बकरी के दूध से साबून बनाकर एक महिला की सोच ने बदली सैकड़ों ज़िंदगियाँ

Gaon Connection | Jan 30, 2026, 18:42 IST
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उत्तर प्रदेश के सोनभद्र ज़िले के मझगाँव में रहने वाली संजू कुशवाहा ने बकरी के दूध से साबुन बनाकर न सिर्फ़ एक नया उत्पाद खड़ा किया, बल्कि सैकड़ों ग्रामीण महिलाओं को रोज़गार और आत्मसम्मान भी दिया।

<p>ग्रामीण महिलाओं की आत्मनिर्भरता की कहानी।<br></p>

ज़िंदगी तब बदलती है, जब सोच बदलती है और कभी-कभी यह बदलाव किसी बड़े शहर की लैब में नहीं, बल्कि गाँव की कच्ची गलियों से शुरू होता है। जो बनता है एक बिज़नेस मॉडल। ऐसा ही एक शुरूआत एक छोटे से गाँव में हुई, जहाँ एक महिला ने बकरी के दूध से साबुन बनाना शुरू किया। यह सिर्फ़ एक प्रयोग नहीं था, यह सैकड़ों महिलाओं की ज़िंदगी की दिशा बदल देने वाला आंदोलन बन गया।



उत्तर प्रदेश के सोनभद्र ज़िले के मझगाँव में रहती हैं संजू कुशवाहा, जिन्होंने शुरू किया बकरी के दूध से बने साबून का स्टार्टअप। बजरंगबली स्वयं सहायता समूह की अध्यक्ष हैं, संजू, हमेशा से कुछ अलग करना चाहती थीं, लेकिन राह इतनी आसान नहीं थी। लेकिन आज ख़ुद के साथ ही अपने गाँव की महिलाओं की ज़िंदगी भी बदल रहीं हैं।



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संजू कुशवाहा कहती हैं, "किसी महिला का किसी मज़ाक उड़ा दिया या हँस दिया तो उसका मनोबल टूट जाता है। वो दबकर जहाँ थी वहीं रह जाती है। अगर जो दीदी हमारी रह जा रहीं हैं उनके लिए मैं संदेश देना चाहती हूँ, नहीं, समाज को मत देखिए, समाज आपको क्या कह रहा है, उसे भूल जाइए, मनोबल को अपने गिराना नहीं है उसे बढ़ाते रहिए, बढ़ाते रहिए लोग आपकी गुण की पूजा करेंगे।"



यहाँ गाँवों में महिलाएँ बरसों से बकरी पालन करती आ रहीं हैं, लेकिन जब जब दूध का उत्पादन बढ़ा तो संजु को लगा कि कुछ करना चाहिए, आजीविका मिशन के तहत संजु साबुन बनाने की ट्रेनिंग लेकर गाँव आईं, शुरुआत में लोग हँसे, बोले -‘साबुन भी कोई बकरी के दूध से बनाता है?’ लेकिन संजू ने न सवालों से डरीं, न जवाब देने बंद किए।



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संजू आगे कहती हैं, "अब काम करने का लोग इतना मज़ाक उड़ाते, लोग हँसते, अच्छा नहीं लगता, फिर घर आकर अपने बच्चों को देखती थी, अपनी दीदियों को देखती थी कि वो बेरोज़गार हैं, तो उन दीदियों का चेहरा देखकर, अपने परिवार का चेहरा देखकर फिर अंदर से हो जाता था कि नहीं हमको ये करना है, लोग हँस रहे हैं, हँसने दें।"



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आज संजू कुशवाहा का 'गोट मिल्क सोप' न सिर्फ़ सोनभद्र बल्कि देश के और इलाकों और विदेश तक जा रहा है। बिना केमिकल, बिना झूठे वादों… बस देसी, प्राकृतिक, और असरदार। उन्होंने साबित कर दिया कि रसोई से प्रयोगशाला तक और दूध से बाज़ार तक,अगर सोच में दम हो, तो रास्ता बन ही जाता है।



संजू ने अपने ज़िले की 300 से ज़्यादा महिलाओं को महिलाओं को इसकी ट्रेनिंग भी दी है। अब तो समूह की महिलाओं के घरों के पुरुष भी मार्केटिंग में उनका साथ देने लगे हैं। अब तो संजू अपने गाँव, अपने ज़िले में बदलाव की ब्रांड बन गईं हैं।



संजू की तरह ही दीनदयाल अंत्योदय योजना - राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत देश भर में महिलाओं को रोज़गार से जोड़ा जा रहा है। इस योजना के तहत 28 राज्यों और 6 केंद्र शासित प्रदेशों में 10.05 करोड़ ग्रामीण महिला परिवारों को 90.90 लाख से अधिक स्वयं सहायता समूह बनाए गए हैं।



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