राजस्थान के किसान की मिसाल, आंवला प्रोसेसिंग से चार हेक्टेयर में खड़ा किया करोड़ों का कारोबार
Gaurav Rai | Jan 08, 2026, 11:31 IST
राजस्थान के किसान कैलाश चौधरी ने आंवले की खेती और प्रोसेसिंग से चार हेक्टेयर ज़मीन पर करोड़ों का कारोबार खड़ा किया। पहले कच्चा आंवला कम दाम में बिकता था, लेकिन उन्होंने उससे कैंडी, मुरब्बा और जूस बनाना शुरू किया। इससे आमदनी कई गुना बढ़ गई। आज उनके उत्पाद देश के साथ-साथ विदेशों में भी बिकते हैं।
राजस्थान जैसे शुष्क और चुनौतीपूर्ण जलवायु वाले राज्य में खेती को अक्सर घाटे का सौदा माना जाता है, लेकिन कुछ किसान ऐसे भी हैं, जो परंपरागत सोच से हटकर खेती को लाभ का व्यवसाय बना रहे हैं। ऐसी ही एक प्रेरक कहानी है राजस्थान के किसान कैलाश चौधरी की, जिन्होंने आंवला प्रोसेसिंग के ज़रिये न सिर्फ़ अपनी आमदनी बढ़ाई, बल्कि कई लोगों को रोज़गार भी दिया। चार हेक्टेयर ज़मीन पर खड़े उनके बाग और प्रोसेसिंग यूनिट आज देश–विदेश में पहचान बना चुके हैं।
राजस्थान के जयपुर ज़िले के किरतपुर गाँव के रहने वाले हैं 76 साल के कैलाश चौधरी, जिनकी कहानी उन हज़ारों किसानों के लिए उम्मीद की किरण है, जो फसल के सही दाम न मिलने से निराश रहते हैं। वे बताते हैं कि खेती में असली मुनाफ़ा केवल उत्पादन से नहीं, बल्कि प्रोसेसिंग और मार्केटिंग से आता है।
कैलाश चौधरी ने वर्षों पहले अपने खेत में आंवले का बाग लगाया। शुरुआत में पैदावार अच्छी हुई, लेकिन बाज़ार में कच्चे आंवले का भाव बेहद कम मिला। उस समय आंवला मात्र ₹15 प्रति किलो तक बिक रहा था। लागत निकालना भी मुश्किल हो रहा था। कैलाश चौधरी बताते हैं, "यह वही दौर था, जब ज़्यादातर किसान या तो खेती छोड़ देते हैं या नुकसान सहकर चुप बैठ जाते हैं।"
लेकिन कैलाश चौधरी ने हार मानने के बजाय सीखने का फ़ैसला किया। उन्होंने यह समझा कि समस्या आंवला पैदा करने में नहीं, बल्कि उसे कच्चे रूप में बेचने में है।
समाधान की तलाश में वे राजस्थान के प्रतापगढ़ ज़िला पहुँचे। वहाँ उन्होंने देखा कि कुछ महिलाएँ पारंपरिक तरीक़े से आंवले से लड्डू, कैंडी, मुरब्बा और अचार बना रही हैं। साधारण चूल्हे और छोटे बर्तनों में हो रहा यह काम उन्हें बहुत प्रेरक लगा।
यहीं से उनके मन में प्रोसेसिंग का विचार मज़बूत हुआ। उन्होंने सोचा कि यदि छोटे स्तर पर यह संभव है, तो आधुनिक तकनीक और बेहतर पैकिंग के साथ इसे बड़े स्तर पर क्यों नहीं किया जा सकता।
कैलाश चौधरी ने कारीगर बुलाकर अपने खेत के पास ही आंवला प्रोसेसिंग यूनिट शुरू की। शुरुआत में सीमित उत्पाद बनाए गए, लेकिन धीरे-धीरे आंवले से 8 से 10 तरह के उत्पाद तैयार होने लगे। इनमें अलग-अलग प्रकार की कैंडी, मुरब्बा, जूस और मिक्स जूस शामिल हैं।
प्रोसेसिंग के बाद वही आंवला, जो ₹15 प्रति किलो बिकता था, अब ₹200 से ₹250 प्रति किलो तक बिकने लगा। इससे उनकी आमदनी में कई गुना इज़ाफ़ा हुआ।
कैलाश चौधरी के पास कुल चार हेक्टेयर का बाग है। इसमें मुख्य रूप से आंवला लगाया गया है। उनके बाग में क़रीब 1100 आंवले के पेड़ हैं। इसके अलावा बेल और जामुन के पेड़ भी लगाए गए हैं। वे सघन बागवानी अपनाते हैं। पहले आंवले के पेड़ 20×20 फ़ुट की दूरी पर लगाए जाते थे, लेकिन उन्होंने 15×15 फ़ुट की दूरी रखी। इससे प्रति हेक्टेयर पौधों की संख्या बढ़ी और कुल उत्पादन में भी इज़ाफ़ा हुआ।
कैलाश चौधरी कहते हैं, "एक आंवले का पेड़ औसतन एक क्विंटल फल देता है। अच्छी देखभाल होने पर यह उत्पादन और भी बढ़ सकता है। आंवले का पेड़ 40 से 45 साल तक फल देता है, यानी एक बार लगाया गया बाग लंबे समय तक आमदनी देता है।"
कैलाश चौधरी रासायनिक दवाओं और उर्वरकों के बजाय प्राकृतिक तरीक़ों पर भरोसा करते हैं। वे अपने खेत में ख़ुद कम्पोस्ट और वर्मी कम्पोस्ट तैयार करते हैं। साल में दो बार पेड़ों को जैविक खाद दी जाती है।
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उनका मानना है कि अगर पौधों को समय पर अच्छा पोषण मिले, तो बीमारियाँ अपने आप दूर रहती हैं। वे कहते हैं, “जैसे स्वस्थ बच्चा कम बीमार पड़ता है, वैसे ही अच्छा पोषण पाने वाला पौधा भी रोगों से बचा रहता है।”
पानी की बचत के लिए उनके बाग में फ्लड इरिगेशन नहीं किया जाता। इसके बजाय मिनी स्प्रिंकलर सिस्टम लगाया गया है। इससे पानी की सही मात्रा पौधों तक पहुँचती है और पत्तियों की सफ़ाई भी हो जाती है। यह प्रणाली राजस्थान जैसे पानी की कमी वाले इलाक़ों के लिए बेहद उपयोगी साबित हो रही है।
कैलाश चौधरी के उत्पाद आज सिर्फ़ भारत तक सीमित नहीं हैं। उनके आंवले से बने उत्पाद इंग्लैंड, अमेरिका, यूरोप के कई देशों, सिंगापुर और ऑस्ट्रेलिया तक निर्यात किए जाते हैं। वे बताते हैं, "अच्छी क्वालिटी, सही पैकिंग और समय पर सप्लाई से विदेशी ख़रीदारों का भरोसा बना। धीरे-धीरे विदेशों में उनके डिस्ट्रीब्यूटर बन गए और निर्यात का दायरा बढ़ता चला गया।"
आंवला प्रोसेसिंग यूनिट और बाग के कारण पूरे साल काम चलता रहता है। इससे स्थानीय लोगों को रोज़गार मिलता है। फसल के मौसम में तो काम बढ़ता ही है, साथ ही प्रोसेसिंग और पैकिंग के कारण साल भर गतिविधियाँ बनी रहती हैं।
76 वर्ष की उम्र में कैलाश चौधरी भले ही अब रोज़मर्रा के काम से दूर हों, लेकिन खेती से उनका जुड़ाव आज भी बना हुआ है। उनके बेटे और बहुएँ अब इस पूरे व्यवसाय को संभाल रहे हैं। नई पीढ़ी तकनीक और मार्केटिंग के ज़रिये इस काम को और बड़े स्तर पर ले जाने की तैयारी में है।
कैलाश चौधरी का साफ़ संदेश है कि किसान केवल कच्चा माल बेचकर सीमित आमदनी ही कमा पाता है। अगर वही किसान अपनी उपज की प्रोसेसिंग करे, तो आमदनी कई गुना बढ़ सकती है। वे युवाओं को खेती से जुड़ने की सलाह देते हैं और कहते हैं कि बेरोज़गारी का सबसे बेहतर समाधान कृषि और उससे जुड़े व्यवसाय हैं।
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राजस्थान के जयपुर ज़िले के किरतपुर गाँव के रहने वाले हैं 76 साल के कैलाश चौधरी, जिनकी कहानी उन हज़ारों किसानों के लिए उम्मीद की किरण है, जो फसल के सही दाम न मिलने से निराश रहते हैं। वे बताते हैं कि खेती में असली मुनाफ़ा केवल उत्पादन से नहीं, बल्कि प्रोसेसिंग और मार्केटिंग से आता है।
कच्चे आंवले से शुरू हुई परेशानी
लेकिन कैलाश चौधरी ने हार मानने के बजाय सीखने का फ़ैसला किया। उन्होंने यह समझा कि समस्या आंवला पैदा करने में नहीं, बल्कि उसे कच्चे रूप में बेचने में है।
समाधान की तलाश में वे राजस्थान के प्रतापगढ़ ज़िला पहुँचे। वहाँ उन्होंने देखा कि कुछ महिलाएँ पारंपरिक तरीक़े से आंवले से लड्डू, कैंडी, मुरब्बा और अचार बना रही हैं। साधारण चूल्हे और छोटे बर्तनों में हो रहा यह काम उन्हें बहुत प्रेरक लगा।
यहीं से उनके मन में प्रोसेसिंग का विचार मज़बूत हुआ। उन्होंने सोचा कि यदि छोटे स्तर पर यह संभव है, तो आधुनिक तकनीक और बेहतर पैकिंग के साथ इसे बड़े स्तर पर क्यों नहीं किया जा सकता।
ऐसे हुई प्रोसेसिंग यूनिट की शुरुआत
प्रोसेसिंग के बाद वही आंवला, जो ₹15 प्रति किलो बिकता था, अब ₹200 से ₹250 प्रति किलो तक बिकने लगा। इससे उनकी आमदनी में कई गुना इज़ाफ़ा हुआ।
चार हेक्टेयर में सघन बागवानी
बाग में क़रीब 1100 आंवले के पेड़
कैलाश चौधरी कहते हैं, "एक आंवले का पेड़ औसतन एक क्विंटल फल देता है। अच्छी देखभाल होने पर यह उत्पादन और भी बढ़ सकता है। आंवले का पेड़ 40 से 45 साल तक फल देता है, यानी एक बार लगाया गया बाग लंबे समय तक आमदनी देता है।"
प्राकृतिक खेती पर ज़ोर
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उनका मानना है कि अगर पौधों को समय पर अच्छा पोषण मिले, तो बीमारियाँ अपने आप दूर रहती हैं। वे कहते हैं, “जैसे स्वस्थ बच्चा कम बीमार पड़ता है, वैसे ही अच्छा पोषण पाने वाला पौधा भी रोगों से बचा रहता है।”
आधुनिक सिंचाई व्यवस्था
अंतरराष्ट्रीय बाज़ार तक पहुँच
रोज़गार का साधन बना बाग
स्थानीय लोगों को मिला रोज़गार
आंवला प्रोसेसिंग यूनिट और बाग के कारण पूरे साल काम चलता रहता है। इससे स्थानीय लोगों को रोज़गार मिलता है। फसल के मौसम में तो काम बढ़ता ही है, साथ ही प्रोसेसिंग और पैकिंग के कारण साल भर गतिविधियाँ बनी रहती हैं।
नई पीढ़ी संभाल रही कमान
किसानों के लिए संदेश
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