रोग लगने पर पश्चिम बंगाल में खेत में ही जलाई गई 400 एकड़ गेहूं की फसल, वैज्ञानिकों की सलाह- फफूंद से ऐसे बचाएं किसान अपना गेहूं

रोग लगने पर पश्चिम बंगाल में खेत में ही जलाई गई 400 एकड़ गेहूं की फसल, वैज्ञानिकों की सलाह- फफूंद से ऐसे बचाएं किसान अपना गेहूंखेत में गेहूं की बालियों के स्थान पर सफेद झिल्ली दिखे सावधान हो जाइए।

लखनऊ। प्रदेश के 9900 हजार हेक्टेयर में खड़ी गेहूं की फसल में बालियां आ गई हैं लेकिन अगर आपको अपने खेत में गेहूं की बालियों के स्थान पर सफेद झिल्ली दिखे सावधान हो जाइए। यह सफेद झिल्ली गेहूं में लगने वाला खतरनाक अनावृत कण्डुआ रोग है, जिसे फफूंदी रोग भी कहा जाता है।

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शनिवार को पश्चिम बंगाल के नदिया जिले के दो विकासखंडों में गेहूं की 400 एकड़ की फसल को काटा गया और जला दिया गया क्योंकि फफूंदी संक्रमण की वजह से फसल खराब हो गई थी। तहट्टा और छपरा इलाकों में संक्रमित फसल को नष्ट किया जा रहा है ताकि बीमारी फैलने पर अंकुश लगाया जा सके। केंद्रीय कृषि मंत्रालय के विशेषज्ञों के एक दल ने इन इलाकों के खेतों का दौरा किया था और इसकी सलाह पर गेहूं की फसल को नष्ट किया गया। विशेषज्ञों ने किसानों को सलाह दी है कि कम प्रभावित क्षेत्रों में दवाओं का छिड़काव किया जाएगा। अधिकारियों ने कहा कि प्रभावित किसानों को 50,375 रुपये प्रति हेक्टेयर की दर से मुआवजा दिया जाएगा।

फरवरी के अंत ओर मार्च के पहले सप्ताह जब गेहूं की फसल में बालियां आ जाती है तो फफूंदी रोग का खतरा बढ़ जाता है। ये बीमारी बालियों को ढंककर सफेद झिल्ली बना देती है। और जब यह झिल्ली फट जाती है तो इसमें फफूंदी के असंख्या जीवाणु हवा में फैल जाते हैं और बालियों का खराब कर देते हैं।
डा. रतन तिवारी, प्रधान वैज्ञानिक, भारतीय गेहूं और जौ अनुसंधान संस्थान करनाल

चंद्रशेखर आजाद कृषि एवं प्रौद्वोगिकी विश्वविद्यालय कानपुर ने गेहूं किसानों के लिए मौसम आधारित सलाह जारी करते हुए कहा है इस मौसम में गेहूं की बाली पर कंडुवा रोग का लक्षण दिखता है। अगर खेत में किसी भी बाली में यह दिखाई दे तो उसे तुरंत काटकर जमीन में दबा दें। नहीं तो बाकी पौधों की बालियों को भी वह अपने चपेटे में ले लेगा।

इस तरह करें बचाव: इस बीमारी के बारे में विस्तार से बताते हुए नरेन्द्रदेव कृषि विश्वविद्यालय फैजाबाद के मौसम वैज्ञानिक डा. एके सिंह ने बताया कि इस रोग में बालियों के दानों के स्थान पर काला चूर्ण बन जाता है। इस संक्रमणकारी होता है अगर एक पौधे में लगा तो जल्द ही दूसरे भी इसकी चपेट में आ जाते हैं। इसके लिए जरूरी है जिस भी पौधे में यह दिखे उसे तुरंत काटकर हटा लेना चाहिए। उन्होंने बताया कि अगर इस बीमारी से गेहूं के पौधे को बचाने का एक उपाय यह भी है कि प्रोपीकोनाजोल 25 प्रतिशत ई.सी. की 500 मिली लीटर प्रति हेक्टेयर लगभग 7500 लीट पानी में घोलकर छिड़काव करना चाहिए।

खेतों में रखें नमी

गेहूं की फसल में अच्छी उपज और बीमारियों से बचाने के लिए यह भी जरूरी है कि गेहूं की छठी सिंचाई जरूर की जाए। गेहूं बुवाई के 115-120 दिन पूरे होने पर जब बालियों में दाना भरने का समय आता तो छठी सिंचाई करनी होती है लेकिन अधिकतर किसान पांचवीं सिंचाई जो बालियों में दुग्धावस्था के समय की जाती है उसके बाद सिंचाई नहीं करते हैं। जिससे फसल को नुकसान होता है। ऐसे में छठी सिंचाई किसान जरूर करें।

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