फरवरी महीने में दक्षिण और मध्य भारत के गन्ना किसान कर सकते हैं इस क़िस्म की खेती, नहीं रहेगा कई बीमारियों का खतरा
Gaon Connection | Jan 31, 2026, 12:54 IST
अगर किसान ऐसी गन्ना किस्म चाहते हैं जो मजबूत हो, बीमारियों से काफी हद तक सुरक्षित रहे, अलग-अलग मौसम में लगाई जा सके और लगातार अच्छी आमदनी दे तो Co 86032 (नयना) एक बेहतरीन विकल्प है।
अगर आप दक्षिण या फिर मध्य भारत के गन्ना किसान हैं और खेती में कुछ नया करना चाहते हैं, तो इस समय गन्ने की Co 86032 (नयना) किस्म लगा सकते हैं, क्योंकि इस किस्म की कई तरह की बीमारियों का खतरा नहीं रहता है।
ICAR-Sugarcane Breeding Institute, कोयंबटूर ने दक्षिण और मध्य भारत के गन्ना किसानों के लिए Co 86032 (नयना) विकसित की है। इसे खास तौर पर प्रायद्वीपीय क्षेत्र की जलवायु और मिट्टी को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है। महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक, तमिलनाडु, मध्य प्रदेश और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में यह किस्म बढ़िया उत्पादन देती है।
इस किस्म की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह मजबूत तनों, अच्छी बढ़वार और स्थिर उत्पादन के लिए जानी जाती है। किसान इसे “स्ट्रॉन्ग केन” किस्म कहते हैं क्योंकि यह गिरने के खतरे से कम प्रभावित होती है और खेत में लंबे समय तक टिकाऊ बनी रहती है।
Co 86032 की एक बड़ी ताकत इसका रोपाई का समय भी है। इसे अक्टूबर के साथ जनवरी–फरवरी के महीने में लगाया जा सकता है।
इसके अलावा यह किस्म 120 सेंटीमीटर कतार दूरी (Wide Row Spacing) पर भी अच्छी उपज देती है। आमतौर पर चौड़ी दूरी पर रोपाई करने से कुछ किस्मों में उत्पादन कम होने का खतरा रहता है, लेकिन Co 86032 में यह समस्या नहीं देखी जाती। इससे खेत में हवा का संचार बेहतर होता है, पौधों को पर्याप्त धूप मिलती है और यांत्रिक खेती (मशीन से निराई-गुड़ाई) करना भी आसान हो जाता है।
गन्ने की खेती में रोग सबसे बड़ी चुनौती होते हैं। खासकर स्मट, विल्ट और रेड रॉट जैसी बीमारियां कई बार पूरी फसल को बर्बाद कर देती हैं। Co 86032 इस मामले में किसानों को बड़ी राहत देती है।
यह किस्म स्मट रोग के प्रति प्रतिरोधी (Resistant) मानी जाती है, जबकि विल्ट रोग के प्रति मध्यम स्तर की प्रतिरोधक क्षमता (Moderately Resistant) रखती है। इसके अलावा खेत की परिस्थितियों में यह रेड रॉट के खिलाफ अच्छी फील्ड रेसिस्टेंस दिखाती है। हालांकि प्लग मेथड जैसी विशेष परिस्थितियों में इसमें मध्यम संवेदनशीलता देखी गई है, इसलिए विशेषज्ञ समय-समय पर खेत की निगरानी की सलाह देते हैं।
वैज्ञानिकों के अनुसार Co 86032 जैसी उन्नत किस्मों से ज़्यादा फायदा तभी मिलता है जब किसान स्वस्थ बीज गन्ना (Seed Cane) का उपयोग करें और खेत की नियमित जांच करें। बीज गन्ने का चयन करते समय रोगमुक्त और मजबूत तनों को प्राथमिकता देना चाहिए। साथ ही रोपाई के बाद शुरुआती 2–3 महीनों में खेत का निरीक्षण करने से रोग या कीट के लक्षण समय रहते पकड़ में आ जाते हैं।
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Co 86032 को “Steady Returns” यानी स्थिर आमदनी देने वाली किस्म इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह अलग-अलग परिस्थितियों में भी अच्छा प्रदर्शन करती है। चाहे हल्की मिट्टी हो या मध्यम भारी जमीन, सही प्रबंधन के साथ यह किस्म संतोषजनक पैदावार देती है।
कई राज्यों में चीनी मिलें भी इस किस्म को प्राथमिकता देती हैं, क्योंकि इसमें रस की मात्रा अच्छी होती है और मिल रिकवरी के लिहाज से भी यह उपयुक्त मानी जाती है। इससे किसानों को गन्ना बेचने में बाजार की समस्या कम होती है।
दक्षिण भारत और मध्य भारत के कई हिस्सों में गर्म तापमान, अनियमित बारिश और पानी की सीमित उपलब्धता जैसी चुनौतियां रहती हैं। Co 86032 इन परिस्थितियों में भी स्थिर प्रदर्शन करती है। यही वजह है कि इसे प्रायद्वीपीय क्षेत्र के लिए वर्कहॉर्स वैरायटी यानी भरोसेमंद मेहनती किस्म कहा जाता है।
ये भी पढ़ें: सूखे इलाकों में बढ़िया पैदावार देगी बाजरे की नई क़िस्म, बीमारियों से भी नहीं होगा नुकसान
ICAR-Sugarcane Breeding Institute, कोयंबटूर ने दक्षिण और मध्य भारत के गन्ना किसानों के लिए Co 86032 (नयना) विकसित की है। इसे खास तौर पर प्रायद्वीपीय क्षेत्र की जलवायु और मिट्टी को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है। महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक, तमिलनाडु, मध्य प्रदेश और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में यह किस्म बढ़िया उत्पादन देती है।
इस किस्म की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह मजबूत तनों, अच्छी बढ़वार और स्थिर उत्पादन के लिए जानी जाती है। किसान इसे “स्ट्रॉन्ग केन” किस्म कहते हैं क्योंकि यह गिरने के खतरे से कम प्रभावित होती है और खेत में लंबे समय तक टिकाऊ बनी रहती है।
Co 86032 की एक बड़ी ताकत इसका रोपाई का समय भी है। इसे अक्टूबर के साथ जनवरी–फरवरी के महीने में लगाया जा सकता है।
इसके अलावा यह किस्म 120 सेंटीमीटर कतार दूरी (Wide Row Spacing) पर भी अच्छी उपज देती है। आमतौर पर चौड़ी दूरी पर रोपाई करने से कुछ किस्मों में उत्पादन कम होने का खतरा रहता है, लेकिन Co 86032 में यह समस्या नहीं देखी जाती। इससे खेत में हवा का संचार बेहतर होता है, पौधों को पर्याप्त धूप मिलती है और यांत्रिक खेती (मशीन से निराई-गुड़ाई) करना भी आसान हो जाता है।
Co 86032 (नयना) गन्ना किस्म बन रही प्रायद्वीपीय भारत के किसानों के लिए बन रही स्थित कमाई भरोसा।
गन्ने की खेती में रोग सबसे बड़ी चुनौती होते हैं। खासकर स्मट, विल्ट और रेड रॉट जैसी बीमारियां कई बार पूरी फसल को बर्बाद कर देती हैं। Co 86032 इस मामले में किसानों को बड़ी राहत देती है।
यह किस्म स्मट रोग के प्रति प्रतिरोधी (Resistant) मानी जाती है, जबकि विल्ट रोग के प्रति मध्यम स्तर की प्रतिरोधक क्षमता (Moderately Resistant) रखती है। इसके अलावा खेत की परिस्थितियों में यह रेड रॉट के खिलाफ अच्छी फील्ड रेसिस्टेंस दिखाती है। हालांकि प्लग मेथड जैसी विशेष परिस्थितियों में इसमें मध्यम संवेदनशीलता देखी गई है, इसलिए विशेषज्ञ समय-समय पर खेत की निगरानी की सलाह देते हैं।
वैज्ञानिकों के अनुसार Co 86032 जैसी उन्नत किस्मों से ज़्यादा फायदा तभी मिलता है जब किसान स्वस्थ बीज गन्ना (Seed Cane) का उपयोग करें और खेत की नियमित जांच करें। बीज गन्ने का चयन करते समय रोगमुक्त और मजबूत तनों को प्राथमिकता देना चाहिए। साथ ही रोपाई के बाद शुरुआती 2–3 महीनों में खेत का निरीक्षण करने से रोग या कीट के लक्षण समय रहते पकड़ में आ जाते हैं।
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Co 86032 को “Steady Returns” यानी स्थिर आमदनी देने वाली किस्म इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह अलग-अलग परिस्थितियों में भी अच्छा प्रदर्शन करती है। चाहे हल्की मिट्टी हो या मध्यम भारी जमीन, सही प्रबंधन के साथ यह किस्म संतोषजनक पैदावार देती है।
कई राज्यों में चीनी मिलें भी इस किस्म को प्राथमिकता देती हैं, क्योंकि इसमें रस की मात्रा अच्छी होती है और मिल रिकवरी के लिहाज से भी यह उपयुक्त मानी जाती है। इससे किसानों को गन्ना बेचने में बाजार की समस्या कम होती है।
दक्षिण भारत और मध्य भारत के कई हिस्सों में गर्म तापमान, अनियमित बारिश और पानी की सीमित उपलब्धता जैसी चुनौतियां रहती हैं। Co 86032 इन परिस्थितियों में भी स्थिर प्रदर्शन करती है। यही वजह है कि इसे प्रायद्वीपीय क्षेत्र के लिए वर्कहॉर्स वैरायटी यानी भरोसेमंद मेहनती किस्म कहा जाता है।
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