पहली बार उत्तर प्रदेश से निर्यात हुआ केला, लखीमपुर के किसानों को ईरान केला भेजने का मिला मौका

उत्तर प्रदेश के लखीमपुर जिले के पलिया कला के किसानों के केले को ईरान निर्यात किया गया है। यह पहला मौका है जब उत्तर प्रदेश से किसी देश को केला निर्यात हुआ है।

पहली बार उत्तर प्रदेश से निर्यात हुआ केला, लखीमपुर के किसानों को ईरान केला भेजने का मिला मौका

लखनऊ के मैंगो पैक हाउस में केले को पैक करके ईरान निर्यात किया गया। सभी फोटो: अरेंजमेंट

पिछले कुछ वर्षों में केले की खेती में उत्तर प्रदेश के किसान भी बढ़िया कर रहे हैं, यहां पर न केवल रकबा बढ़ा है, बल्कि उत्पादन भी बढ़िया हो रहा है।

उत्तर प्रदेश से कृषि निर्यात को बढ़ावा देने की क्षमता को ध्यान में रखते हुए, एपीडा वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय भारत सरकार ने निर्बाध रूप से काम किया।इसी क्रम में उत्तर प्रदेश से 14 अक्टूबर 2021 को पहली केले की खेप ईरान के लिए मैसर्स- देसाई एग्रो फूड्स प्राइवेट लिमिटेड द्वारा रवाना की गई जो समुद्री मार्ग से भेजी जाएगी।


केला दुनिया के सबसे लोकप्रिय फलों में से एक है। यह उत्पादन के मामले में गेहूं, चावल और मक्का के बाद चौथी सबसे महत्वपूर्ण खाद्य फसल है, और खपत मात्रा के मामले में दुनिया के पसंदीदा फलों में से एक। इसे न केवल कच्चा खाया जाता है, बल्कि जूस, सॉस, पके हुए माल और विभिन्न व्यंजन बनाने में भी उपयोग किया जाता है। भारत वैश्विक केले के उत्पादन का 30% उत्पादन करता है।

उत्तर प्रदेश के लखीमपुर जिले के के पलिया कला के किसानों के केले को निर्यात किया गया है। इसे लखनऊ लाया गया और लखनऊ स्थित मैंगो पैकहाउस में पैक किया गया था। 40 फीट के दो रेफर कंटेनर में कुल 40 मीट्रिक टन केले की ईरानी बाजार में ट्रायल के आधार पर भेजा गया।

यह पहली बार होगा जब अंतरराष्ट्रीय बाजार उत्तर प्रदेश में उगाए गए केले की मिठास का स्वाद चखेगा।

अपर मुख्य सचिव कृषि एवं विपणन उत्तर प्रदेश सरकार की अध्यक्षता में निदेशक एपीडा, एपीडा के अन्य वरिष्ठ अधिकारियों, उत्तर प्रदेश सरकार के वरिष्ठ अधिकारियों, निदेशक देसाई एग्रीफूड्स प्राइवेट लिमिटेड मौजूद रहे।

अपर मुख्य सचिव, कृषि और विपणन उत्तर प्रदेश सरकार ने उत्तर प्रदेश को कृषि निर्यात का केंद्र बनाने की दिशा में काम किए जाने पर एपीडा के प्रयासों की सराहना की। साथ ही उत्तर प्रदेश सरकार के साथ पारस्परिक रूप से किसानों के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित करने का अनुरोध किया। संबोधन के दौरान उन्होंने सरकार द्वारा विकसित कृषि निर्यात नीति पर प्रकाश डाला। यूपी के किसानों और व्यापारियों से इसका लाभ उठाने का अनुरोध भी किया।

एपीडा के निदेशक डॉ तरुन बजाज ने कहा कि एपीडा केले के लिए बाजार विकसित करने की दिशा में सख्ती से काम कर रहा है और किसानों को निर्यात योग्य खेती के प्रति संवेदनशील बनाने के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम भी आयोजित कर रहा है।

उत्तर प्रदेश में कुल 3078.73 हजार मीट्रिक टन का उत्पादन होता है । उत्तर प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों जैसे में लखीमपुर, महाराजगंज, कुशीनगर, इलाहाबाद, कौशाम्बी आदि में अंतरराष्ट्रीय बाजार के निर्यात योग्य केले उगाने की अत्यधिक क्षमता है।

एपीडा के क्षेत्रीय प्रभारी (यूपी) डॉ सीबी सिंह ने कहा कि यूपी के मेहनतकश किसानों के लिए यह ऐतिहासिक क्षण है। निर्यात बाजार उनकी मेहनत और खेती का प्रतिफल है। केले के यह अब तक का पहला शिपमेंट है जो उत्तर प्रदेश से अंतरराष्ट्रीय बाजार में निर्यात हुआ है। इसका विपणन कृषकों को सहज अवसर को प्रदान करेगा।

40 फीट के दो रेफर कंटेनर में कुल 40 मीट्रिक टन केले की ईरानी बाजार में ट्रायल के आधार पर भेजा गया।

आंकड़ों को ध्यान में रखते हुए, ईरान, खाड़ी देशों, यूरोपीय राष्ट्रों आदि को कुल भारत का निर्यात लगभग 135.2 हजार मीट्रिक टन है और लगभग 415.06 करोड़ रुपये के केले का निर्यात किया जाता है, जिसे 2022 के अंत तक 165 हजार मीट्रिक टन तक अनुमानित किया जा सकता है।

यूपी से अधिक खेप उठाने के लिए नए बाजार यानी यूएसए, बेल्जियम, रूस, जर्मनी, जापान आदि की खोज की जा सकती है।

सेंट्रल इंस्टीट्यूट फॉर सबट्रॉपिकल हॉर्टिकल्चर के निदेशक डॉ. राजन ने कहा कि दक्षिण पूर्व एशियाई केला क्षेत्र को बचाने के लिए इनोटेरा ग्रुप की फर्म देसाई एग्रीफूड्स (डीएएफ) को आईसीएआर-फ्यूसिकॉन्ट के निर्माण के लिए एक वैश्विक लाइसेंस प्रदान किया गया है। यह तकनीक उत्तर प्रदेश के केला उत्पादक जिलों के लिए भी महत्वपूर्ण है, जो फ्यूसैरियम विल्ट रोग के उष्णकटिबंधीय स्ट्रेन 4 से प्रभावित हैं।"

वो आगे कहते हैं, "सीएसएसआरआई के क्षेत्रीय स्टेशन और सीआईएसएच, लखनऊ ने इस तकनीक का सह-विकास किया। रोग प्रबंधन में वैज्ञानिक योगदान से किसानों को हॉटस्पॉट क्षेत्रों में भी निर्यात गुणवत्ता वाले केले का उत्पादन करने की संभावना से निर्यात में सहायता करेगा। यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि फसल कटाई से पहले रोग के लक्षण दिखाई देते हैं, जिससे फलों की गुणवत्ता कम हो जाती है। अतः इस भयावह बीमारी के उचित प्रबंधन से ही रोग ग्रस्त क्षेत्रों में अच्छी गुणवत्ता वाले केले के उत्पादन संभावना बढ़ जाती है।

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