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डिजिटल दौर में आदिवासी ज्ञान की पाठशाला: जहाँ धनुर्विद्या सीखते हैं बच्चे

Gaon Connection | Jan 08, 2026, 18:49 IST
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डिजिटल दौर में जब बच्चों का बचपन स्क्रीन तक सिमटता जा रहा है, केरल के जंगलों में एक व्यक्ति उन्हें ज़मीन से जोड़ रहा है। के. गोविंदन, कुरुमा जनजाति से आने वाले धनुर्विद्या गुरु, बच्चों को धनुष-बाण शिकार के लिए नहीं, बल्कि संतुलन, धैर्य और प्रकृति से रिश्ते के लिए सिखाते हैं।
आदिवासी परंपरा से भविष्य की शिक्षा
आज के स्कूलों में बच्चे किताबों के बोझ, स्क्रीन की रोशनी और प्रतियोगिता की दौड़ में बड़े हो रहे हैं। उनका बचपन धीरे-धीरे कक्षाओं, मोबाइल और ऑनलाइन दुनिया में सिमटता जा रहा है। लेकिन केरल के कुछ स्कूलों और जंगलों के बीच एक अलग ही दृश्य देखने को मिलता है, जहाँ बच्चे धनुष-बाण चलाना सीख रहे हैं। किसी को चोट पहुँचाने के लिए नहीं, बल्कि उस अनुभव से जुड़े रहने के लिए जो कभी ज़मीन का हिस्सा था, जो आदिवासी जीवन की आत्मा रहा है।

केरल के वायनाड ज़िले के जंगलों में बसे नेल्लारचल (Nellarachal) गाँव में रहने वाले के. गोविंदन को जब विशाल पेड़ों के बीच तीर-कमान लिए चलते देखते हैं, तो पहली नज़र में ऐसा लगता है कि वे शिकार पर निकले हैं। लेकिन सच्चाई इससे बिल्कुल अलग है। वे शिकार नहीं, बल्कि एक परंपरा को बचाने निकले हैं।

गोविंदन का जन्म कुरुमा जनजाति में हुआ है। इस जनजाति में धनुष-बाण कभी जीवन का ज़रूरी हिस्सा हुआ करता था। हर घर में तीर-कमान मिल जाते थे, खुद के बचाव के लिए, जंगल में रहने के लिए। लेकिन समय बदला, शिकार रुका, जंगल सिमटे और तीर-कमान घरों के कोनों में पड़े रह गए।

धनुर्विद्या जो हिंसा नहीं, संतुलन सिखाती है
धनुर्विद्या जो हिंसा नहीं, संतुलन सिखाती है


गोविंदन को डर था कि कहीं उनके साथ ही यह हुनर भी न चला जाए। गोविंदन कहते हैं, “ये तीर-कमान हमें पारंपरिक तरीके से मिलते हैं और अक्सर मरने के बाद हमारे साथ ही चले जाते हैं। लेकिन अब दुनिया हमारी इस कला को स्वीकार कर रही है। मुझे प्रेरणा मिलती है कि मैं अपना ज्ञान लोगों के साथ बाँटूँ।”

यही सोच उन्हें बच्चों तक ले आई। उन्होंने तय किया कि वे इस कला को अगली पीढ़ी तक पहुँचाएंगे, सिर्फ अपनी जनजाति के बच्चों तक नहीं, बल्कि दूर-दूर से आने वाले बच्चों तक। आज उनके पास सीखने आने वाले बच्चों की कोई सीमा नहीं है। स्कूलों से, गाँवों से, शहरों से, बच्चे उनके पास आते हैं। वे धनुष चलाना सीखते हैं, तीर बनाना सीखते हैं, और उससे भी ज़्यादा, प्रकृति के साथ रिश्ता बनाना सीखते हैं।

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के. गोविंदन बाज़ार से तैयार धनुष नहीं खरीदते। वे खुद बाँस से धनुष और तीर बनाते हैं। यह प्रक्रिया अपने आप में एक शिक्षा है। बच्चे सीखते हैं कि चीज़ें खरीदने से पहले बनानी भी आती हैं। वे बाँस को पहचानते हैं, लकड़ी को समझते हैं, पेड़ों को काटते नहीं, बल्कि उनसे सीखते हैं।

जब स्कूलों से आगे जंगल बनी कक्षा
जब स्कूलों से आगे जंगल बनी कक्षा


मनोज, गाँव के एक युवक, बताते हैं, “मैंने सब कुछ सर से ही सीखा है। पिछले 12 वर्षों से सीख रहा हूँ। आज जो भी हूँ, उन्हीं की वजह से हूँ।” यह रिश्ता गुरु और शिष्य का नहीं, बल्कि पीढ़ियों को जोड़ने वाले पुल की तरह है।

कुरुमा समुदाय के लोग बताते हैं कि उनके यहाँ बच्चे बचपन से ही धनुष चलाना सीख लेते थे। पेड़ों की टहनियों से, छाल छीलकर, खेल-खेल में। यह कोई औपचारिक ट्रेनिंग नहीं होती थी, बल्कि जीवन का हिस्सा होती थी। लेकिन यह कला कभी हिंसा की शिक्षा नहीं देती। गोविंदन बच्चों को सिखाते हैं कि धनुष-बाण का मतलब शिकार नहीं, संतुलन है, नज़र और हाथ का संतुलन, धैर्य और एकाग्रता का संतुलन।

वे बच्चों को जंगल के पक्षियों का ख़याल रखना सिखाते हैं, उन्हें दाना देना सिखाते हैं। उनका मानना है कि जो व्यक्ति प्रकृति से प्रेम करता है, वही सच्चा धनुर्धर हो सकता है।

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के. गोविंदन को दिल्ली में उपराष्ट्रपति की मौजूदगी में धनुर्विद्या आचार्य की उपाधि से सम्मानित किया गया। उपराष्ट्रपति ने उन्हें “नमस्ते गोविंदन जी” कहकर संबोधित किया। उन्हें सिर्फ भारत का नहीं, बल्कि दुनिया का धनुर्विद्या आचार्य कहा गया। लेकिन गोविंदन के लिए सबसे बड़ा सम्मान तब होता है, जब कोई बच्चा पहली बार तीर चलाते समय अपने डर पर काबू पाता है, जब उसकी आँखों में आत्मविश्वास चमकता है।

के. गोविंदन की कहानी सिर्फ धनुष-बाण की नहीं है। यह सवाल हम सबसे पूछती है, क्या हमारे भीतर के. गोविंदन जैसी सोच है? क्या हमारे पास भी कुछ ऐसा बहुमूल्य है, ज्ञान, कला, परंपरा, जिसे बचाने के लिए हम किसी भी हद तक जा सकते हैं?

आज जब शिक्षा सिर्फ अंकों और डिग्रियों में सिमटती जा रही है, तब केरल के एक गाँव में गोविंदन बच्चों को ज़मीन से जुड़ा अनुभव दे रहे हैं, वह अनुभव जो उन्हें बेहतर इंसान बनाएगा, संवेदनशील बनाएगा। शायद यही कारण है कि विशेषज्ञ कहते हैं, ऐसे अनुभव हर स्कूल में होने चाहिए। ताकि आने वाली पीढ़ियाँ सिर्फ पढ़ी-लिखी नहीं, बल्कि ज़मीन से जुड़ी, प्रकृति से जुड़ी और इंसानियत से भरी हों।

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