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नाशिक के प्रगतिशील किसान से समझिए कैसे करें प्याज की खेती, देखिए Video

भारत में प्याज के भाव नाशिक से तय होते हैं। इसी नाशिक के किसान जितेंद्र देवरे बता रहे हैं कैसे करें प्याज की उन्नतशील खेती

Arvind ShuklaArvind Shukla   29 Feb 2020 1:46 PM GMT

सटाणा (महाराष्ट्र)। साल 2019 के आखिर में प्याज की कीमतों ने आसमान को छुआ है। फुटकर बाजार में प्याज 200 रुपए किलो तक बिक गया। प्याज की खेती कच्ची खेती (रिस्क वाली) मानी जाती है, मौसम के साथ देने और पैदावार ठीक होने पर मुनाफा अच्छा हो जाता है।

इस साल प्याज की महंगाई को देखते हुए कई राज्यों में किसान प्याज की खेती कर रहे हैं। प्याज की खेती साल में दो बार की जाती है। भारत में प्याज के भाव नाशिक से तय होते हैं। इसी नाशिक के किसान जितेंद्र देवरे बता रहे हैं कैसे करें प्याज की उन्नतशील खेती

महाराष्ट्र में नाशिक जिले को प्याज का गढ़ कहा जाता है। यहां की मंडियों से ही देश में प्याज के रेट तय होते हैं। इसलिए नाशिक में बड़े पैमाने पर प्याज की खेती की जाती है। जितेंद्र देवरे, इसी नाशिक जिले में सटाणा तालुका के करनझाड़ गांव रहने वाले हैं। वो पिछले 10-12 सालों से प्याज की खेती कर रहे हैं। पहले वो सीधे खेत में बुवाई कर खुले में सिंचाई करते थे लेकिन अब वो बेड़ (मेड़) बनाकर खेती करते हैं और उसमें ड्रिप से सिंचाई करते हैं।

महाराष्ट्र के नाशिक जिले में एक किसान के खेत पर प्याज की रोपाई करती महिलाएं। फोटो- अरविंद शुक्ला

15 दिसंबर,2019 को गांव कनेक्शन की टीम जब उनके खेत पर पहुंची तो उनके खेत में बड़े पैमाने पर रोपाई चल रही थी। गांव कनेक्शन ने उनसे प्याज की खेती, बाजार, किस्म और उनके द्वारा अपनाए गए तरीकों के बारे में बात की।

दिसंबर से जनवरी तक में लगाए जाने वाले प्याज की नर्सरी सितंबर-अक्टूबर में तैयार करनी चाहिए। नर्सरी छोटी-छोटी क्यारियों में हो जिनमें पानी का भराव न हो। पहली बार नर्सरी कर रहे किसानों को मिट्टी की जांच जरूर करवा लेनी चाहिए, और उसी के मुताबिक उर्वरक डालनी चाहिए।

रोपाई-

जितेंद्र के मुताबिक भुरभुरी और बलुई मिट्टी प्याज की उपज के लिए सबसे अच्छी होती है। वो लाइन से प्याज की रोपाई कराते हैं और लाइन से लाइन का अंतर 5-6 इंच जबकि प्याज से प्याज की दूरी कम से कम 4 इंच रखते हैं। ताकि प्याज के कंद को बढ़ने की पूरी जगह मिल सके।

प्रगतिशील किसान जितेंद्र देवरे के मुताबिक बूंद-बूंद सिंचाई करने से उनके खेत में उत्पादन बढ़ा है, और रोग भी कम लगे हैं। प्याज को बाकी फसलों की अपेक्षा ज्यादा सिंचाई की जरुरत होती है लेकिन ये सिंचाई हल्की होनी चाहिए। जलभराव होने पर प्याज के कंद के गलने का खतरा रहता है। ड्रिप के द्वारा वो अपने खेत (नाशिक-महाराष्ट्र) में हर 8वें दिन सिंचाई करते हैं। लाखों किसान खुले में भी सिंचाई करते हैं, लेकिन उन्हें जलभराव का ध्यान रखना चाहिए।

नाशिक में भी किसान साल में दो बार करते हैं प्याज की खेती।

प्याज क्या होता है?

प्याज भारत समेत कई राज्यों में खाई जाने वाली प्रमुख सब्जी और मसाला फसल है। इसमें औषधीय गुण भी होते हैं। प्याज में प्रोटीन और कुछ विटामिन भी पाए जाते हैं। सब्जी का मसाला, सलाद, सूप और अचार में इसका बहुतायत उपयोग किया जाता है। भारत में महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान, ओडिशा, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और बिहार प्रमुख हैं।

प्याज की खेती के लिए मिट्टी

प्याज की खेती कई तरह की मृदाओं में हो सकती है। बस मिट्टी ज्यादा क्षारीय और दलदली नहीं होनी चाहिए। साथ ही उसमें जलभराव न होता होता। कार्बन युक्त, दोमट बुलई, बलुई दोमट मिट्टी उपयुक्त है, जिसका पीएच मान 6.5-7.5 होना सर्वोत्तम है। जानकारी किसान कल्याण तथा कृषि विभाग मध्य प्रदेश की अधिकारिक वेबसाइट से ली गई है।

जलवायु

मुख्य तौर पर प्याज सर्दियों के मौसम की फसल है। लेकिन इसे खरीफ (बारिश का सीजन) में भी उगाया जाया है। कंद बनने से पहले प्याज के लिए 210 सेंटीग्रेड तामक्रम उपयुक्त माना जाता है, जबकि इससे पहले 150 से 250 सेंटीग्रेड का तामपान उपयुक्त होता है। जानकारी किसान कल्याण तथा कृषि विभाग मध्य प्रदेश की अधिकारिक वेबसाइट से ली गई है।

पुणे में है प्याज अनुसंधान संस्थान

भारत में प्याज और लहसुन पर शोध और नई किस्में विकसित करने के लिए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद का एक संस्थान भी है, जो महाराष्ट्र के पुणे में स्थित है। पुणे के राजगुरुनगर में स्थित प्याज और लहसुन अनुसंधान निदेशालय (डीओजीआर) ने प्याज की कई किस्में भी विकसित की हैं।


आईसीएआर की पांच किस्में और उनकी खाशियत

भीमा सुपर-

महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, गुजरात, हरियाणा, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, ओडिशा, पंजाब, राजस्थान और तमिलनाडु में खरीफ के सीजन के लिए ये किस्म उपयोगी बताई गई है। लाल किस्म के इस प्याज की पछेती खेती भी की जा सकती है। खरीफ में इसका उत्पादन 20-22 टन प्रति हेक्टेयर और पछेती खरीब में ये उत्पादन बढ़कर 40-45 टन तक पहुंच सकता है। खरीफ में ये फसल 100-105 और पछेती खरीफ में 110 से 120 दिन में पककर तैयार हो जाती है।


भीमा गहरा लाल प्याज। फोटो साभार https://icar.org.in/hi/node/322

भीमा गहरा लाल:

प्याज की इस किस्म में कंद गहरे लाल रंग के चपटे और गोलाकार होते हैं। ये किस्म 95-100 दिन में पककर तैयार हो हाता है। इसकी उपज 20-22 टन प्रति हेक्टेयर है। प्याज और लहसुन अनुसंधान निदेशालय के अनुसार ये महाराष्ट्र, गुजरात, मध्य प्रदेश, हरियामा, कर्नाटक, ओडिशा, पंजाब, तमिलनाडु, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के लिए उपयुक्त बताई है।

भीमा लाला: भीमा लाल प्याज की खेती महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश में रबी सीजन में पहले से हो रही है। इस किस्म को अब आईसीएआर ने गुजरात, हरियाणा, कर्नाटक, पंजाब, तमिलनाडु के साथ ही महाराष्ट्र में भी खरीफ के सीजन के लिए अनुमोदित किया है। खरीफ में ये फसल 105-110 दिन जबकि पछेती खेती करने पर 110-120 दिन में तैयार हो जाती है। खरीफ उपज थोड़ी कम 19-21 टन प्रति हेक्टेयर तो रबी मौसम में बंपर उत्पादन देती है। भीमा लाल रबी के सीजन में 30-32 टन प्रति हेक्टेयर तक पैदा होता है। रबी के प्याज को तीन महीने तक भंडारण भी किया जा सकता है। यानी ये जल्दी सड़ता नहीं है।

भीमा श्वेता- हम और आप अक्सर लाल प्याज की खाते रहे है लेकिन भारत के कई इलाकों में सफेद रंग के प्याज की भी खेती हो रही है। सफेद प्याज की ये किस्म फिलहाल रबी के मौसम में ही उगाई जाती रही है। महाराष्ट्र, गुजरात, छत्तीसगढ़, ओडिशा, राजस्थान, तमिलनाडु और कर्नाटक के लिए अब इसे खरीफ सीजन के लिए भी बोने की सलाह दी गई है। 110-120 दिन में तैयार होने वाली ये किस्म खरीफ में औसत उपज 18-20 टन जबकि रबी में ये 26-30 टन तक पैदावार देता है। इसे भी 3 महीने तक भंडारित किया जा सकता है।

भीमा शुभ्रा- ये सफेद प्याज की दूसरी किस्म है। जिसे वैज्ञानिकों ने छत्तीसगढ़, गुजरात, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, ओडिशा, राजस्थान और तमिलनाडु में खरीफ मौसम के लिए अनुमोदित किया था। महाराष्ट्र में पछेती खरीफ के लिए इसकी खेती की सलाह दी गई है। इस किस्म की खास बात ये है कि ये मौसम के उतार चढ़ाव काफी हद तक सह सकती है। भीमा शुभ्रा 110-115 दिन में खरीफ में और पछेती खरीफ में 120-130 दिन में ये पककर तैयार हो जाती है। अगर बात उत्पादन की करें तो खरीफ में 18-20 और पछेती खरीब में 36-42 टन प्रति हेक्टेयर की उपज ली जा सकती है।

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