कहीं आपकी प्याज की फ़सल पर तो नहीं हैं बैंगनी धब्बे? हो सकती है ये गंभीर बीमारी
Gaon Connection | Jan 20, 2026, 18:38 IST
प्याज में फैलने वाली बीमारी देखते-देखते पूरी फ़सल को संक्रमित कर देती है, इससे बचने के लिए ज़रूरी है समय रहते प्रबंधन। इसलिए कुछ बातों का ध्यान रखकर अपनी फसल को बचाया जा सकता है।
प्याज भारत की एक प्रमुख मसाला व नकदी फसल है, जिसकी मांग वर्ष भर बनी रहती है। प्याज उत्पादन में किसानों को कई जैविक और अजैविक समस्याओं का सामना करना पड़ता है, जिनमें पर्पल ब्लॉच रोग (Purple Blotch) अत्यंत विनाशकारी रोगों में से एक है। चलिए जानते हैं कैसे फैलता है ये रोग और क्या हैं इससे बचाव के तरीके।
यह रोग Alternaria porri नाम के कवक के कारण होता है और अनुकूल परिस्थितियों में यह 30–70 प्रतिशत तक उपज हानि का कारण बन सकता है। उत्तर भारत विशेषकर बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल में यह रोग रबी मौसम में गंभीर रूप ले लेता है।
पर्पल ब्लॉच रोग का मुख्य कारक Alternaria porri एक फफूंद (कवक) है, जो संक्रमित पौध अवशेषों, बीज तथा हवा के माध्यम से फैलता है। यह कवक पत्तियों पर लंबे समय तक जीवित रह सकता है और अनुकूल नमी व तापमान मिलने पर तेजी से सक्रिय हो जाता है।
पत्तियों पर विशिष्ट धब्बे
रोग की शुरुआत पत्तियों पर छोटे, पानी से भरे हल्के पीले धब्बों के रूप में होती है। ये धब्बे धीरे-धीरे बढ़कर बैंगनी या गहरे भूरे रंग के हो जाते हैं। धब्बों के चारों ओर पीले रंग का स्पष्ट घेरा दिखाई देता है, जो इस रोग की पहचान का प्रमुख लक्षण है।
पत्तियों का झुलसना
गंभीर अवस्था में धब्बे आपस में मिल जाते हैं, जिससे पूरी पत्ती झुलसकर सूख जाती है। कई बार पत्तियाँ बीच से टूटकर गिर जाती हैं, जिससे पौधे कमजोर हो जाते हैं।
बल्ब विकास पर प्रतिकूल प्रभाव
पत्तियों के समय से पहले सूखने के कारण प्रकाश संश्लेषण बाधित होता है, परिणामस्वरूप बल्ब का आकार छोटा रह जाता है और कुल उत्पादन में भारी कमी आ जाती है।
पर्पल ब्लॉच रोग के लिए निम्न परिस्थितियाँ अत्यंत अनुकूल मानी जाती हैं
उच्च आर्द्रता: 80–90 प्रतिशत
तापमान: 18–25°C
लगातार वर्षा या भारी सिंचाई
ओस पड़ना और खेत में पानी का जमाव
इन परिस्थितियों में रोग का प्रकोप तेजी से बढ़ता है, विशेषकर फरवरी–मार्च के महीनों में।
कृषि-वैज्ञानिक व कल्चरल प्रबंधन
फसल चक्र अपनाएं: प्याज को लगातार एक ही खेत में न उगाएं। 2–3 वर्ष का फसल चक्र अपनाएं।
खेत की साफ-सफाई: कटाई के बाद संक्रमित पौध अवशेषों को नष्ट करें।
उचित जल निकासी: खेत में जलभराव न होने दें।
संतुलित उर्वरक प्रबंधन: नाइट्रोजन, फॉस्फोरस एवं पोटाश का संतुलित उपयोग करें। नाइट्रोजन की अधिकता रोग को बढ़ावा देती है।
उचित पौध दूरी: अधिक सघनता से बचें, ताकि हवा का संचार बना रहे।
रोग-प्रतिरोधी किस्मों का चयन
क्षेत्र विशेष के लिए अनुशंसित किस्मों का चयन अत्यंत महत्वपूर्ण है। वर्तमान में निम्न किस्में अपेक्षाकृत सहनशील मानी जाती हैं, जैसे: Agrifound Dark Red, Arka Kalyan, Bhima Super (नवीन संस्तुत किस्म)। ये किस्में रोग की तीव्रता को कम करने में सहायक होती हैं।
जैविक व प्राकृतिक प्रबंधन
ट्राइकोडर्मा spp. का प्रयोग 5–10 ग्राम/किलोग्राम खाद में मिलाकर मिट्टी में डालें।
नीम तेल (Neem oil / Nimol): 3–5% घोल का छिड़काव प्रारंभिक अवस्था में करें।
गोबर की सड़ी खाद व जैविक स्लरी: पौधों की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाती है।
नवीन शोधों के अनुसार, Pseudomonas fluorescens जैसे लाभकारी जीवाणु भी रोग दमन में सहायक पाए गए हैं।
रासायनिक प्रबंधन (ज़रूरत पड़ने पर ही करें इस्तेमाल)
यदि रोग का प्रकोप बढ़ने लगे तो निम्न फफूंदनाशकों में से किसी एक का छिड़काव करें
मैनकोजेब 75 WP @ 2.5 ग्राम/लीटर पानी या
प्रोपिकोनाज़ोल 25 EC @1 मिली/लीटर पानी या
क्लोरोथैलोनिल @ 2 ग्राम/लीटर पानी
छिड़काव 10–15 दिन के अंतराल पर 2–3 बार करें तथा दवाओं को बदल-बदलकर प्रयोग करें, ताकि प्रतिरोध विकसित न हो।
सिंचाई प्रबंधन
सुबह के समय ड्रिप सिंचाई को प्राथमिकता दें।
स्प्रिंकलर या ओवरहेड सिंचाई से बचें, क्योंकि इससे पत्तियों पर नमी बनी रहती है।
रोग रोकथाम के विशेष सुझाव
नियमित खेत निरीक्षण करें।
बीज उपचार: बुवाई से पूर्व बीज को थायरम या कैप्टन 2–3 ग्राम/किलो बीज से उपचारित करें।
30–35 दिन की फसल अवस्था पर रोकथामात्मक छिड़काव करें।
खरपतवार नियंत्रण पर विशेष ध्यान दें।
प्याज में पर्पल ब्लॉच रोग एक गंभीर लेकिन नियंत्रण योग्य समस्या है। यदि किसान भाई समय पर रोग की पहचान कर समेकित प्रबंधन रणनीति अपनाएं, जिसमें सांस्कृतिक, जैविक और रासायनिक उपायों का संतुलित प्रयोग हो तो इस रोग से होने वाली क्षति को काफी हद तक कम किया जा सकता है। जागरूकता, नियमित निगरानी और वैज्ञानिक सलाह के साथ ही प्याज की स्वस्थ एवं लाभकारी फसल संभव है।
यह रोग Alternaria porri नाम के कवक के कारण होता है और अनुकूल परिस्थितियों में यह 30–70 प्रतिशत तक उपज हानि का कारण बन सकता है। उत्तर भारत विशेषकर बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल में यह रोग रबी मौसम में गंभीर रूप ले लेता है।
पर्पल ब्लॉच रोग का मुख्य कारक Alternaria porri एक फफूंद (कवक) है, जो संक्रमित पौध अवशेषों, बीज तथा हवा के माध्यम से फैलता है। यह कवक पत्तियों पर लंबे समय तक जीवित रह सकता है और अनुकूल नमी व तापमान मिलने पर तेजी से सक्रिय हो जाता है।
आपकी फसल में ये लक्षण तो नहीं
रोग की शुरुआत पत्तियों पर छोटे, पानी से भरे हल्के पीले धब्बों के रूप में होती है। ये धब्बे धीरे-धीरे बढ़कर बैंगनी या गहरे भूरे रंग के हो जाते हैं। धब्बों के चारों ओर पीले रंग का स्पष्ट घेरा दिखाई देता है, जो इस रोग की पहचान का प्रमुख लक्षण है।
गंभीर अवस्था में धब्बे आपस में मिल जाते हैं, जिससे पूरी पत्ती झुलसकर सूख जाती है। कई बार पत्तियाँ बीच से टूटकर गिर जाती हैं, जिससे पौधे कमजोर हो जाते हैं।
बल्ब विकास पर प्रतिकूल प्रभाव
पत्तियों के समय से पहले सूखने के कारण प्रकाश संश्लेषण बाधित होता है, परिणामस्वरूप बल्ब का आकार छोटा रह जाता है और कुल उत्पादन में भारी कमी आ जाती है।
रोग के फैलने की अनुकूल परिस्थितियाँ
उच्च आर्द्रता: 80–90 प्रतिशत
तापमान: 18–25°C
लगातार वर्षा या भारी सिंचाई
ओस पड़ना और खेत में पानी का जमाव
इन परिस्थितियों में रोग का प्रकोप तेजी से बढ़ता है, विशेषकर फरवरी–मार्च के महीनों में।
जागरूकता, नियमित निगरानी और वैज्ञानिक सलाह के साथ ही प्याज की स्वस्थ व लाभकारी फसल संभव है।<br>
पर्पल ब्लॉच रोग का समेकित प्रबंधन (Integrated Disease Management)
फसल चक्र अपनाएं: प्याज को लगातार एक ही खेत में न उगाएं। 2–3 वर्ष का फसल चक्र अपनाएं।
खेत की साफ-सफाई: कटाई के बाद संक्रमित पौध अवशेषों को नष्ट करें।
उचित जल निकासी: खेत में जलभराव न होने दें।
संतुलित उर्वरक प्रबंधन: नाइट्रोजन, फॉस्फोरस एवं पोटाश का संतुलित उपयोग करें। नाइट्रोजन की अधिकता रोग को बढ़ावा देती है।
उचित पौध दूरी: अधिक सघनता से बचें, ताकि हवा का संचार बना रहे।
रोग-प्रतिरोधी किस्मों का चयन
क्षेत्र विशेष के लिए अनुशंसित किस्मों का चयन अत्यंत महत्वपूर्ण है। वर्तमान में निम्न किस्में अपेक्षाकृत सहनशील मानी जाती हैं, जैसे: Agrifound Dark Red, Arka Kalyan, Bhima Super (नवीन संस्तुत किस्म)। ये किस्में रोग की तीव्रता को कम करने में सहायक होती हैं।
जैविक व प्राकृतिक प्रबंधन
ट्राइकोडर्मा spp. का प्रयोग 5–10 ग्राम/किलोग्राम खाद में मिलाकर मिट्टी में डालें।
नीम तेल (Neem oil / Nimol): 3–5% घोल का छिड़काव प्रारंभिक अवस्था में करें।
गोबर की सड़ी खाद व जैविक स्लरी: पौधों की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाती है।
नवीन शोधों के अनुसार, Pseudomonas fluorescens जैसे लाभकारी जीवाणु भी रोग दमन में सहायक पाए गए हैं।
रासायनिक प्रबंधन (ज़रूरत पड़ने पर ही करें इस्तेमाल)
यदि रोग का प्रकोप बढ़ने लगे तो निम्न फफूंदनाशकों में से किसी एक का छिड़काव करें
मैनकोजेब 75 WP @ 2.5 ग्राम/लीटर पानी या
प्रोपिकोनाज़ोल 25 EC @1 मिली/लीटर पानी या
क्लोरोथैलोनिल @ 2 ग्राम/लीटर पानी
छिड़काव 10–15 दिन के अंतराल पर 2–3 बार करें तथा दवाओं को बदल-बदलकर प्रयोग करें, ताकि प्रतिरोध विकसित न हो।
सिंचाई प्रबंधन
सुबह के समय ड्रिप सिंचाई को प्राथमिकता दें।
स्प्रिंकलर या ओवरहेड सिंचाई से बचें, क्योंकि इससे पत्तियों पर नमी बनी रहती है।
रोग रोकथाम के विशेष सुझाव
नियमित खेत निरीक्षण करें।
बीज उपचार: बुवाई से पूर्व बीज को थायरम या कैप्टन 2–3 ग्राम/किलो बीज से उपचारित करें।
30–35 दिन की फसल अवस्था पर रोकथामात्मक छिड़काव करें।
खरपतवार नियंत्रण पर विशेष ध्यान दें।
प्याज में पर्पल ब्लॉच रोग एक गंभीर लेकिन नियंत्रण योग्य समस्या है। यदि किसान भाई समय पर रोग की पहचान कर समेकित प्रबंधन रणनीति अपनाएं, जिसमें सांस्कृतिक, जैविक और रासायनिक उपायों का संतुलित प्रयोग हो तो इस रोग से होने वाली क्षति को काफी हद तक कम किया जा सकता है। जागरूकता, नियमित निगरानी और वैज्ञानिक सलाह के साथ ही प्याज की स्वस्थ एवं लाभकारी फसल संभव है।