किसानों की मेहनत रंग लाई

किसानों की मेहनत रंग लाईप्रतापगढ़ जिले के किसान अजब नारायण पाण्डेय।

सौ एकड़ ऊसर भूमि में अब हो रही खेती

स्वयं प्रोजेक्ट डेस्क

प्रतापगढ़। कई वर्षों तक दिल्ली में नौकरी करने के बाद जब गाँव लौटे तो सभी ने कहा की क्या कर पाएंगे, खेत तो किसी काम का नहीं जिसमें खेती कर पाएंगे, लेकिन आज उसी खेत में फ़सल लहलहा रही है।

प्रतापगढ़ ज़िला मुख्यालय से लगभग 35 किमी दूर उत्तर-पूर्व दिशा में पट्टी ब्लॉक के दीडीह धौरहरा गाँव में कई एकड़ भूमि पूरी तरह से बंजर है, उसी बंजर ज़मीन में से दस बीघा जमीन अजब नारायण पाण्डेय (60 वर्ष) की भी हैं, लेकिन आज वो बंजर नहीं उसमें, मटर, गेहूं, आलू और बरसीम जैसी फसलें लगी हुई।

अजब नारायण पाण्डेय बताते हैं, "कई साल पहले दिल्ली नौकरी करने चला गया था, इतनी खेती नहीं थी कि यहां पर रुकता। कई साल नौकरी करने बाद गाँव आने का सोचा तो लगा की खाली तो नहीं बैठ सकता।"

वो आगे बताते हैं, "तभी मुझे पता चला की तरुण चेतना संस्था ऊसर सुधार पर काम कर रही है, उन्हीं लोगों ने बताया की कैसे हम अपने खेत को उपजाऊ बना सकते हैं।"

प्रतापगढ़ में कृषि क्षेत्र में काम करने वाली गैर सरकारी संस्था अब तक ज़िले में सौ एकड़ से भी अधिक ऊसर भूमि को उपजाऊ बना चुकी है। तरुण चेतना के समन्यवक मोहम्मद शमीम बताते हैं, "प्रतापगढ़ ज़िले बहुत ज़मीन अनुपजाऊ ऊसर पड़ी है, जिसका कोई प्रयोग ही नहीं हो पा रहा था, लेकिन किसानों ने अपनी मेहनत और संस्था के प्रयास से आज उस भूमि को उपजाऊ बना लिया है।"

ऊसर भूमि को उपजाऊ बनाने की प्रक्रिया काफ़ी लंबी होती है, सबसे पहले खेत की गहरी जुताई की जाती है। इसके बाद खेत को समतल करने के बाद उसमें पानी भर दिया जाता है, जिससे उसमें नमी बनी रहे।

अजब नारायण बताते हैं, "दस बीघा खेत को उपजाऊ बनाने में बहुत मेहनत लगी, संस्था के सहयोग से समर्सिबल लग गया था, लेकिन वो भी खेत से चोरी हो गया, तब डीजल इंजन लगाना पड़ा, खेत में पानी भरने के बाद रात में रखवाली भी करनी पड़ती थी।" अजब नारायण से प्रेरणा लेकर अब दूसरे किसान भी ऊसर जमीन को उपजाऊ बनाने में लग गए हैं।

This article has been made possible because of financial support from Independent and Public-Spirited Media Foundation (www.ipsmf.org).


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