुनाई में माहिर थे। गुरुंग समुदाय की एक स्वदेशी हथकरघा कला उन्हें उनके अपने बुजुर्गों से विरासत में मिली हुई थी। अब वो अंगोरा के ऊन से कई तरह के उत्पादन बनाने लगे हैं।

Sarikah AtreyaSarikah Atreya   21 Jan 2023 6:23 AM GMT

मध्य चुबा (दक्षिण सिक्किम), सिक्किम। कुछ यहां के किसानों की आय बहुत कम थी, घर चलाना मुश्किल हो रहा था, ऐसे में यहां पर अंगोरा प्रजाति के खरगोश से उम्मीद एक नई किरण नजर आयी है। यहां पर अंगोरा खरगोश के ऊन से कई तरह से उत्पाद बनाए जा रहे हैं।

राज्य की राजधानी गंगटोक से 56 किलोमीटर दक्षिण सिक्किम के चुबा में रहने वाले 15 किसानों की जिंदगी 2014 के बाद से काफी बदल गई है। यह वही साल था जब कृषि विज्ञान केंद्र (केवीके) नामथांग ने एक अनोखी पहल शुरू की और अंगोरा खरगोशों का पालन-पोषण एवं प्रजनन इन किसानों का मुख्य व्यवसाय बन गया। पारंपरिक कृषि से जुड़े इस क्षेत्र के किसानों के लिए यह प्रोजेक्ट खुद को आर्थिक रूप से मजबूत बनाने का एक विकल्प बन गया है।

चुबा-पेरबिंग जीपीयू के पंचायत अध्यक्ष अरुण कुमार गुरुंग इस पायलट परियोजना का हिस्सा रहे उन दस किसानों में से एक थे। उन्होंने बताया कि अंगोरा उद्यम से उन्हें काफी फायदा पहुंचा है।

गुरुंग ने कहा, “अंगोरा खरगोश पालन ने हमारे जीवन को बदल दिया। हमें पारंपरिक खेती के बेहतर विकल्प के लिए नहीं कहा गया था, बल्कि उसके साथ-साथ और कुछ भी करने की सलाह दी गई थी।” उनके मुताबिक, जब वे सिर्फ सब्जियां उगाते और भेड़ पालते थे, तो उन्हें ज्यादा पैसा नहीं मिल पाता था। उसकी तुलना में आज उनके परिवार की आय लगभग तीन गुना हो गई है।

अंगोरा ऊन की खेती करने से पहले मध्य चूबा के किसान आलू, गोभी, बीन्स, मटर और फूलगोभी जैसी मौसमी सब्जियां उगाते थे। गुरुंग ने कहा, "सब्जी की खेती और डेयरी हमारी आय का एकमात्र स्रोत थे। तब हमें मुश्किल से कभी-कभार थोड़ा-बहुत फायदा हो जाया करता था।"

दक्षिण सिक्किम, सिक्किम की शुष्क पट्टी के अंतर्गत आता है और यहां रहने वाले ज्यादातर लोग किसान हैं जो अपने खेतों की सिंचाई के लिए पूरी तरह से बारिश पर निर्भर हैं। उनकी आमदनी का मुख्य जरिया कृषि और पशुधन उत्पादन है। लेकिन न तो खेती से इतनी उपज हो पाती है और न ही पशुओं से मिलने वाले दूध या अन्य उत्पादन इतना होता है कि वे अपनी आर्थिक स्थिति को मजबूत कर सकें।

खरगोश जर्मन अंगोरा नस्ल के थे जिनकी ऊन की उपज अन्य नस्लों की तुलना में बेहतर होती है। प्रत्येक खरगोश की कीमत उसके ऊन के रंग पर निर्भर करती है।

जब 2007 में दक्षिण जिले के नामथांग ब्लॉक में केवीके दक्षिण सिक्किम की स्थापना की गई, तो इसने क्षेत्र के किसानों के लिए आय के वैकल्पिक स्रोतों का पता लगाना शुरू किया।

अंगोरा रैबिट प्रोजेक्ट उन्हें इसका एक बेहतर विकल्प नजर आया। दरअसल चुबा के कई किसान भेड़ चराने वाले थे और पहले से ही भेड़ की ऊन की बुनाई में माहिर थे। गुरुंग समुदाय की एक स्वदेशी हथकरघा कला उन्हें उनके अपने बुजुर्गों से विरासत में मिली हुई थी। बस यह सब देखते हुए इस गाँव को परियोजना के लिए चुना लिए गया।

शुरुआत में चुबा-परबिंग जीपीयू (ग्राम पंचायत इकाई) के सिर्फ 10 किसानों को प्रजनन के लिए अंगोरा खरगोश दिए गए थे। अंगोरा खरगोशों को उनके शरीर पर उगे हल्के वजन वाले लंबे रेशों के लिए पाला जाता है। इन्हीं से विश्व प्रसिद्ध अंगोरा ऊन मिलती है। कहा जाता है कि यह ऊन अन्य जानवरों से मिलने वाली ऊन से बेहतर होती है और इससे एलर्जी का डर भी नहीं होता। इसलिए बाजार में इसकी काफी मांग है।

2014 में केवीके नामथांग ने सिक्किम के उत्तरी जिले के राबूम फार्म कॉम्प्लेक्स, लाचेन में स्थापित एक न्यूक्लियस फार्म से तीस मूल अंगोरा खरगोशों को खरीदा था। अंगोरा खरगोशों के ये मूल स्टॉक मूल रूप से लाचेन से 2,100 किलोमीटर दूर कुल्लू, हिमाचल प्रदेश में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के एक फार्म से थे।

खरगोश जर्मन अंगोरा नस्ल के थे जिनकी ऊन की उपज अन्य नस्लों की तुलना में बेहतर होती है। प्रत्येक खरगोश की कीमत उसके ऊन के रंग पर निर्भर करती है। शुद्ध काले बालों वाले खरगोश की कीमत सबसे ज्यादा लगभग 3,500 हैं। ग्रे बालों वाले खरगोश की कीमत 3,000 रुपये और सफेद बालों वाले खरगोश की कीमत 2,500 रुपये है।

अंगोरा खरगोश गर्भधारण के 30-32 दिन बाद बच्चे को जन्म देते हैं। एक खरगोश से एक बार में पैदा हुए बच्चों की संख्या 5 से 11 तक हो सकती है। गर्भावस्था के 28वें दिन के आसपास मां के बाल झड़ना शुरू हो जाते हैं। खरगोश के बच्चे 15 दिनों के बाद अपनी आंखें खोलते हैं। यह वह समय है जब किसानों को अतिरिक्त सतर्क रहना पड़ता है क्योंकि खरगोश मां कई बार अपने नवजात बच्चों को खा जाती है। इसलिए मां और बच्चे के पोषण का खास ख्याल रखा जाता है। उन्हें दवाओं के जरिए विटामिन, और सप्लीमेंट्स दिए जाते है। उन्हें डिवर्मिंग दवाएं (कृमिनाशक दवाई) भी दी जाती है।

खरगोश खरीदने वाले इच्छुक किसानों को सबसे पहले उनके पालन-पोषण की ट्रेनिंग दी जाती है। उसके बाद लगभग छह महीने तक वह अन्य अनुभवी किसानों की गहन निगरानी में काम करते हैं।

प्रत्येक खरगोश की कीमत उसके ऊन के रंग पर निर्भर करती है। शुद्ध काले बालों वाले खरगोश की कीमत सबसे ज्यादा लगभग 3,500 हैं।

सब्जेक्ट मैटर स्पेशलिस्ट (पशु विज्ञान), केवीके, दक्षिण सिक्किम, डॉ. चेवांग नोरबू भूटिया ने बताया, “इस परियोजना को उस समय बढ़ावा मिला, जब 2018 में नाबार्ड ने ‘अंगोरा फार्मिंग – एन एवेन्यू फॉर लाइवलीहुड इंप्रूवमेंट एंड इनकम जेनरेशन फॉर दि फॉर्म्स ऑफ साउथ सिक्किम’ नामक एक परियोजना को मंजूरी दी थी।

यह सिर्फ एक गाँव में किसानों की आय बढ़ाने के लिए शुरू किया गया प्रयास था। इसके लिए 2018-19 में केवीके, दक्षिण सिक्किम ने नामथांग ब्लॉक में मध्य चूबा और 10 परिवारों को परियोजना का हिस्सा बनने के लिए चुना था।

किसानों को खरगोशों के रहने की जगह बनाने और ऊन निकालने के बारे में व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया गया। साथ ही उन्हें यह भी बताया गया कि इस दौरान उन्हें क्या करना है और क्या करने से बचना है। इसके बाद सिक्किम सरकार के पशुपालन और पशु चिकित्सा विज्ञान विभाग के तहत राबूम, उत्तरी सिक्किम में अंगोरा फार्म में ऊन से धागा बनाने के तरीके पर एक कार्यशाला का आयोजन किया गया।

नामथांग केवीके के अधिकारियों ने संसाधनों, तकनीकी ज्ञान और अंगोरा खरगोशों के प्रबंधन और देखभाल के बारे में किसानों की हर संभव मदद की। अगले तीन सालों तक किसानों और उनके परिवारों ने केवीके के निर्देशों का बारीकी से पालन किया और खरगोशों का सही ढंग से पालन-पोषण किया।

52 साल के किसान अरुण कुमार गुरुंग ने कहा, खरगोशों की देखभाल कैसे करनी है, उन्हें क्या खिलाना है और उन्हें सुरक्षित रूप से कहां रखना है, हमें पहले इसकी ट्रेनिंग दी गई। इसके बाद हम इस ओर जाने के लिए तैयार थे।" परियोजना की शुरुआत में गुरुंग के पास पांच मादा और दो नर खरगोश थे। आज उनकी संख्या बढ़कर 25 हो गई हैं। अभी और भी बच्चे पैदा होने वाले हैं।

नामथांग केवीके के अधिकारियों ने संसाधनों, तकनीकी ज्ञान और अंगोरा खरगोशों के प्रबंधन और देखभाल के बारे में किसानों की हर संभव मदद की।

2016-17 में परिवार ने भेड़ पालन से लगभग 69,000 रुपये और शुद्ध आय के रूप में 39,000 रुपये की कमाई की थी। इसी साल उन्होंने अंगोरा खरगोशों से लगभग 25,000 रुपये का अतिरिक्त मुनाफा कमाया था।

गुरुंग के सात खरगोशों ने लगभग 12 किलोग्राम ऊन का उत्पादन किया, जिससे उन्हें लगभग 14,000 रुपये मिले। वह सात अन्य खरगोशों को बेचने में भी कामयाब रहे, जिससे उन्हें 11,000 रुपये की अतिरिक्त कमाई हुई।

केवीके दक्षिण सिक्किम के हस्तक्षेप के बाद 2020 में, उनके मुनाफे में मामूली वृद्धि हुई है। 55 अंगोरा खरगोशों से लगभग 45 किलोग्राम ऊन का उत्पादन किया गया। अकेले ऊन उत्पादों की बिक्री से सकल आय 59,500 रुपये और शुद्ध आय 48,500 रुपये रही। जिंदा खरगोशों की बिक्री से गुरुंग ने 98,000 रुपये का मुनाफा कमाया। साल 2020 में खरगोश पालन से उनकी संयुक्त आय 146,500 रुपये थी।

आधार वर्ष की तुलना में ऊन का उत्पादन 290 प्रतिशत बढ़ गया। वहीं अंगोरा खरगोशों से होने वाले मुनाफे में खरगोश के ऊन की बिक्री के मामले में 274 फीसदी और जीवित जानवरों की बिक्री में 834 फीसदी की बढ़ोतरी देखी गई।

सफलता की यह कहानी सिर्फ गुरुंग की नहीं है। अंगोरा परियोजना से जुड़े सभी किसानों की आय इसी तरह से बढ़ती रही है।

अंगोरा पालन ने गति पकड़ी, ग्रामीण महिलाओं को भी फायदा

डॉ. चेवांग नोरबू भूटिया ने कहा कि राज्य में अंगोरा ऊन का व्यवसाय तेजी से बढ़ा है। चूबा में अंगोरा प्रोजेक्ट की सफलता ने पूरे सिक्किम में लोगों को अपनी ओर खींचा है। फिलहाल पश्चिमी सिक्किम में कुछ प्रगतिशील किसानों ने भी अपने कदम इस ओर बढ़ाएं है। अरुण कुमार गुरुंग के अनुसार, स्थानीय सरकारी एजेंसियों ने चुबा से खरगोशों की खरीद की और उन्हें पश्चिमी सिक्किम में किसानों को आपूर्ति की। चूबा के कुछ फार्मस में आज 50 से ज्यादा खरगोश हैं।

खरगोश से निकलने वाली ऊन और उनके मल से बनी खाद को बेचकर किसान ज्यादा कमाई कर रहे हैं। क्षेत्र की जलवायु स्थिति (समुद्र तल से 4,500 फीट की ऊंचाई) अंगोरा खरगोशों की वृद्धि और विकास के लिए अनुकूल है। भूटिया ने कहा कि अंगोरा खरगोशों का पालना काफी अच्छा रहा है और ऊन की गुणवत्ता भी बेहतर है। अन्य जानवरों की ऊन की तुलना में उन्हें इसकी अधिक कीमत मिलती है।

अरुण कुमार गुरुंग की पत्नी रूपा गुरुंग खरगोशों के पालन-पोषण में अपने पति की मदद करती हैं। वह एक स्थानीय स्वयं सहायता समूह (एसएचजी) का हिस्सा भी हैं, जिसके साथ चुबा की कई महिलाएं जुड़ी हुईं है। इन महिलाओं का परिवार भी अंगोरा और भेड़ की ऊन के व्यवसाय में लगा हुआ है।


16 और 17 जुलाई, 2019 को नई दिल्ली में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के स्थापना दिवस पर फॉर्म इनोवेटर्स सम्मेलन में भाग लेने के 10 महिला किसानों का चयन किया गया था। रूपा भी इनमें से एक थीं। केवीके और राज्य भर के अन्य सरकारी और निजी क्षेत्र के संगठनों की तरफ से आयोजित किसान मेलों में एसएचजी सक्रिय रूप से भाग लेता रहा है। इसके सदस्यों ने अंगोरा ऊन से बने अपने उत्पादों का वहां प्रदर्शन भी किया है।

रूपा गुरुंग ने कहा, “हर तीन महीने में खरगोश से रेशों को निकाला जाता है और एक पारंपरिक लकड़ी के चरखे में हाथ से काता जाता है। यह एक काफी जटिल प्रक्रिया है क्योंकि ऊन बहुत महीन और नाजुक होती है। इस ऊन से महिलाएं टोपी और मफलर बुनती है।" एक किलोग्राम ऊन से करीब 10 टोपियां बुनी जाती हैं। स्वयं सहायता समूह टोपियां बुनने वाले सदस्यों को प्रति व्यक्ति लगभग 150 रुपये का भुगतान करता है।

अरुण कुमार गुरुंग के अनुसार, अंगोरा फार्मिंग से जुड़े 15 फॉर्म ने, एक साल से भी कम समय में लगभग 19 किलोग्राम ऊन का उत्पादन किया है।

इस परियोजना की सफलता से राज्य में अंगोरा खरगोश पालन की वृद्धि और लोकप्रियता पर बहुआयामी असर पड़ा है। इस क्षेत्र के आर्थिक रूप से कमजोर लोगों के पास अब आय का एक वैकल्पिक स्रोत मौजूद है। इससे उनके जीवन स्तर में सुधार हुआ है, साथ ही स्वरोजगार के अवसर भी बढ़े हैं। शिक्षित बेरोजगार युवा और विशेष रूप से महिलाएं अंगोरा खरगोश पालन को अपनी कमाई का स्थाई जरिया बना सकते हैं।

इसे और बढ़ाने की जरूरत

अंगोरा ऊन का उत्पादन अभी भी सीमित है। सिक्किम में स्थानीय स्तर पर ज्यादातर टोपी और मफलर बेचे जाते हैं। एक खरगोश से एक समय में लगभग 100 ग्राम अच्छी गुणवत्ता वाली ऊन निकाली जा सकती है। इतनी ऊन से सिर्फ एक मध्यम आकार की टोपी बनाई जा सकती है। एक मफलर में करीब 500 ग्राम ऊन लगती है।

अंगोरा ऊनी टोपियां सिक्किम में बहुत लोकप्रिय हो गई हैं और इनकी मांग बढ़ी है। ऊन, रंग और पैटर्न के आधार पर एक मध्यम आकार की टोपी 15,00 रुपये या फिर इससे भी ज्यादा कीमत पर बेची जाती है। अंगोरा ऊन की टोपियों की भी मांग ज्यादा है। ऐसा माना जाता है कि ऊन का चिकित्सकीय महत्व है। अगर माइग्रेन के अटैक के समय अंगोरा ऊन की टोपी पहनी जाए तो इससे राहत मिलती है।


गुरुंगों के अनुसार, गाँव को राज्य भर से और यहां तक कि अन्य राज्यों से भी ऑर्डर मिलने शुरू हो गए हैं। फिलहाल मांग को पूरा करना एक संघर्ष है। लेकिन उन्हें लगता है कि एक बार ऊन का उत्पादन बढ़ जाने के बाद, वे आगे बढ़ने और बेचने के अन्य तरीकों की तलाश कर लेंगे।

केवीके दक्षिण सिक्किम दक्षिण जिले के अन्य हिस्सों में उद्यम को बढ़ाने का इच्छुक है।

भूटिया ने कहा, “टोपी, मफलर आदि बनाकर अंगोरा की खेती से अतिरिक्त आय की जा सकती है।” उन्होंने कहा कि प्रोजेक्ट पूरा होने के बाद भी बड़े पैमाने पर अंगोरा की खेती किसानों के बीच लोकप्रिय हो रही है।

भूटिया ने कहा, "केवीके एक अग्रणी संस्थान के तौर पर दक्षिण जिले और पूरे सिक्किम के उपयुक्त जलवायु क्षेत्रों में अंगोरा की खेती को बढ़ावा देने के लिए अपने कदम आगे बढ़ाने जा रहा है।"

चुनौतियों का समाधान

परियोजना के सामने कई चुनौतियां रहीं है। किसानों को कॉमन फैसिलिटी सेंटर (सीएफसी) के न होने की कमी खलती है, जहां वे एक साथ मिलकर काम कर सकते हों।

उसके अलावा पारंपरिक तरीकों की वजह से अंतिम ऊनी उत्पाद बनाने में काफी समय लग जाता है। ऊन के लिए बेहतर भंडारण सुविधाएं और निर्माण प्रक्रिया को तेज करने के लिए मशीनों की जरूरत है।

वहीं ऊन बनाने की प्रक्रिया को तेज करने वाली कार्डिंग मशीन, ड्रायर, स्पिनिंग मशीन आदि काफी महंगी हैं। और सबसे आखिर में क्षेत्र के पहाड़ी इलाकों तक पहुंच बनाना आसान नहीं है।

फिलहाल चुबा में एक सीएफसी का निर्माण किया जा रहा है। इस कारण अब कुछ चीजें बेहतर होते दिख रही हैं। ट्रेनर जल्द ही गाँव में मशीन से बुनाई और कढ़ाई का हुनर सिखाएंगे। अंगोरा ऊन को अधिक टिकाऊ और अधिक बिक्री योग्य बनाने के बेहतर प्रयासों की तरफ काम चल रहा है।

भूटिया के अनुसार, "अंगोरा ऊन के नमूने पश्चिम बंगाल के NIRJAFT (नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ रिसर्च फॉर जूट एंड फाइबर टेक्नोलॉजी) में भेजे गए हैं ताकि इसकी गुणवत्ता के साथ-साथ इस बात का पता भी लगाया जा सके कि क्या इसे कपास या जूट के साथ मिश्रित किया जा सकता है। अन्य सिंथेटिक फाइबर के साथ अंगोरा ऊन का मिश्रण सफल रहा है।"


किसानों को अन्य सामान के साथ विभिन्न कार्डिंग कंघे उपलब्ध कराए जा रहे हैं। अंगोरा ऊन के प्रसंस्करण के लिए किसानों को आधुनिक एवं बेहतर मशीनरी उपलब्ध कराने की मंजूरी मिल गई है। अंगोरा ऊन प्रसंस्करण केंद्र में किसानों की सभी नई स्वचालित तकनीकों जैसे कार्डिंग मशीन, प्लाज़्मा तकनीक, स्पिनिंग, रोविंग आदि उपलब्ध कराई जाएंगी। इस पर भी काम चल रहा है।

केवीके दक्षिण सिक्किम ने मौजूदा पारंपरिक कताई मशीनों को उन्नत और संशोधित करने के लिए चूबा खरगोश किसानों की सहायता की है। इसने किसानों को समकालीन विचारों के साथ आगे आने में मदद करने के लिए किसानों को डिजाइनर समूहों के साथ जोड़ा है जो उनकी मार्केटिंग और वैश्विक बाजार में उत्पादों की पहुंच बनाने में मदद करेंगे।

नाबार्ड के चुबा वीवर्स ऑफ़-फ़ार्म प्रोड्यूसर्स को-ऑपरेटिव सोसाइटी लिमिटेड में नमथांग दक्षिण सिक्किम के तहत चार जीपीयू क्लस्टर से 200 से अधिक सदस्य हैं। अंगोरा ऊन उत्पादों की मार्केटिंग अब "चुबा के उत्पाद" टैग के साथ की जाएगी। किसान अंगोरा ऊन के लिए जैविक फलों और सब्जियों से प्राकृतिक रंग बनाने पर भी काम कर रहे हैं। उम्मीद है कि ये सभी प्रयास अंगोरा प्रोजेक्ट को काफी आगे तक ले जाएंगे।

यह स्टोरी नाबार्ड के सहयोग से की गई है।

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