सरकार गेहूं आयात पर 25 प्रतिशत तक लगा सकती है आयात कर

सरकार गेहूं आयात पर 25 प्रतिशत तक लगा सकती है आयात करगेहूं के बोरों की सिलाई करता किसान।

लखनऊ। देश में गेहूं के व्यापक उत्पादन की संभावना को देखते हुए सरकार फिर से इसके आयात पर 25 प्रतिशत तक कर लगाने की तैयारी में है। इसे इसी महीने के मध्य से लागू किया जा सकता है। इससे पहले मांग और आपूर्ति में संतुलन बनाए रखने के लिए 8 दिसंबर 2016 को गेहूं पर लागू 10 प्रतिशत का आयात शुल्क हटा लिया गया था। बिजनेस स्टैंडर्ड के अनुसार इस बार भारत में गेहूं की बंपर पैदावार की उम्मीद है जिससे कीमतों में गिरावट होगी। कीमतें बहुत नीचे ना जाएं और किसानों को उनके उत्पाद की अच्छी कीमत मिले इसके लिए आयात शुल्क फिर से लगाने का सरकार विचार कर रही है।

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मॉनसून के 2016 में बेहतर प्रदर्शन के चलते खरीफ फसलों की अच्छी पैदावार हुई और अब गेहूं सहित रबी फसलों का भी बड़े पैमाने पर उत्पादन की संभावना है। वर्ष 2016-17 में रिकॉर्ड 96.64 मिलियन (966.4 लाख) टन गेहूं उत्पादन का अनुमान है।

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इन संभावनाओं के बीच सरकार ने विपणन वर्ष 2017-18 में 33 मिलियन (330 लाख) टन गेहूं खरीद का लक्ष्य तय किया है। ताकि किसानों को उनकी उपज की अच्छी कीमत मिल सके, इसके लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ाने की भी तैयारी है। आखिर में आपको यह भी बता दें कि पंजाब से लेकर उत्तर और मध्य प्रदेश तक गेहूं की फसल धीरे-धीरे परिपक्व होने को है। इस बीच गेहूं उत्पादक राज्यों में 15 मार्च तक मौसम मुख्य रूप से साफ और शुष्क रहने की संभावना है, हालांकि उत्तर-पश्चिमी हवाएँ बीच-बीच में रफ्तार पकड़ सकती हैं।

हरित क्रांति का कैसा जश्न?

एक तरफ जहां हम हरित क्रांति के 50वें साल का जश्न माना रहे हैं, वहीं इस साल 50 साल टन से अधिक गेहूं आयात करने की स्थिति में पहुंच गए हैं। सरकारी गोदामों में गेहूं का भंडार पिछले एक दशक के निम्नतम स्तर पर आ गया है। इस साल एक जनवरी को सरकारी गोदामों में 137.47 लाख टन गेहूं बचा है, जबकि पिछले साल इस समय गेहूं भंडार 240 लाख टन था। देश में गेहूं भंडार एक जनवरी के लिए तय 138 लाख टन की बफर स्टॉक सीमा से भी नीचे आ गया है।

यही वजह है कि इस साल भारत में पिछले एक दशक का सर्वाधिक गेहूं आयात होने जा रहा है। खाद्यान्न के मामले में देश को आत्मनिर्भर बनाने वाले हरित क्रांति का जश्न मनाने के लिए यह कोई आदर्श स्थि‍ति नहीं है। गेहूं आयात को बढ़ावा देने का यह मामला दिखाता है कि कैसे हम खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भर होने के बाद अब आयात निर्भरता की ओर मुड़ रहे हैं। इससे भी गंभीर बात यह है कि आयात निर्भरता की कीमत उन किसानों को चुकानी पड़ सकती है, जिनकी लगन और मेहनत ने देश में हरित क्रांति ला दी थी।

किसानों पर दोहरी मार

दरअसल, हरित क्रांति इसलिए संभव हो पाई थी, क्योंकि उन्नत खाद, बीज और तकनीक के साथ-साथ किसानों को सरकारी खरीद के जरिये फसल का उचित दाम दिलाने का भरोसा दिया गया था। सस्ता आयात किसानों के इस भरोसे पर चोट करता है। आयात के जरिये सरकार भले ही किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य दिलवाने की जिम्मेदारी से बच जाए, लेकिन किसानों पर दोहरी मार पड़ती है। एक तरफ सरकारी खरीद कम होती जबकि दूसरी तरफ बाजार में उपज के दाम गिर जाते हैं। अगले कुछ महीनों में ऐसा ही होने जा रहा है। कृषि को आयात के चंगुल में फंसाने की यह एक सोची-समझी रणनीति है, जिसके संकेत दो साल पहले दिखाई देने लगे थे।

वर्ष 2014 में केंद्र की सत्ता संभालते ही एनडीए सरकार ने राज्यों पर दबाव बनाना शुरू कर दिया था कि वे न्यूनतम समर्थन मूल्य से अधिक भाव यानी बोनस पर गेहूं की खरीद न करें। किसानों को इस प्रकार बोनस देकर ही मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ ने कृषि उत्पादन में लंबी छलांग लगाई है। लेकिन पिछले दो-तीन साल से गेहूं की सरकारी खरीद का हतोत्साहित किया गया। जिसका नतीजा सबके सामने है। सरकारी गोदामों में बफर स्टॉक की सीमा से भी कम गेहूं बचा है। ऐसे में आयात के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा। कुल मिलाकर एक सोची-समझी रणनीति के तहत पहले देश में अनाज की कमी पैदा की गई। और फिर सस्ते आयात के लिए दरवाजे खोल दिये गए।

कृषि आयात मतलब खेती की आउटसोर्सिंग

देखा जाए तो गेहूं जैसी वस्तुओं का आयात खेती की आउटसोर्सिंग की तरह है। स्वामीनाथन खाद्य आयात को बेरोजगारी के आयात की संज्ञा दे चुके हैं। लेकिन यह किसानों की आजीविका के साथ-साथ हमारी खाद्य सुरक्षा और संप्रभुता से जुड़ा मुद्दा भी है। वर्ष 2008-09 में देश के कुल आयात में कृषि आयात की हिस्सेदारी 2.09 फीसदी थी, तब हम सालाना करीब 29 हजार करोड़ रुपए का कृषि आयात करते थे। लेकिन वर्ष 2014-15 में देश के कुल आयात में कृषि आयात की हिस्सेदारी बढ़कर 4.22 फीसदी तक पहुंच गई है। अब हम सालाना 1.15 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा मूल्य का कृषि आयात करते हैं। यह पैसा कृषि संकट से जूझ रहे किसानों की जेब में जा सकता था। पांच-छह साल के अंदर हम कृषि आयात पर चार गुना ज्यादा रुपया खर्च करने लगे है। जब देश में ‘मेक इन इंडिया’ जैसी मुहिम छिड़ी है, तब कृषि आयात तेजी से बढ़ रहा है।

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आयात-निर्यात नीतियों के दुष्चक्र में फंसी कृषि को चीनी के उदाहरण से भी समझा जा सकता है। इंडियन शुगर मिल्स एसोसिएशन (इस्मा) के महानिदेशक अबिनाश वर्मा बताते हैं कि पिछले छह वर्षों के दौरान देश में घरेलू खपत से अधि‍क चीनी उत्पादन हुआ। लेकिन इसी दौरान वर्ष 2012-14 में कुल 7.75 लाख टन चीनी का आयात भी किया गया। इसका नतीजा यह हुआ कि साल 2015-16 में चीनी की कीमतें छह साल के निम्नतम स्तर पर आ गईं। इससे चीनी मिलों का घाटा बढ़ा तो गन्ना किसानों का बकाया भुगतान 22 हजार करोड़ रुपये तक पहुंच गया।

आज भी यूपी के गन्ना किसान अपने बकाया भुगतान के लिए धरने-प्रदर्शन पर उतारू हैं। वर्मा का कहना है कि जिन वर्षों में हम चीनी का सरप्लस उत्पादन था और हम चीनी निर्यात कर रहे थे, तब हमें इसके आयात से बचना चाहिए था। गन्ना किसानों और चीनी उद्योग को इसका भारी नुकसान उठाना पड़ा। गौरतलब है कि इस साल चीनी पर भी आयात शुल्क में कटौती या इसे समाप्त किये जाने की अटकलें लगाई जा रही हैं।

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