कृषि सुझाव

खरतपवार के चलते 15 से 25 फीसदी तक घट रहा है फसल उत्पादन , करने होंगे ये उपाय

किसान अच्छा बीज होते हैं, खाद और पानी पर पैसा खर्च करते हैं बावजूद इसके कई बार उनको अच्छा उत्पादन नहीं मिलता है इसकी एक बड़ी वजह खरपतवार भी हो सकते हैं। वो फसल का पानी और पोषक तत्व सोखकर नुकसान पहुंचाते हैं, जानिए कैसे

किसानों की मेहनत खराब मौसम ही नहीं बल्कि दूब, मोथा और कांस जैसे खरपतवार पानी फेर रहे हैं। खेतों में फसलों के साथ उगकर यह जमीन में उपलब्ध पोषक तत्वों फसलों के मुकाबले तेजी से ग्रहण करके नुकसान पहुंचा रहे हैं, जिसका सीधा असर उत्पादन पर पड़ रहा है।

भारतीय खरपतवार अनुसंधान निदेशालय जबलपुर की रिपोर्ट के अनुसार इन खरपतरवारों की वजह से 15 से लेकर 25 प्रतिशत उत्पादन घट रहा है। इसको देखते हुए किसान अपने खेतों को खरपतवार से नियंत्रण कैसे करें इसको लेकर निदेशायल की तरफ से किसानों का जागरूक किया जा रहा है। यहां के निदेशक डा. पी.के. सिंह ने बताया फसलों को खरपतवार से बचाने के लिए और कृषि उपज को बढ़ाने के लिए भारतीय खरपतवार अनुसंधान निदेशालय लगातार काम कर रहा है। अप्रैल और मई के पहले सप्ताह में किसान अपने खेतों की गहरी जुताई करके इन खरपतवारो से अपने खेतों को मुक्त करा सकते हैं।

खरपतवार निकालने में भी खर्च होते हैं काफी पैसे। फोटो गांव कनेक्शऩ

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दूब, मोथा और कांस जैसे खरपतवारों को पानी की कम आवश्यकता होती है। ये सूखा को भी आसानी से सह लेते हैं। इनकी जड़े फसलों के मुकाबले अधिक गहरी होती हैं, जिससे भूमि की उन निचली सतह पर जाकर यह भोजन और पानी को ग्रहण कर लेते हैं जहां पर फसल की जड़े नहीं पहुंच पाती हैं।

दूब, मोथा और कांस जैसे खरपतवारों को पानी की कम आवश्यकता होती है। ये सूखा को भी आसानी से सह लेते हैं। इनकी जड़े फसलों के मुकाबले अधिक गहरी होती हैं, जिससे भूमि की उन निचली सतह पर जाकर यह भोजन और पानी को ग्रहण कर लेते हैं जहां पर फसल की जड़े नहीं पहुंच पाती हैं। कृषि वैज्ञानिक डा. सुशील कुमार ने बताया कि खरपतवार की पत्तियों पर पर्णरन्ध्र जिसे स्टोमेटा कहा जाता है पाए जाते हैं। जिसके कारण इनकी पत्तियां अधिक क्रियाशील होती हैं। जिसके कारण फसलों के मुकाबले खेतों में उपलब्ध पोषक तत्वों को यह अधिक मात्रा में ले लेते हैं।

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उन्होंने बताया कि खरतवार विभिन्न फसलों के साथ ट्रेडिशनली रूप से अपने आप पैदा हो जाते हैं। जमीन में उपलब्ध नाइट्रोजन, पोटेशियम और फास्फोरस को सबसे ज्यादा मात्रा में ले लेते हैं। जिससे फसलों के अंदर इन पोषक तत्वों की कमी हो जाती और और फसल कमजोर हो जाती है। इन खरपतवारों में दूब बहुत ज्यादा नुकसान दायक है।

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दूब घास एक बहुवर्षीय पत्री खरपतवार है। इसकी जड़े बहुत ज्यादा फैलती हैं। नम और शुष्क दोनों मौसम में यह तेजी से विकास करते हैं। इसका सबसे ज्यादा प्रकोप खरीफ की फसलों में होता है। इसके नियंत्रण के लिए किसानों का सलाह जारी करते हुए खरपतवार अनुसंधान निदेशालय ने बताया है कि ग्रीष्मकालीन मौसम में खेतों की जुताई कर देनी चाहिए जिससे दूब की जड़ें सूख जाती हैं। आने वाले खरीफ सीजन को देखते हुए अभी किसानों को खेतों की दो-तीन जुताई करने की सलाह दी गई है। इसके साथ ही इससे निपटने के लिए जुताई से पहले खेतों में पैराक्वाट की एक किलोग्राम मात्रा को 500 लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्टेयर छिड‍़काव करना चाहिए।

खरपतवारों में मोथा भी फसल को अधिक नुकसान पहुंचाता है। यह साइप्रेसी कुल का खरपतवार है। इसे अग्रेजी में लटग्रास कहते हैं। यह एक बहुवर्षीय खरपतवार है। यह जमीन के अंदर नमी का शोषण करते फसल को नुकसन पहुंचाता है। यह फसलों की जाड़ों की वृद्धि को भी रोक देता है। मोथा भारी संख्या में बीज भी उत्पन्न करता है। मक्का, अरहर और ज्वार की फसलों को तो यह 50 प्रतिशत तक नुकसान पहुंचा देता है।इसकी रोकथाम के लिए कृषि वैज्ञानिकों ने किसानों का शस्य क्रिया अपनाने को कहा है। अप्रैल और मई महीने में जब तेज धूप हो तब खेतों की गहरी जुताई और उसके साथ डी सोडियम साल्ट 3 किलोग्राम को 500 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करने को कहा है।

कांस भी एक खतरनाक खरपतवार है। इसकी जड़े बहुत गहरी होती हैं। जहां पर यह उगता है वहां के आसपास की जमीन में इसकी जड़ों को जाल बिछ जाता है। यह अंदर की नमी और पोषक तत्वों को जमीन से चूस लेता है। ऐसे में इसके नियंत्रण के लिए खेत में तीन-चार जुताई के साथ ही फेनेक नामक खरपतवार नियंत्रक की 3 किलोग्राम मात्रा को 500 लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्टेयर छिड़काव करने की सलाह दी गई है।

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