इस कृषि वैज्ञानिक की सलाह मानें तो किसानों की आय हो सकती है दोगुनी

इस कृषि वैज्ञानिक की सलाह मानें तो किसानों की आय हो सकती है दोगुनी

केंद्र सरकार व प्रदेश सरकार लगातार किसानों की आय दोगुनी की बात कर रही है, इस बारे में कृषि विज्ञान केंद्र, सीतापुर के कृषि वैज्ञानिक डॉ. दया शंकर श्रीवास्तव कुछ सुझाव दे रहें हैं। इन सुझाव को मानकर किसानों की आय दोगुनी हो सकती है।

1. किसान क्लबों/स्वयं सहायता समूह के गांव में जमीन चिन्हित कर एकीकृत फसल प्रणाली के मॉडल 0.2 हेक्टेयर क्षेत्रफल, 0.5 हेक्टेयर क्षेत्रफल और एक हेक्टेयर क्षेत्रफल के मॉडल को मनरेगा के द्वारा स्थापित कराए जाएं, जिससे कृषि एवं पर्यावरण में समन्वय के साथ-साथ पुनर्चक्रण सिद्धांत को स्थापित कर लागत में कमी और ग्रामीणों में तकनीकी दक्षता स्थापित किया जा सके।

2. किसान क्लब व स्वयं सहायता समूह वाले गांवों में मेड़ों का चौड़ीकरण कराकर उनमें सहजन के वृक्ष रोपित कराए जाएं ताकि मधुमक्खियों का आवागमन गांव में पुनः स्थापित हो सके। साथ ही किसानों की आय अर्जन मे बढ़ोत्तरी के साथ-साथ मृदा के कटान मे कमी और जल संचयन में सहायता मिल सके।


3. किसान क्लबों व स्वयं सहायता समूहों को वानिकी और उद्यानिकी पौधों की नर्सरी तैयार करने का कार्यभार सौंपा जाए और उन्हें मनरेगा मजदूरों द्वारा ही बड़े पैमाने पर कराया जाए इससे मजदूरों कामगारों में तकनीकी दक्षता स्थापित होने के साथ-साथ क्लबों और स्वयं सहायता समूहों को आगे बढ़ने में सशक्तता आएगी। साथ ही किसान क्लब एवं स्वयं सहायता समूहों को एफ.पी.ओ. से लिंक किया जाए जिससे विपणन का कार्य एफ.पी.ओ. द्वारा संचालित कराया जा सके।

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4. गांव में ग्राम समाज की जमीनों पर चरागाहों की पुनर्स्थापना किसान क्लबों और स्वयं सहायता समूह के देखरेख मे कराई जाए, ताकि आवारा पशुओं के लिए वर्ष भर हरे चारे की व्यवस्था सुनिश्चित की जा सके और इन चरागाहों में वर्ष भर हरा चारा उत्पादन तकनीक के उपलब्ध मॉडल मनरेगा मजदूरों द्वारा विकसित कराया जाए।


5. आवारा पशुओं की समस्या से निजात पाने के लिए ग्रामीण स्तर पर छुट्टा जानवरों के लिए गौशालाएं स्थापित की जाए और इनकी जिम्मेदारी का कार्य किसान क्लबों व स्वयं सहायता समूह के दिया जाए और कार्य का संचालन मनरेगा मजदूरों द्वारा कराया जाए। इन जानवरों द्वारा प्राप्त मूत्र एवं गोबर से जैविक कीटनाशी व केंचुआ खाद निर्माण का कार्य कराया जा सके और इन्हें लोकल स्तर पर ग्रामीणों को उपलब्ध करा कर जैविक कृषि को बढ़ावा देने और आवारा पशुओं से निजात पाने में सफलता मिल सके।

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