असिंचित क्षेत्रों में करें तिलहनी फसल कुसुम की खेती, कम लागत में मिलता है अच्छा उत्पादन

कुसुम की खेती सीमित सिंचाई की दशा में अधिक फायदेमंद होती है, इसकी खेती किसान अभी कर सकते हैं...

असिंचित क्षेत्रों में करें तिलहनी फसल कुसुम की खेती, कम लागत में मिलता है अच्छा उत्पादन

लखनऊ। ऐसे खेत जहां पर सिंचाई की व्यवस्था न हो पाने से खेती नहीं हो पाती, वहां पर किसान कुसुम की खेती कर सकते हैं। खेत की अच्छी तैयारी करके इसकी बुवाई करनी चाहिए। अच्छे जमाव के लिये बुवाई पर्याप्त नमी वाले खेत में ही करें।


इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय, रायपुर (छत्तीसगढ़) के कृषि वैज्ञानिक डॉ. गजेन्द्र सिंह तोमर बताते हैं, "देश के शुष्क भागों (असिंचित क्षेत्रों) में उगाई जाने वाली कुसुम प्रमुख तिलहनी फसल है, जिसमें सूखा सहने की क्षमता अन्य फसलों से ज्यादा होती है। कुसुम की खेती तेल और रंग प्राप्त करने के लिए की जाती है।''

भारत में 2.95 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में लगभग 1.95 लाख टन कुसुम का उत्पादन होता है। फसल का औसत उत्पादन 642 किलो प्रति हेक्टेयर होता है।

ये भी पढ़ें : असिंचित क्षेत्र में भी बेहतर उत्पादन देती है ये फसल, छुट्टा जानवर व नीलगाय भी नहीं पहुंचाते हैं नुकसान


डॉ. गजेंद्र ने बताया, "इसके दाने में तेल की मात्रा 30 से लेकर 35 प्रतिशत होती है। कुसुम का तेल खाने-पकाने और प्रकाश के लिए जलाने के काम आता है। यह साबुन, पेंट, वार्निश, लिनोलियम और इनसे संबंधित पदार्थों को तैयार करने के काम मे भी लिया जाता है।" डॉ. गजेन्द्र सिंह तोमर ने बताया कि कुसुम के तेल में उपस्थित पोली अनसैचूरेटेड वसा अम्ल अर्थात लिनोलिक अम्ल (78 प्रतिशत) खून में कोलेस्ट्राल स्तर को नियंत्रित करता है, जिससे हृदय रोगियों के लिए विशेष उपयुक्त रहता है। इसके तेल से वाटर प्रूफ कपड़ा भी तैयार किया जाता है।

उन्नतिशील प्रजातियां

कुसुम की अच्छी प्रजाति के. 65 है, जो 180 से 190 दिन में पकती है। इसमें तेल की मात्रा 30 से 35 प्रतिशत है और औसत उपज 14 से 15 कुन्तल प्रति हेक्टेयर है। दूसरी प्रजाति मालवीय कुसुम 305 है जो 160 दिन में पकती है। इसमें तेल की मात्रा 36 प्रतिशत है।


ये भी पढ़ें : इस विधि से सरसों की बुवाई करने से मिलेगा दोगुना उत्पादन

बीजोपचार


18-20 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर की दर से प्रयोग करें। कुसुम के बीजों को बुवाई से पहले बीजोपचार करना आवश्यक है, जिससे कि फफूंद से लगने वाली बीमारियों न हो। बीजों का उपचार करने करने तीन ग्राम थायरम या ब्रासीकाल फफूंदनाशक दवा प्रति एक किलोग्राम स्वस्थ्य बीज के लिये पर्याप्त है।

कुसुम की खेती सीमित सिंचाई की दशा में अधिक लाभदायक होती है। यूपी में इसकी खेती बुदेलखण्ड में की जाती है। अन्य तिलहनी फसलों की अपेक्षा पूर्वी मैदानी क्षेत्र के किसान कुसुम की खेती कम करते है। महाराष्ट्र और कर्नाटक कुसुम उत्पादन करने वाले प्रमुख राज्य हैं जहां पर 63 व 25 प्रतिशत क्षेत्र में लगभग 55 व 31 प्रतिशत उत्पादन होता है।

बुवाई का समय और विधि

बुवाई का उचित समय अक्टूबर से नवम्बर है। इसकी बुवाई 45 सेमी कतार की दूरी पर करनी चाहिए। बुवाई के 15-20 दिन बाद अतिरिक्त पौधे निकालकर पौधे से पौधे की दूरी 20 से 25 सेमी. कर दी जाए। बीज को तीन से चार सेमी. की गहराई पर बुवाई करें।

उर्वरकों की मात्रा

उर्वरकों का प्रयोग मिट्टी जांच के हिसाब से करें, अगर मिट्टी की जांच नहीं की है तो 40 किलो. नाइट्रोजन और 20 किलो फास्फोरस का प्रयोग अधिक लाभकारी होता है।

निराई-गुड़ाई व सिंचाई

बुवाई के 20-25 दिन बाद निराई-गुड़ाई करें। अनावश्यक पौधों को निकालते हुए पौधों की दूरी 20-25 सेमी. कर दें। ज्यादातर इसकी खेती असिंचित क्षेत्रों में की जाती है यदि सिंचाई के साधन हैं तो एक सिंचाई फूल आते समय करें।

ये भी पढ़ें : इस मशीन से निकाल सकते हैं 10 तिलहनी फसलों का तेल

Share it
Top