उत्तर प्रदेश के किसानों के लिए कृषि सलाह: बढ़िया उत्पादन के लिए खरीफ फसलों की कब और कैसे करें बुवाई

खरीफ मौसम में धान के साथ ही किसान मक्का, अरहर, मूंग, बाजरा, मूंगफली और तिल जैसी कई फसलों की बुवाई करते हैं, ऐसे में अच्छे उत्पादन के लिए जानना जरूरी होता है कि कब और कैसे किस फसल की बुवाई करें।

उत्तर प्रदेश के किसानों के लिए कृषि सलाह: बढ़िया उत्पादन के लिए खरीफ फसलों की कब और कैसे करें बुवाई

मानसून आने के साथ ही किसान खरीफ फसलों की बुवाई की तैयारी कर देते हैं, ऐसे में किसानों के लिए सबसे पहले जानना जरूरी होता है कि कौन सी फसल की बुवाई कब और कैसे करें।

अलग-अलग राज्यों में सभी फसलों की बुवाई का अलग समय होता है और राज्यों के हिसाब से किस्में भी विकसित की जाती हैं, इसलिए किसानों के लिए जानना जरूरी हो जाता है कि किस विधि से फसलों की बुवाई करें।

मक्का की खेती

मक्का की खेती करने वाले किसानों को जून के अंत तक बुवाई कर लेनी चाहिए। जिस खेत में पानी रुकने की समस्या है वहां पर 15 जून से पहले-पहले बुवाई कर लेनी चाहिए।

सभी किस्मों के लिए 20 किलो प्रति हेक्टेयर के हिसाब से बीज का उपयोग करें। बुवाई करने के लिए 3.5 सेमी की गहराई पर हल के पीसे बीज डालें। दो लाइनों के बीच की दूरी जल्दी तैयार होने वाली किस्म में 45 सेमी और मध्यम और देर से पकने वाली किस्म में 60 सेमी होनी चाहिए। इसी तरह दो पौधों के बीच की दूरी जल्दी तैयार होने वाली किस्म में 20 सेमी और मध्यम और देर से पकने वाली किस्म में 25 सेमी रखनी चाहिए।


बुवाई के बाद मक्का की फसल में निराई और गुड़ाई बहुत जरूरी है। यह खरपतवार नियंत्रण के साथ ही ऑक्सीजन के संचार में भी सुधार करता है। पहली निराई-गुड़ाई अंकुरण के 15 दिन बाद और दूसरी 35 से 40 दिन में करनी चाहिए। मक्का में खरपतवार हटाने के लिए एट्राजीन दो किलो प्रति हेक्टेयर या 800 ग्राम एकड़ की दर से मध्यम से भारी मिट्टी में छिड़काव करें।

हमेशा मिट्टी की जांच के हिसाब से ही उर्वरकों का प्रयोग करना चाहिए। लेकिन अगर किसी वजह से मिट्टी का परीक्षण नहीं हो पाया है तो संकर और मिश्रित मक्का की देर से पकने वाली किस्मों में 120:60:60 के अनुपात में नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश का उपयोग करें। जल्दी तैयार होने वाली किस्म में 100:60:40 और देशी किस्मों 80:40:40 के अनुपात में नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश का उपयोग करें।

बुवाई के बाद से सिल्क बनने से लेकर अनाज भरने तक पर्याप्त नमी होनी चाहिए, इसलिए अगर बारिश नहीं होती है तो सिंचाई करते रहना चाहिए।

बाजरा की खेती

बाजरा के बुवाई का समय जुलाई के मध्य से अगस्त मध्य तक होता है, हल के पीछे 4 सेमी गहराई पर 50 सेमी की दूरी पर बुवाई करें।

सभी किस्मों के लिए 4 किलो प्रति हेक्टेयर की दर से बीज का प्रयोग करें। बीजोपचार के लिए एक किलो बीज को बोने से पहले 2.50 ग्राम थीरम से उपचारित करना चाहिए। 20 % नमक के घोलकर डुबोकर खराब बीज को निकाला जा सकता है।


बाजरे की खेती में निराई गुड़ाई जरूरी होती है। पहली निराई का समय अंकुरण के 15 दिन के बाद और दूसरी निराई 35-40 दिन बाद खरपतवार नष्ट करने के लिए होता है।

मिट्टी परीक्षण के आधार पर उर्वरकों का प्रयोग करें, यदि परीक्षण के परिणा उपलब्ध नहीं हैं, तो संकर के लिए 80-100 किलो नाइट्रोजन, 40 किलो फास्फोरस और 40 किलो पोटाश और देशी प्रजातियों के लिए 40-45 किलो नाइट्रोजन, 40 किलो पोटाश प्रति हेक्टेयर के हिसाब से किया जाता है।

अरहर की खेती

अरहर की खेती में लंबी अवधि की किस्में जो 270 दिनों में तैयार हो जाती हैं उन्हें जुलाई में बोना चाहिए। जल्दी पकने वाली प्रजातियों को मध्य जून तक सिंचित क्षेत्रों में बोना चाहिए ताकि नवंबर के अंत तक फसल तैयार हो सकते और दिसंबर के पहले पखवाड़े में गेहूं की बुवाई की जा सके।

बीज की मात्रा सभी किस्मों के लिए 20 किलो प्रति हेक्टेयर और दो लाइनों की दूरी 50 सेमी और दो पौधों के बीच की दूरी 20 सेमी होनी चाहिए।


बुवाई के 20-25 दिनों बाद घने पौधे हटा देना चाहिए। एक किलो बीज को उपचारित करने के लिए 2 ग्राम थीरम और 1 ग्राम कार्बेंडाजिम के मिश्रण से उपचारित करें। इसके लिए कल्चर के एक पैकेट को 10 किलो बीज के ऊपर छिड़का जाता है, फिर उसे हल्के हाथों से मिलाया जाता है, जिससे उसकी एक परत बीज के ऊपर चिपक जाए। उपचारित करने के बाद बीजों की तुरंत बुवाई करें। कल्चर उन क्षेत्रों के लिए ज्यादा जरूरी होता है, जहां पर लंबे समय के बाद अरहर की बुवाई की जा रही होगी।

मूंग की खेती

मूंग की खेती के लिए उन्नत किस्मों जैसे मूंग-133, नरेंद्र मूंग-1, पीडीएम-54, मालवीय ज्योति, सम्राट, आशा, मेहा और श्वेत का चयन करें।

फसल पकने का समय 80-90 दिन है, बुवाई का उचित समय जुलाई के अंत से अगस्त के मध्य तक है ताकि फसल सितम्बर-अक्टूबर तक तैयार हो सके।

बुवाई हल के पीछे करनी चाहिए, सभी किस्मों के लिए लाइन से लाइन की दूरी 30-35 सेमी होनी चाहिए। 15-15 किलो बीज प्रति हेक्टेयर की दर से प्रयोग करना चाहिए।

मूंग के अच्छे उत्पादन के लिए 15 किलो नाइट्रोजन, 40 किलो फास्फोरस और 20 किलो सल्फर की जरूरत होती है। फली लगते समय 2 प्रतिशत यूरिया के घोल का छिड़काव करने से अधिक उपज मिलती है।

उरद की खेती

उरद की खेती के लिए उन्नत किस्मों जैसे पंत यू- 30, 35, नरेंद्र उरद-1, आजाद उरद-2, शेखर 1,2,3, आजाद उरद-3 और पंत उरद 31 का चयन करना चाहिए। फसल पकने का समय 80-90 दिन होता है, जुलाई के अंत से अगस्त के मध्य तक बोना चाहिए, जिससे सितम्बर-अक्टूबर तक फसल तैयार हो जाए।


बुवाई हल के पीछे से करनी चाहिए, सभी किस्मों की बुवाई के लिए लाइन से लाइन की दूरी 30-35 सेमी होनी चाहिए। 12-15 किलो बीज प्रति हेक्टेयर की दर प्रयोग करना चाहिए।

उरद की अच्छी उपज के लिए 15 किलो नाइट्रोजन, 40 किलो फास्फोरस और 20 किलो सल्फर की जरूरत होती है। फली लगते समय 2 प्रतिशत यूरिया के घोल का छिड़काव करने से अधिक उपज मिलती है।

मूंगफली की खेती

उन्नत किस्में जैसे चित्रा, कौशल प्रकाश, अंबर, टीजी-37 ए, उत्कर्ष, और दिव्या का चयन समय की उपलब्धता के हिसाब से करना चाहिए। फसल की अवधि 120-130 दिन होती है, इसलिए जुलाई के पहले सप्ताह में बुवाई कर देनी चाहिए, जिससे फसल अक्टूबर के आखिर तक तैयार हो जाए।

प्रजाति विविधता और मौसम के अनुसार लाइन से लाइन की दूरी 40-50 सेमी और पौधों से पौधों की दूरी 15-20 सेमी होनी चाहिए। सभी किस्मों के लिए 70-75 किलो बीज प्रति हेक्टेयर का प्रयोग करें।

मूंगफली की पैदावार के लिए उर्वरकों का प्रयोग बहुत जरूरी होता है, हमेशा मिट्टी जांच के बाद ही उर्वरकों का प्रयोग करें। अगर परीक्षण नहीं किया है तो नाइट्रोजन 20 किलो, फास्फोरस 30 किलो, पोटाश 45 किलो, जिप्सम 250 किलो और बोरेक्स 4 किलो प्रति हेक्टेयर के हिसाब से प्रयोग करना चाहिए।


तिल की खेती

तिल की खेती के लिए उन्नत किस्म जैसे टाइप-4, टाइप-12, टाइप-13, टाइप-78, शेखर, प्रगति, तरुण जैसी किस्मों की बुवाई करनी चाहिए। फसल की अवधि 90-95 दिनों की होती है, इसलिए जून के अंतिम सप्ताह से जुलाई के दूसरे पखवाड़े में बोना चाहिए।

प्रजातियों और मौसम के हिसाब से लाइन से लाइन की दूरी 30-45 सेमी होनी चाहिए। सभी किस्मों के लिए 3-4 किलो बीज प्रति हेक्टेयर के हिसाब से प्रयोग करना चाहिए। बीज के छोटे आकार होने के कारण बीज को रेत, राख या सूखी हल्की दोमट मिट्टी में मिलाकर बोएं।

बीज जनित बीमारियों से बचाने के लिए बीजोपचार के लिए 1 ग्राम थीरम और 1 ग्राम कार्बेंडाजिम प्रति किलो बीज के हिसाब से प्रयोग करें।

पहली निराई बुवाई के 15-20 दिन के बाद और दूसरी निराई 30-35 दिनों के बाद करनी चाहिए। सिंचाई की जरूरत तब होती है, जब पौधों में 50-60 % तक फलियां लग जाती हैं।

साभार: भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद की किसानों के लिए खरीफ फसलों की सलाह

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