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आईपीएम मेला: किसानों को मुफ्त मिले फ्रूट फ्लाई ट्रैप और सांप से बचने के यंत्र, बताई गईं फसल बचाने की सस्ती और घरेलू विधियां

सब्जी और फल समेत दूसरी फसलों को कीट-पतंगों से बचाने के लिए किसान हजारों रुपए के रासायनिक कीटनाशक डालते हैं। लेकिन यही काम सिर्फ कुछ रुपए का एक फ्रूट प्लाई ट्रैप और फेरोमोन ट्रैप भी कर सकता है अगर किसान उसका ठीक से इस्तेमाल करें। सीतापुर के केवीके में आयोजित आईपीएम मेले में किसानों को ऐसे ही तमाम यांत्रिक विधियों के फायदे गिनाए गए और मुफ्त में कई उपकरण भी दिए गए।

आईपीएम मेला: किसानों को मुफ्त मिले फ्रूट फ्लाई ट्रैप और सांप से बचने के यंत्र, बताई गईं फसल बचाने की सस्ती और घरेलू विधियां

उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिले में स्थित कृषि विज्ञान केंद्र-2 (कटिय़ा) में महिलाओं को बांटे गए आईपीएम के उपकरण। फोटो- अरविंद शुक्ला

कटिया (उत्तर प्रदेश)। "एक फल मक्खी तरबूज, कद्दू और लौकी जैसी फसलों के 40 फलों को सड़ा सकती है। खेत में ऐसी हजारों मक्खियां होती हैं। किसान ऐसे कीट-पतंगों से फसल बचाने के लिए हजारों रुपए के कीटनाशक डालते हैं फिर भी कई बार किसानों की पूरी फसल चली जाती है लेकिन 50 से 70 रुपए का एक फल मक्खी (फ्रूट फ्लाई) ट्रैप आसानी से ये फसल बचा सकता है।" फसल सुरक्षा वैज्ञानिक डॉ. डीएस श्रीवास्तव ने कहा। फ्रूट प्लाई तरबूज-कद्दू जैसे फसलों की बतियों में अगर एक बार डंक मार दे तो पूरा फल सड़ जाता है।

डॉ. श्रीवास्तव उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिले में स्थित कृषि विज्ञान केंद्र-2 कटिया में आयोजित आईपीएम किसान मेले में किसानों को यांत्रिक विधियों से फसल बचाने के तरीके बता रहे थे। इस समारोह में जिले के अनुसूचित जाति के किसानों को आईपीएम (एकीकृत नाशीजीव प्रबंधन) से जुड़े उपकरण फेरोमोन ट्रैप, लाइट एवं फ्रूट फ्लाई ट्रैप, सांप से बचने के लिए यंत्र, जैविक कीटनाशक, वर्मी बेड, बखारी समेत, अनाज में नमी मापक यंत्रों का वितरण किया जा रहा था।

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, अटारी जोन-3 कानपुर के निर्देशक डॉ. अतर सिंह और अन्य मेहमानों को सांप भगाने वाले सौर्य ऊर्जा से संचालित यंत्र दिखाते डॉ. डीएस. श्रीवास्तव। फोटो- अरविंद शुक्ला

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के राष्ट्रीय समेकित नाशीजीव प्रबंधन केंद्र, पूसा, नई दिल्ली के सहयोग से अनुसूचित जाति- उप परियोजना अंतर्गत उत्तर प्रदेश के छह जिलों के 6 केवीके के जरिए अनुसूचित जाति से जुड़े किसानों तक उन्नत तकनीकी का लाभ पहुंचाया जा रहा है। इस योजना में कृषि विज्ञान केंद्र कटिया सीतापुर को भी कार्यभार सौंपा गया है।

कार्यक्रम के प्रभारी एवं वैज्ञानिक फसल सुरक्षा डॉ. डी. एस. श्रीवास्तव ने बताया कि योजना के तहत आज 72 लाभार्थियों को आदान (उपकरण आदि) दिए गए हैं, जबकि पूरे जिले की बात करें तो केवीके से जुड़े 9 विकास खंडों के 42 ग्राम के 800 से अधिक किसानों तक लाभ पहुंचाया जा चुका है।"

कार्यक्रम का उद्घाटन उत्तर प्रदेश सरकार में राज्य मंत्री एवं राज्य ललित कला अकादमी के उपाध्यक्ष गिरीश चंद्र मिश्र, केंद्रीय उपोष्ण बागवानी संस्थान के निदेशक डॉ. शैलेंद्र राजन, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, अटारी जोन-3 कानपुर के निर्देशक डॉ. अतर सिंह ने किया।

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अनुसूचित जाति, एफपीओ और महिला स्वयं सहायता समूहों से जुड़े किसानों और महिला किसानों को सोलर स्प्रे मशीन, पीईपी किट, और दूसरे उपकरण गिफ्ट किए गए।

आईपीएम मेले में उपस्थित सीतापुर समेत आसपास के जिलों के कई प्रगतिशील किसान, किसान उत्पादक समूह और स्वयं सहायता समूह से जुड़ी महिलाओं को संबोधित करते हुए राज्य मंत्री गिरीश चंद्र मिश्र ने सरकार द्वारा अनुसूचित जाति के लाभार्थियों को यांत्रिक उपकरण उपलब्ध कराने के प्रयासों की सराहना करते हुए कहा, "तकनीकों के प्रयोग से अंतिम छोर पर बैठे किसान भी आत्मनिर्भर एवं सशक्त बन सकेंगे। आज जिस तरह बिना केमिकल वाले उत्पादों की मांग बढ़ रही है, ऐसे में किसानों के लिए आईपीएम मददगार बन सकती है।"

केंद्रीय उपोष्ण बागवानी संस्थान (CISH) रहमान खेड़ा लखनऊ के निदेशक डॉ. शैलेंद्र राजन ने किसानों को नई तकनीकों को अपनाने के लिए आगे आने को कहा। अपने संबोधित में डॉ. राजन ने कहा कि किसानों को वैज्ञानिक अनुसंधान केंद्रों की मदद लेकर खेती, किसानी बागवानी की नई तकनीकों को अपनाना होगा, खासकर युवाओं को चाहिए कि वो आगे आकर ये चीजें सीखें, ताकि किसानों को इसका ज्यादा से ज्यादा फायदा मिल सके।


समारोह में आसपास के जिलों (हरदोई, बाराबंकी, अमेठी, लखीमपुर) के प्रगतिशील और जैविक खेती करने वाले किसानों ने अपने उत्पाद और कार्यों का भी प्रदर्शन किया।

इस दौरान निदेशक अटारी (ICAR- ATPRI) डॉ अतर सिंह ने कहा, "किसान भाइयों को चाहिए कि वो अपने आसपास के कृषि विज्ञान केंद्रों में जरुर जाएं। किसानों को उन्नत बनाने में केवीके का बडा रोल हैं। हर किसान को कृषि विज्ञान केंद्रों द्वारा प्रसारित तकनीकों को जानना एवं समझना होगा ताकि क्षेत्र विशेष एवं आवश्यकता के अनुरूप तकनीकों को अपनाना होगा।'

सीतापुर जिले में कृषि विभाग के उपनिदेशक अरविंद मोहन मिश्र ने किसानों से कहा कि वो आईपीएम अपनाने की दिशा में आगे आएं। उन्होंने कहा, "समेकित यांत्रिक (आईपीएम) तकनीकों को अपनाकर ही हम कीटों में प्रतिरोधक क्षमता उत्पन्न होने से बचा सकते हैं।"

कीटनाशक का छिड़काव करने के दौरान किसानों के शरीर की सुरक्षा के लिए बनाई गई विशेष पोषाक पहने किसानों के साथ महिला उद्यमी ममता पाल। फोटो- अरविंद शुक्ला

इस दौरान केंद्रीय एकीकृत नाशी जीव प्रबंधन केंद्र, लखनऊ के उपनिदेशक (कीट विज्ञान) डॉ जीपी सिंह ने किसानों को विस्तार से यांत्रिक विधियों की खूबियां गिनाईं। उन्होंने बताया कि कि कैसे आईपीएम की तकनीकों से मित्र और शत्रु कीटों का संतुलन बनाकर किसान कीटनाशकों पर होने वाले खर्च को बचा सकते हैं और खेती को लाभकारी बना सकते हैं।

केवीके कटिया के प्रधान वैज्ञानिक एवं अध्यक्ष डॉ आनंद सिंह ने दूरदराज के गांवों से आई महिलाओं के हाथों में नए नए उपकरण की ओर इशारा करते हुए कहा किसानों के कहा कि आप लोग ज्यादा से ज्यादा केवीके आया करें, ताकि आप लोग ऐसे नए नए प्रयोगों का ज्यादा से ज्यादा लाभ उठा सकें। आप लोग (किसान) अगर प्रगति करते हैं तो हम वैज्ञानिकों को भी काफी बल मिलता है।"

सोलर से संचालित लाइट ट्रैप को हाथ में उठाए महिला किसान बिसवां ब्लॉक में पुरैना गांव की किसान सावित्री देवी कहा कि जैसा यहां (कार्यक्रम) में बताया गया है अगर इसे लगाने से हमारी सब्जियों की खेती में कीट नहीं लगेंगे तो काफी फायदा होगा।"

सोलर से संचालित लाइट ट्रैप जो रात होने पर खुद से जल जाता है और सुबह होने पर बंद हो जाता है। इसकी रौशनी में कई आकर्षित होकर चले आए हैं नीचे रखे पानी में गिरकर मर जाते हैं। फोटो- अरविंद शुक्ला

समारोह में जैविक कपड़ों बनाने वाली एक निजी कंपनी की फाउंडर ममता पाल ने आधा दर्जन से ज्यादा किसानों को जैविक कपड़े से बने एप्रैन (डॉक्टरों की तरह पहने जाने वाली पीईपी किट) भेंट की। ममता पाल ने गांव कनेक्शन को बताया, "कोरोना के दौरान हम लोगों ने देखा कि एसी कमरों में रहने के पीईपी किट पहने कई डॉक्टर बेहोश हो गए। प्लास्टिक की ये किट पहनकर काम करना आसान नहीं होता। हमारा किसान तो 44 ड्रिग्री तापमान में भी कीटनाशकों का छिड़काव करता। इसीलिए हमने जैविक कपड़े से शरीर के अनुकूल ये पोशाक तैयार की है, जिसमें न सिर्फ शरीर की कीटनाशकों से सुरक्षा होती बल्कि मौसम से भी बचा जा सकता है।" प्रयोग के तौर पर ये किट इस्तेमाल कर चुके एक युवा किसान दिपांशु ने बताया कि मैंने गेरुए रंग की इस किट का इस्तेमाल किया है, काफी धूप के बावजूद हमें उतनी दिक्कत नहीं हुई जितनी कि प्लास्टिक और वाले कपड़े पहनने से होती थी।''

कार्यक्रम के प्रभारी डॉ. दया शंकर श्रीवास्तव ने कहा, "केंद्र सरकार अनुसूचित जाति के किसानों को सशक्त बनाने और उन तक नई तकनीकी, उन्नत बीज, कृषि पद्धतियां पहुंचाने के लिए देश में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के अलग-अलग संस्थानों के जरिए प्रयास कर रही है। जैसे राष्ट्रीय समेकित नाशीजीव प्रबंधन केंद्र (NCIPM) के जरिए यांत्रिक विधियां पहुंचाई जा रही हैं, इसी तरह गन्ना शोध संस्थान, गेहूं शोध संस्थान, दलहन शोध संस्थान आदि के जरिए भी अनुसूचित जाति के किसानों को लाभ पहुंचाया जा रहा है।" कार्यक्रम का संचालन डॉ. सौरभ ने किया।

फसल सुरक्षा के यांत्रिक उपकण दिखाते डॉ. दया श्रीवास्तव साथ में हैं केवीके के प्रधान वैज्ञानिक डॉ. आनंद सिंह।

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केवीके कटिया में लगी अनाज और सब्जियों की किस्में दिखाते डॉ. आनंद सिंह।



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