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पंजाब का बेबे-बापू स्कूल: जब बुज़ुर्ग पहली बार क्लासरूम पहुँचे

Gaon Connection | Jan 14, 2026, 17:09 IST
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बचपन में पढ़ाई का मौका न मिलने वाले बुज़ुर्ग अब पंजाब के भटिंडा ज़िले के बेबे-बापू स्कूल में पहली बार क्लासरूम का अनुभव कर रहे हैं। जो लोग पूरी ज़िंदगी अपने बच्चों को पढ़ाने में लगे रहे, वे आज खुद अक्षरों से दोस्ती कर रहे हैं, अंगूठे से दस्तख़त तक का यह सफ़र आत्मसम्मान और उम्मीद की कहानी है।
सीखने की कोई उम्र नहीं होती, पंजाब के एक गाँव से आती उम्मीद।
कितना ख़ूबसूरत होता होगा वह लम्हा, जब कोई बुज़ुर्ग, जिसने बचपन में कभी स्कूल का दरवाज़ा नहीं देखा, जब ज़िंदगी के इस पड़ाव पर पहली बार क्लासरूम में कदम रखता है। वह सिर्फ़ एक कमरे में प्रवेश नहीं करता, बल्कि अपने भीतर की एक लंबी, कठिन और अनकही यात्रा पूरी करता है। उस यात्रा में छुपा होता है बचपन का अधूरापन, ज़िम्मेदारियों का बोझ, त्याग की कहानियाँ और एक धीमी-सी इच्छा, काश हमें भी पढ़ने का मौका मिला होता।

पंजाब के भटिंडा ज़िले में एक ऐसा ही स्कूल है, जहाँ बुज़ुर्ग अपनी इस अधूरी यात्रा को पूरा कर पा रहे हैं। यह स्कूल उन लोगों के लिए है, जिन्होंने पूरी ज़िंदगी अपने बच्चों को पढ़ाने, उन्हें आगे बढ़ाने और उनका भविष्य सँवारने में लगा दी, लेकिन खुद कभी अक्षरों से दोस्ती नहीं कर पाए।

यह कहानी है बेबे-बापू स्कूल की, एक ऐसी जगह, जहाँ उम्र कोई बाधा नहीं है, जहाँ झुकी हुई पीठें फिर से सीधी होकर तख्ती और किताब थामती हैं और जहाँ अक्षर सिर्फ़ पढ़े नहीं जाते, बल्कि आत्मसम्मान में बदल जाते हैं। अब यहाँ 65 साल की बलबीर कौर और 70 साल की जसपाल कौर अब अंगूठा नहीं लगातीं। अब उन्हें उनके बच्चे या पोते-पोतियाँ अख़बार पढ़कर नहीं सुनाते, वे खुद अख़बार पढ़ती हैं, खुद दस्तख़त करती हैं। ये सभी बुज़ुर्ग भटिंडा ज़िले के बल्लो गाँव के रहने वाले हैं, और उनकी आँखों में जो चमक है, वह किसी बच्चे की पहली क्लास से कम नहीं।

65 की उम्र में पहली किताब, यही से शुरू हुई बेबे–बापू स्कूल की प्रेरक यात्रा।
65 की उम्र में पहली किताब, यही से शुरू हुई बेबे–बापू स्कूल की प्रेरक यात्रा।


इस स्कूल में पढ़ाने वाली शिक्षक हैं राजविंदर सिंह। राजविंदर सिंह बताती हैं, "सीखने की कोई उम्र नहीं होती, कोई सीमा नहीं होती। मैं सिर्फ़ बुज़ुर्गों को नहीं सिखाती हूँ, उनसे खुद भी बहुत कुछ सीखती हूँ। धैर्य, सम्मान और संवेदनशीलता। क्योंकि बच्चों को तो डाँटकर भी पढ़ाया जा सकता है, लेकिन इन बुज़ुर्गों के साथ वैसा कोई तरीक़ा नहीं चल सकता।"

ये राजविंदर के लिए भी माँ-बाप की उम्र के हैं। शुरुआत में यह चुनौती कठिन लगी, लेकिन धीरे-धीरे यह रिश्ता भरोसे में बदल गया।

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बेबे–बापू स्कूल की शुरुआत के पीछे एक गहरी सोच और एक संवेदनशील दर्द छुपा है। इसे शुरू किया स्वर्गीय गुरबचन सिंह सेवा समिति ने। इस पहल के पीछे यह एहसास था कि जिन माँ–बाप ने अपने बच्चों को पढ़ा-लिखाकर अफ़सर बनाया, नेक इंसान बनाया, उन्हें खुद कभी पढ़ने का मौका नहीं मिला। वे अपने बच्चों की तरक़्क़ी में खुश रहे, लेकिन भीतर कहीं एक खालीपन रह गया।

पंजाब के बुज़ुर्गों की पढ़ाई के साथ जब अधूरा बचपन पूरा हुआ।
पंजाब के बुज़ुर्गों की पढ़ाई के साथ जब अधूरा बचपन पूरा हुआ।


समिति से जुड़े भूपिंदर सिंह कहते हैं, "मुझे यह अच्छा नहीं लगता था जब उनके माता-पिता अंगूठा लगाने के लिए पैड माँगते थे। मेरा सपना था कि उनके गाँव का कोई भी माँ-बाप अनपढ़ न रहे, कि वे भी अपने नाम लिख सकें, अपनी पहचान खुद बना सकें।"

जब राजविंदर सिंह ने पहली बार बुज़ुर्गों से स्कूल आने की बात की, तो ज़्यादातर का जवाब एक ही था- “अब पढ़कर क्या करेंगे?” यह सवाल सिर्फ़ व्यावहारिक नहीं था, बल्कि सालों की आदत और आत्म-विश्वास की कमी से पैदा हुआ था।

शुरुआत आसान नहीं रही। बुज़ुर्गों को इकट्ठा करना, उन्हें समझाना कि बहुत ज़्यादा नहीं तो कम से कम दस्तख़त करना सीख लें, अंगूठे से राहत मिल जाए, यह सब समय और धैर्य मांगता था। लेकिन फिर एक दिन दो लोग आए, फिर चार, फिर छह… और देखते-देखते यह कारवाँ बढ़ता चला गया।

आज इस स्कूल में सौ से ज़्यादा बुज़ुर्गों ने दाख़िला लिया है। कोई अपना नाम लिखना सीख रहा है, कोई गुरमुखी के अक्षर जोड़कर पढ़ने लगा है, तो कोई गुरबानी को खुद पढ़ पाने के सुख से भर उठा है। सर्दियों में जब कुछ दिनों के लिए स्कूल बंद हुआ, तब भी यह पढ़ाई रुकी नहीं।

अंगूठे से दस्तख़त तक,  यहीं से शुरू हुई बुज़ुर्गों की शिक्षा की नई शुरुआत।
अंगूठे से दस्तख़त तक, यहीं से शुरू हुई बुज़ुर्गों की शिक्षा की नई शुरुआत।


गली-नुक्कड़ों पर बुज़ुर्ग एक-दूसरे को बताते मिले, “मैंने दस्तख़त करना सीख लिया है”, “मैं अब पढ़ने लगी हूँ।” यह सिर्फ़ शिक्षा नहीं थी, यह आत्मसम्मान की वापसी थी।

बलबीर कौर बताती हैं, "अब मैं पाठ करने लगी हूँ, गुरबानी को समझने लगी हूँ और बच्चों की किताबों में भी बहुत कुछ पढ़ लेती हूँ।" यह बदलाव सिर्फ़ उनके लिए नहीं, उनके परिवार के लिए भी गर्व का कारण है। जिन हाथों ने कभी अंगूठा लगाया था, वही हाथ अब कलम थाम रहे हैं। जिन आँखों ने हमेशा दूसरों से पढ़कर सुना था, वही आँखें अब खुद पढ़ रही हैं।

बेबे-बापू स्कूल यह साबित करता है कि ज़िंदगी में बदलाव शुरू करने के लिए कोई उम्र तय नहीं होती। सीखने की इच्छा अगर ज़िंदा हो, तो अक्षर किसी भी उम्र में दोस्त बन सकते हैं। यह स्कूल सिर्फ़ पढ़ना–लिखना नहीं सिखा रहा, यह दुनिया भर के सीनियर सिटिज़न्स को एक संदेश दे रहा है कि आपने जो सपना कभी खुद के लिए छोड़ दिया था, उसे अब भी जिया जा सकता है।

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