Ground Report: एमपी के किसान ने कहा- फांसी लगाने के अलावा कोई दूसरा चारा नहीं

मध्य प्रदेश सरकार के अनुसार प्रदेश में अभी तक बारिश के कारण लगभग 60 लाख एकड़ की फसल बर्बाद हो चुकी है। इससे 22 लाख किसानों के लगभग 9 हजार 600 करोड़ रुपए डूब चुके हैं।

Mithilesh DubeyMithilesh Dubey   27 Sep 2019 9:53 AM GMT

हरदा/इंदौर/उज्जैन (मध्य प्रदेश)। "मेरे सामने अब फांसी लगाने के अलावा कोई दूसरा चारा नहीं है। मैंने अपने पांच एकड़ और बंटाई के 40 एकड़ में सोयाबीन लगाया था। पूरी फसल-फसल चौपट हो गई है। कर्ज भरने में वर्षों लग जाएंगे। बच्चे कैसे खाएंगे, कैसे पढ़ेंगे, मैं आगे की खेती कैसे करूंगा, कुछ भी समझ नहीं आ रहा," हरदा निवासी किसान दिनेश पाटिल कहते हैं।

मध्य प्रदेश के जिला हरदा, गांव अबगांव के रहने वाले किसान दिनेश पाटिल की तरह पूरे मध्य प्रदेश के किसानों का यही हाल है। पिछले दो महीने से लगातार हो रही बारिश ने उड़द और सोयाबीन की फसल बर्बाद कर दी है। कहीं-कहीं 100 फीसदी तो कहीं 80 से 90 फीसदी चौपट हो चुकी है।

दिनेश पाटिल आगे बताते हैं, "उनकी फसल पूरी तरह बर्बाद हो चुकी है। खर्च की बात करें तो प्रति एकड़ 10 से 12 हजार रुपए का खर्च आया था। इस तरह कई लाख रुपए तो सीधे तौर पर डूब गये। मुनाफा जोड़ेकर देखेंगे तो नुकसान बहुत ज्यादा है।"

किसानों के लिए पीला सोना कहे जाने वाला सोयाबीन पर इस बार प्रकृति ने ऐसा कहर बरपाया है कि किसान इसकी खेती ही छोड़ने की ही बात कर रहे हैं। मध्य प्रदेश सरकार के अनुसार प्रदेश में अभी तक बारिश के कारण लगभग 60 लाख एकड़ की फसल बर्बाद हो चुकी है। इससे 22 लाख किसानों के लगभग 9 हजार 600 करोड़ रुपए डूब चुके हैं। फाइनल आंकड़े आने अभी बाकी हैं लेकिन इन आंकड़ों से भी बदहाली की अंदाजा लगाया जा सकता है।

मध्य प्रदेश सरकार की मानें तो प्रदेश में सोयाबीन की पैदावार प्रति हेक्टयेर 25 कुंतल तक होती है। अब दिनेश पाटिल के हुए नुकसान का एक आकलन करते हैं। उन्होंने 40 एकड़ यानि लगभग 16 हेक्टेयर में सोयाबीन की खेती की जो पूरी तरह से बर्बाद हो चुकी है। सोयाबीन के लिए सरकार ने 3399 रुपए की एमएसपी (न्यूनतम समर्थन मूल्य) तय की है।

भारी बारिश से खराब हुई सोयाबीन की फसल

सरकार के आंकड़ों को ही केंद्र में रखकर देखें तो अगर दिनेश पाटिल की फसल सही होती तो 16 हेक्टेयर में सोयाबीन की कुल पैदावार 400 कुंतल होती जिसे अगर वे सरकारी तय रेट पर बेचते तो उन्हें 13,59,600 रुपए मिलता।

इसमें से अगर उनकी लागत (12 हजार रुपए एकड़ के हिसाब से) 480,000 रुपए निकाल दें तो उन्हें कुल 8,79,600 मुनाफा हो सकता था जो पानी में डूब चुका है। प्रदेश में सबसे ज्यादा नुकसान सोयाबीन की फसल का हुआ है।

मध्यप्रदेश में सोयाबीन खरीफ की एक प्रमुख फसल है, जिसकी खेती लगभग 53.00 लाख हेक्टेयर क्षेत्रफल में की जाती है। देश में सोयाबीन उत्पादन के क्षेत्र में मध्य प्रदेश का पहला स्थान है, जिसकी हिस्सेदारी 55 से 60 प्रतिशत के बीच है।

मध्य प्रदेश के हरदा, इंदौर, छिंदवाड़ा, नरसिंह, सागर, देवास, दमोह, छतरपुर, खंडवा, देवास जैसे जिलों में सोयाबीन की अच्छी खेती होती है।

इंदौर जिले के तहसील सावेर के गांव परसपुर के रहने वाले किसान मुकेश तिवारी बताते हैं, " मैंने जून महीने में 25 एकड़ खेत में सोयाबीन लगाया था। ये फसल 80 से 90 दिन में पूरी होनी थी लेकिन 90 दिन से ज्यादा का समय हो गया है। खेतों में इतना पानी भरा है कि हम जा भी नहीं सकते।"

" इस बार तो इल्लियों का प्रकोप भी ज्यादा था। इस वजह से खर्च भी बहुत हुआ। जो पैसा गया तो गया अब अगर हमें अगली फसल लगानी है तो पूरे खेत में मजदूर लगाकर खराब हुई सोयाबीन की फसल को निकलवाना पड़ेगा। इसमें भी बहुत खर्च आने वाला है। कुल मिलकार ये फसल तो बर्बाद हुई है अगली में भी फायदा नहीं होने वाला है।"

सोयाबीन के पौधे पीले पड़ पर रहे हैं।

कृषि मंत्रालय भारत सरकार के अनुसार देशभर में अभी तक 113.3 लाख हेक्टयेर सोयाबीन की बुवाई हुई है। इसमें सबसे ज्यादा मध्य प्रदेश में 55.160 लाख हेक्टेयर (48 फीसदी) क्षेत्र में सोयाबीन की बुवाई हुई है। इसके बाद दूसरे पर नंबर महाराष्ट्र है जहां 39.550 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में सोयाबीन की खेती हुई है। महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश सोयाबीन के सबसे बड़ उत्पादक राज्य है।

इस वर्ष मानसून का रवैया भी अजब रहा। देश का आधा हिस्सा जहां भीषण सूखे की चपेट में है तो वहीं आधा हिस्सा बाढ़ की चपेट में भी है। इस सबके बीच मध्य प्रदेश में इस वर्ष सामान्य से ज्यादा हुई बारिश ने तबाही मचाई।

मौसम विभाग के अनुसार मध्य प्रदेश के 51 में से 22 जिलों में बाारिश सामान्य से ज्यादा हुई। जबकि 8 जिले अतिवृष्टि की चपेट में हैं। बारिश अभी भी थमी नहीं है। मौसम विभाग ने महीने के अंत तक भारी बारिश होने की चेतावनी दी है।

उज्जैन मध्य प्रदेश का सबसे बड़ा सोयाबीन उत्पादक जिला है। जिला मुख्यालय से लगभग 60 किमी नागदा के ढेलनपुर गांव के नारायाण पाटीदार ने कहते हैं, " इस बार शुरू में तो बारिश ही नहीं हुई। डर के मारे में हमने खरीदकर खेतों में पानी पहुंचाया जिससे बहुत पैसा खर्च हुआ। और अब बारिश इतनी हो गई कि लगभग 80 फीसदी बर्बाद हो गई है। अभी तो और बारिश होने वाली है। रही-सही फसल बर्बाद हो जायेगी। खेतों में पानी जमा है जिस कारण सोयाबीन की जड़ें गलने लगी हैं। पत्तियां भी सड़ रही है।"

हरदा के सोयाबीन किसानों से बातचीत यहां देखिए


उज्जैन में इस साल 4 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में सोयाबीन की खेती हुई है। मौसम विभाग के 16 सितंबर तक आंकड़े बताते हैं कि जिले में सामान्य से 67 फीसदी ज्यादा बारिश हुई है जिसने सोयाबीन की फसल को बर्बाद कर दिया है।

देवास जिले के भी हालात कुछ ऐसे ही है। जिले के विजयनगर मेंडिया के किसान घनश्याम पाटीदार कहते हैं, "साहूकार से कर्ज लेकर फसल बोई थी लेकिन प्रकृति की मार के चलते फसल बर्बाद हो गई है। अभी तक कृषि विभाग के अधिकारियों ने मौके पर पहुंच कर जायजा भी नहीं लिया है। इलाके के विधायक मनोज चौधरी ने दौरा किया था और सर्वे करवाने का आश्वासन दिया था लेकिन अभी तक कोई भी नहीं पहुंचा।"

"अब किसान आत्महत्या नहीं करेगा तो क्या करेगा। सोचा था कि उपज बेचने के बाद जो पैसा मिलेगा उससे कर्ज उतार दूंगा लेकिन फसल ही चौपट हो गई है। अब आगे क्या होगा इसका भी मालिक भगवान ही है।"

30 हजार रुपए प्रति हेक्टेयर तक मुआवजा देने का ऐलान

पिछले दिनों में बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों का दौरा करने गये प्रदेश के मुख्यमंत्री कमल नाथ ने कहा कि 15 अक्टूबर तक सभी किसानों को मुआवजा दे दिया जायेगा। उन्होंने कहा कि जिन किसानों की फसलें बाढ़ के कारण पूरी तरह नष्ट हो गई हैं, उन्हें आरबीसी 6(4) के प्रावधानों के तहत 8 हजार से लेकर 30 हजार रुपए तक प्रति हेक्टेयर मुआवजा दिया जाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि केन्द्र सरकार मदद नहीं देगी तो राज्य सरकार अपने बजट में कटौती कर बाढ़ प्रभावितों की मदद करेगी।

25 सितंबर तक देशभर में हुई बारिश की रिपोर्ट राज्यवार (रिपोर्ट- भारतीय मौसम विज्ञान विभाग)


सरकार के अनुसार आरबीसी 6(4) के प्रावधानों के अनुसार 2 हेक्टेयर से कम भूमि वाले और 2 हेक्टेयर से अधिक भूमि वाले किसानों की सिंचित/असिंचित भूमि में 33 से 50 प्रतिशत फसल की क्षति होने पर आठ हजार रुपए प्रति हेक्टेयर से लेकर 26 हजार रुपए प्रति हेक्टयर तक मुआवजा दिया जाएगा।

इसी तरह 50 प्रतिशत से अधिक फसल की क्षति होने पर विभिन्न फसलों के लिए 16 हजार रुपए प्रति हेक्टेयर से लेकर 30 हजार रुपए प्रति हेक्टेयर तक मुआवजा दिया जाएगा। सभी प्रभावित किसानों के खातों में 15 अक्टूबर तक राशि पहुंच जाएगी। मुख्यमंत्री ने बताया कि जिन किसानों का पानी भर जाने के कारण गेहूँ, चना, सरसों, मटर, मसूर, अलसी आदि के बीजों को भंडारण खराब हो गया है उन्हें आगामी रबी फसल के लिए उच्च गुणवत्ता के बीज भी दिये जाएंगे।

पेड़ में लगी फली में ही अंकुरण शुरू हो गया है।

आरबीसी 6(4) के तहत राज्य सरकार प्राकृतिक प्रकोपों से होने वाली जन, धन, पशु और फसल हानि आदि पर तात्कालिक आर्थिक सहायता देती है।

हलांकि किसान सरकार की इस प्रक्रिया से खुश नहीं हैं। उनका अरोप है कि पटवारी को तीन से चार दिन का समय दे दिया गया सर्वे के लिए, इतने कम समय में वो खेतों तक कैसे पहुंचेगा।

आम किसान यूनियन के नेता राम इनानिया कहते हैं, " सरकार ने पटवारियों को भेजकर सर्वे करा लिया जबकि सच तो यह है कि अभी खेत तक किसान तो जा नहीं पा रहा है तो अधिकारी कैसे पहुंचेंगे। सरकार का ही आदेश है कि हर किसानों का खसरा नंबर से नुकसान का सर्वे होगा लेकिन ये कैसे होगा ?"

वो आगे कहते हैं, " सरकार ने जो स्लैब बनाया है वो नुकसान के हिसाब से बहुत कम है। अब हमारे यहां तो 100 फीसदी तक फसल बर्बाद हो गई है ऐसे में सरकार को चाहिए था कि 100 फीसदी नुकसान मानकर मुआवजे का ऐलान करते। और सरकार यह भी तय नहीं कर रही है कि किस क्षेत्र के किसानों को 30 हजार रुपए प्रति हेक्टयेर का मुआवजा मिलेगा। "

22 से 25 जिलों में अतिवृष्टि और बाढ़ जैसे हालात थे तो कुछ जिले ऐसे में हैं जहां के कुछ क्षेत्रों की फसल बर्बाद हुई है। अभी तक हुए सर्वे में जो रिपोर्ट सामने आई है उसमें लगभग 22 से 23 लाख किसान ऐसे हैं जिनकी फसल बर्बाद हुई है, इनकी पहचान की ली गई है।

किसान कांग्रेस के मध्य प्रदेश कार्यवाहक अध्यक्ष केदार सिरोही कहते हैं, " 60 से 70 लाख एकड़ की फसल बर्बाद होने का अनुमान है। हमने जियोग्राफिकल तरीके से सर्वे कराया है। जैसे ढलान वाले क्षेत्रों में जहां पानी ज्यादा रुकेगा तो वहां नुकसान भी ज्यादा हुआ। हमने सर्वे का ये तरीका इसलिए अपनाया ताकि वास्तविक प्रभावित किसानों को मुआवजा मिल सके।"

खेतों से सोयाबीन के पौधे उखाड़ते हरदा के किसान दिनेश पाटिल। खेत की सफाई के बाद ही अगली फसल लग पायेगी। इसमें भी काफी खर्चा आयेगा।

"हम अब आरबीसी 6(4) तहत मुआवजा देने जा रहे हैं जिसे शिवराज सिंह की सरकार ने बंद करा दिया था। इसके तहत हम मुआवजे की राशि को स्लैब के आधार पर दे रहे हैं। ये इसलिए भी जरूरी है कि हर किसान को उसके नुकसान के हिसाब से पैसे मिल सके।" केदार सिरोही कहते हैं।

वो आगे कहते हैं, " मध्य प्रदेश के खजाने में पैसा ही नहीं है। पिछली सरकार कर्ज लिमिट से आगे निकल गई थी। मध्य प्रदेश के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि 32160 करोड़ रुपए जो राज्य की हिस्सेदारी होती है वो केंद्र सरकार हमको नहीं दे रही है लेकिन हम किसानों को नुकसान नहीं होने देंगे। हम यह भी प्रयास कर रहे हैं किसानों को मुआवजे के अलावा फसल बीमा का भी पूरा लाभ मिल इसके लिए हम टीम भी बना रहे हैं।"

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