बंद कमरे में नहीं, बाग में भी उगा सकते हैं मशरूम, जानिए उगाने की पूरी विधि
Divendra Singh | Jan 14, 2026, 14:52 IST
मशरूम की खेती को अब तक अंधेरे कमरे और रसायनों से जोड़कर देखा जाता रहा है, लेकिन छत्तीसगढ़ के महासमुंद ज़िले के किसान राजेंद्र कुमार साहू ने इस सोच को पूरी तरह बदल दिया है। उन्होंने आम के बाग में, खुले वातावरण में ऑयस्टर और पैडी स्ट्रॉ मशरूम उगाकर न सिर्फ़ रोज़ाना 10,000 रुपये तक की कमाई का रास्ता बनाया, बल्कि पराली जलाने जैसी गंभीर समस्या का भी समाधान पेश किया।
मशरूम की खेती का नाम आते ही ज़्यादातर लोगों के दिमाग़ में एक ही तस्वीर उभरती है, अंधेरा कमरा, बंद खिड़कियाँ, प्लास्टिक की थैलियाँ और तेज़ गंध वाले रसायन। बरसों से यह धारणा किसानों और आम लोगों के बीच इतनी गहरी बैठी है कि बहुत से लोग मशरूम को खेती नहीं, बल्कि किसी प्रयोगशाला की चीज़ मानते हैं। लेकिन एक किसान ने न सिर्फ़ इस सोच को चुनौती दी, बल्कि उसे पूरी तरह बदलकर रख दिया। उन्होंने यह साबित कर दिया कि मशरूम न तो अंधेरे कमरे का मोहताज है और न ही रसायनों का, अगर सही समझ, धैर्य और स्थानीय संसाधनों का इस्तेमाल किया जाए, तो मशरूम खुले बाग में भी उग सकता है, वह भी साल के ज़्यादातर महीनों में।
महासमुंद ज़िले की बसना तहसील के पटियापाली गाँव में रहने वाले 45 वर्षीय राजेंद्र कुमार साहू, आज ऑयस्टर और पैडी स्ट्रॉ मशरूम की खेती से रोज़ाना लगभग 10,000 रुपये तक की आमदनी कर रहे हैं। उनकी यह कमाई किसी बड़े शेड, पॉलीहाउस या भारी निवेश से नहीं आती, बल्कि आम के पेड़ों की छाया में, ज़मीन के करीब बनाए गए मशरूम बेड से निकलती है। यही नहीं, उनका यह मॉडल इलाके में पराली जलाने की समस्या को भी काफी हद तक कम कर रहा है, जो आज उत्तर और मध्य भारत की सबसे बड़ी पर्यावरणीय चुनौतियों में से एक है।
राजेंद्र कुमार साहू की कहानी किसी रातों-रात मिली सफलता की नहीं है। यह कहानी लगभग बीस साल की लगातार सीख, प्रयोग और धैर्य की कहानी है। राजेंद्र गाँव कनेक्शन से बताते हैं, "साल 2005 में उन्होंने पहली बार मशरूम की खेती के बारे में सोचना शुरू किया। उस समय उनके पास न कोई औपचारिक कृषि प्रशिक्षण था और न ही मशरूम पर कोई डिग्री।"
वे बारहवीं तक विज्ञान के छात्र रहे थे, उसके बाद उन्होंने संस्कृत, हिंदी, समाजशास्त्र, इतिहास और राजनीति विज्ञान जैसे विषयों में पढ़ाई की और कुल मिलाकर पाँच स्नातकोत्तर डिग्रियाँ हासिल कीं। लेकिन खेती के मामले में उनका सबसे बड़ा शिक्षक खेत, मौसम और खुद की गलतियाँ रहीं।
शुरुआती वर्षों में उन्होंने मशरूम को लेकर उपलब्ध किताबें, शोध लेख और दूसरे किसानों के अनुभव पढ़े। ज़्यादातर जगह एक ही बात लिखी थी, अंधेरा कमरा ज़रूरी है, हवा का आना-जाना नहीं होना चाहिए, और स्टरलाइजेशन के लिए फॉर्मेलिन या बाविस्टिन जैसे रसायनों का इस्तेमाल करना होगा। राजेंद्र ने इन तरीकों को आज़माया भी, लेकिन जल्दी ही उन्हें महसूस हुआ कि ये उपाय छोटे किसानों के लिए न तो सस्ते हैं और न ही व्यावहारिक। साथ ही, रसायनों पर निर्भरता उन्हें असहज करती थी। यहीं से उन्होंने अलग रास्ता तलाशना शुरू किया।
राजेंद्र बताते हैं, "प्रकृति खुद बहुत बड़ा शिक्षक है। जंगलों में मशरूम अंधेरे कमरों में नहीं उगते, वे पेड़ों की छाया में, नमी और हवा के संतुलन के साथ उगते हैं।" इसी ने उन्हें यह सोचने पर मजबूर किया कि अगर जंगल में मशरूम खुले में उग सकता है, तो खेत या बाग में क्यों नहीं? इसी सवाल से उनके नवाचार की शुरुआत हुई।
उन्होंने अपने बाग में आम के पेड़ों के नीचे ज़मीन को साफ़ किया और वहीं मशरूम के बेड लगाकर प्रयोग शुरू किए। धीरे-धीरे उन्होंने समझा कि मशरूम के लिए सबसे ज़रूरी चीज़ें हैं, उचित तापमान, नियंत्रित नमी, स्वच्छ सब्सट्रेट और ताज़ी हवा। अंधेरा और रसायन केवल सहायक उपकरण हैं, अनिवार्यता नहीं।
आज राजेंद्र साल के अलग-अलग मौसम में अलग मशरूम उगाते हैं। ठंड के मौसम में, यानी अक्टूबर के अंत से मार्च तक, वे ऑयस्टर मशरूम उगाते हैं, जबकि फरवरी से अक्टूबर तक पैडी स्ट्रॉ मशरूम की खेती करते हैं। दोनों ही किस्में वे खुले वातावरण में करते हैं। उनके अनुसार, मौसम के अनुसार मशरूम चुनना सफलता की सबसे बड़ी कुंजी है।
ऑयस्टर मशरूम की खेती में उनका अनुभव बताता है कि औसतन 30×60 फीट के क्षेत्र में महीने भर में 6 से 7 क्विंटल तक उत्पादन मिल जाता है। कभी-कभी यह इससे ज़्यादा भी हो जाता है, लेकिन वे औसत को ही आधार मानते हैं। पैडी स्ट्रॉ मशरूम के मामले में रोज़ाना लगभग 50 किलो उत्पादन होता है, जिसकी बाजार में क़ीमत ₹200 से ₹300 प्रति किलो तक मिल जाती है।
इस पूरी खेती की सबसे अहम बात है, कम लागत। ऑयस्टर मशरूम के एक बैग में लगभग 2 किलो सूखी पराली (पुआल कुट्टी) लगती है। स्पॉन, पराली और पॉलीथिन मिलाकर एक बैग की शुरुआती लागत लगभग ₹30 आती है। उत्पादन के दौरान पानी, निगरानी और दूसरे छोटे खर्च जोड़ने पर कुल लागत ₹50 प्रति बैग तक पहुँचती है। इसी बैग से 3 से 4 किलो मशरूम तैयार हो जाता है। होलसेल में ₹80–₹100 प्रति किलो के हिसाब से एक बैग से ₹240–₹250 की बिक्री हो जाती है। इस तरह एक बैग पर ₹190–₹200 तक का शुद्ध मुनाफ़ा बचता है।
स्टरलाइजेशन को लेकर भी राजेंद्र ने रसायनों का रास्ता छोड़ दिया है। वे पराली को पहले चूने के पानी में भिगोते हैं, फिर उसे धूप में नेट पर फैलाकर ऊपर से पॉलीथिन से ढक देते हैं। धूप और नमी के मेल से पराली का तापमान 60–70 डिग्री सेल्सियस तक पहुँच जाता है, जिससे हानिकारक जीवाणु नष्ट हो जाते हैं। यह तरीका सस्ता भी है और पर्यावरण के अनुकूल भी।
बेड़ तैयार करने की प्रक्रिया में वे पराली की परतें लगाते हैं, उनके बीच स्पॉन और पोषक तत्व डालते हैं, और फिर पूरे बेड को पारदर्शी पॉलीथिन से ढक देते हैं। लगभग एक हफ्ते में पूरा बेड माइसीलियम से ढक जाता है। इसके बाद वे कुछ घंटों के लिए पॉलीथिन हटाकर ताज़ी हवा देते हैं और फिर से ढक देते हैं। अगर नमी कम लगती है, तो पीने योग्य सामान्य पानी का हल्का छिड़काव किया जाता है, लेकिन सीधे पॉलीथिन हटाते ही नहीं, बल्कि तापमान सामान्य होने के बाद।
पैडी स्ट्रॉ मशरूम के लिए 32 से 38 डिग्री सेल्सियस तापमान सबसे उपयुक्त माना जाता है। गर्मियों में जब तापमान 40-45 डिग्री तक पहुँच जाता है, तो वे पॉलीथिन के ऊपर बार-बार पानी डालते हैं या स्प्रिंकलर चलाते हैं। इससे अंदर का तापमान नियंत्रित रहता है और नमी भी बनी रहती है। करीब 10–12 दिन में फ्रूटिंग शुरू हो जाती है, और 5–7 दिनों तक लगातार कटाई मिलती है। इसके बाद बची हुई पराली को वे खाद में बदल देते हैं।
राजेंद्र का यह मॉडल सिर्फ़ आमदनी तक सीमित नहीं है। वे पराली खरीदते नहीं, बल्कि आसपास के किसानों से इकट्ठा करते हैं। वे किसानों को समझाते हैं कि पराली जलाने से मिट्टी, हवा और सेहत को नुकसान होता है, जबकि वही पराली मशरूम उत्पादन का आधार बन सकती है। आज वे हर साल 400–500 एकड़ खेतों की पराली इकट्ठा कर लेते हैं। इससे न सिर्फ़ खेतों में आग लगने की घटनाएँ कम हुई हैं, बल्कि खेतों की मेड़ों पर लगे पेड़-पौधे भी सुरक्षित रहे हैं और इलाके में धीरे-धीरे कृषि-वन का दायरा बढ़ा है।
आर्थिक रूप से देखें तो राजेंद्र की कुल मासिक आमदनी लगभग 3 लाख रुपये तक पहुँच जाती है। सभी खर्च, मज़दूरी और निवेश निकालने के बाद औसतन 1 से 1.5 लाख रुपये का शुद्ध मुनाफ़ा बचता है। वे इसका एक हिस्सा फिर से खेती में लगाते हैं और बाकी से परिवार की ज़रूरतें पूरी करते हैं। इसके साथ ही वे आसपास के किसानों को मुफ़्त प्रशिक्षण भी देते हैं, ताकि दूसरे लोग भी इस मॉडल को अपनाकर कम लागत में सुरक्षित और स्थायी आमदनी कमा सकें।
राजेंद्र कुमार साहू ने साबित कर दिया कि खेती में नवाचार का मतलब हमेशा महंगी तकनीक नहीं होता। कभी-कभी समाधान खेत के पास ही मौजूद होता है, बस उसे देखने और समझने की ज़रूरत होती है। मशरूम की खेती को अंधेरे कमरों से निकालकर बागों तक ले आना न सिर्फ़ किसानों की आय बढ़ाने का रास्ता है, बल्कि यह पर्यावरण संरक्षण और पराली जलाने जैसी गंभीर समस्याओं का भी व्यावहारिक समाधान बन सकता है।
महासमुंद ज़िले की बसना तहसील के पटियापाली गाँव में रहने वाले 45 वर्षीय राजेंद्र कुमार साहू, आज ऑयस्टर और पैडी स्ट्रॉ मशरूम की खेती से रोज़ाना लगभग 10,000 रुपये तक की आमदनी कर रहे हैं। उनकी यह कमाई किसी बड़े शेड, पॉलीहाउस या भारी निवेश से नहीं आती, बल्कि आम के पेड़ों की छाया में, ज़मीन के करीब बनाए गए मशरूम बेड से निकलती है। यही नहीं, उनका यह मॉडल इलाके में पराली जलाने की समस्या को भी काफी हद तक कम कर रहा है, जो आज उत्तर और मध्य भारत की सबसे बड़ी पर्यावरणीय चुनौतियों में से एक है।
राजेंद्र कुमार साहू की कहानी किसी रातों-रात मिली सफलता की नहीं है। यह कहानी लगभग बीस साल की लगातार सीख, प्रयोग और धैर्य की कहानी है। राजेंद्र गाँव कनेक्शन से बताते हैं, "साल 2005 में उन्होंने पहली बार मशरूम की खेती के बारे में सोचना शुरू किया। उस समय उनके पास न कोई औपचारिक कृषि प्रशिक्षण था और न ही मशरूम पर कोई डिग्री।"
खेती, पर्यावरण और इनोवेशन: छत्तीसगढ़ के किसान ने बदली मशरूम की तस्वीर
वे बारहवीं तक विज्ञान के छात्र रहे थे, उसके बाद उन्होंने संस्कृत, हिंदी, समाजशास्त्र, इतिहास और राजनीति विज्ञान जैसे विषयों में पढ़ाई की और कुल मिलाकर पाँच स्नातकोत्तर डिग्रियाँ हासिल कीं। लेकिन खेती के मामले में उनका सबसे बड़ा शिक्षक खेत, मौसम और खुद की गलतियाँ रहीं।
शुरुआती वर्षों में उन्होंने मशरूम को लेकर उपलब्ध किताबें, शोध लेख और दूसरे किसानों के अनुभव पढ़े। ज़्यादातर जगह एक ही बात लिखी थी, अंधेरा कमरा ज़रूरी है, हवा का आना-जाना नहीं होना चाहिए, और स्टरलाइजेशन के लिए फॉर्मेलिन या बाविस्टिन जैसे रसायनों का इस्तेमाल करना होगा। राजेंद्र ने इन तरीकों को आज़माया भी, लेकिन जल्दी ही उन्हें महसूस हुआ कि ये उपाय छोटे किसानों के लिए न तो सस्ते हैं और न ही व्यावहारिक। साथ ही, रसायनों पर निर्भरता उन्हें असहज करती थी। यहीं से उन्होंने अलग रास्ता तलाशना शुरू किया।
राजेंद्र बताते हैं, "प्रकृति खुद बहुत बड़ा शिक्षक है। जंगलों में मशरूम अंधेरे कमरों में नहीं उगते, वे पेड़ों की छाया में, नमी और हवा के संतुलन के साथ उगते हैं।" इसी ने उन्हें यह सोचने पर मजबूर किया कि अगर जंगल में मशरूम खुले में उग सकता है, तो खेत या बाग में क्यों नहीं? इसी सवाल से उनके नवाचार की शुरुआत हुई।
उन्होंने अपने बाग में आम के पेड़ों के नीचे ज़मीन को साफ़ किया और वहीं मशरूम के बेड लगाकर प्रयोग शुरू किए। धीरे-धीरे उन्होंने समझा कि मशरूम के लिए सबसे ज़रूरी चीज़ें हैं, उचित तापमान, नियंत्रित नमी, स्वच्छ सब्सट्रेट और ताज़ी हवा। अंधेरा और रसायन केवल सहायक उपकरण हैं, अनिवार्यता नहीं।
आज राजेंद्र साल के अलग-अलग मौसम में अलग मशरूम उगाते हैं। ठंड के मौसम में, यानी अक्टूबर के अंत से मार्च तक, वे ऑयस्टर मशरूम उगाते हैं, जबकि फरवरी से अक्टूबर तक पैडी स्ट्रॉ मशरूम की खेती करते हैं। दोनों ही किस्में वे खुले वातावरण में करते हैं। उनके अनुसार, मौसम के अनुसार मशरूम चुनना सफलता की सबसे बड़ी कुंजी है।
ऑयस्टर मशरूम की खेती में उनका अनुभव बताता है कि औसतन 30×60 फीट के क्षेत्र में महीने भर में 6 से 7 क्विंटल तक उत्पादन मिल जाता है। कभी-कभी यह इससे ज़्यादा भी हो जाता है, लेकिन वे औसत को ही आधार मानते हैं। पैडी स्ट्रॉ मशरूम के मामले में रोज़ाना लगभग 50 किलो उत्पादन होता है, जिसकी बाजार में क़ीमत ₹200 से ₹300 प्रति किलो तक मिल जाती है।
खुले बाग में मशरूम, बिना रसायन: छत्तीसगढ़ के किसान ने बदली खेती की परिभाषा
इस पूरी खेती की सबसे अहम बात है, कम लागत। ऑयस्टर मशरूम के एक बैग में लगभग 2 किलो सूखी पराली (पुआल कुट्टी) लगती है। स्पॉन, पराली और पॉलीथिन मिलाकर एक बैग की शुरुआती लागत लगभग ₹30 आती है। उत्पादन के दौरान पानी, निगरानी और दूसरे छोटे खर्च जोड़ने पर कुल लागत ₹50 प्रति बैग तक पहुँचती है। इसी बैग से 3 से 4 किलो मशरूम तैयार हो जाता है। होलसेल में ₹80–₹100 प्रति किलो के हिसाब से एक बैग से ₹240–₹250 की बिक्री हो जाती है। इस तरह एक बैग पर ₹190–₹200 तक का शुद्ध मुनाफ़ा बचता है।
स्टरलाइजेशन को लेकर भी राजेंद्र ने रसायनों का रास्ता छोड़ दिया है। वे पराली को पहले चूने के पानी में भिगोते हैं, फिर उसे धूप में नेट पर फैलाकर ऊपर से पॉलीथिन से ढक देते हैं। धूप और नमी के मेल से पराली का तापमान 60–70 डिग्री सेल्सियस तक पहुँच जाता है, जिससे हानिकारक जीवाणु नष्ट हो जाते हैं। यह तरीका सस्ता भी है और पर्यावरण के अनुकूल भी।
बेड़ तैयार करने की प्रक्रिया में वे पराली की परतें लगाते हैं, उनके बीच स्पॉन और पोषक तत्व डालते हैं, और फिर पूरे बेड को पारदर्शी पॉलीथिन से ढक देते हैं। लगभग एक हफ्ते में पूरा बेड माइसीलियम से ढक जाता है। इसके बाद वे कुछ घंटों के लिए पॉलीथिन हटाकर ताज़ी हवा देते हैं और फिर से ढक देते हैं। अगर नमी कम लगती है, तो पीने योग्य सामान्य पानी का हल्का छिड़काव किया जाता है, लेकिन सीधे पॉलीथिन हटाते ही नहीं, बल्कि तापमान सामान्य होने के बाद।
पैडी स्ट्रॉ मशरूम के लिए 32 से 38 डिग्री सेल्सियस तापमान सबसे उपयुक्त माना जाता है। गर्मियों में जब तापमान 40-45 डिग्री तक पहुँच जाता है, तो वे पॉलीथिन के ऊपर बार-बार पानी डालते हैं या स्प्रिंकलर चलाते हैं। इससे अंदर का तापमान नियंत्रित रहता है और नमी भी बनी रहती है। करीब 10–12 दिन में फ्रूटिंग शुरू हो जाती है, और 5–7 दिनों तक लगातार कटाई मिलती है। इसके बाद बची हुई पराली को वे खाद में बदल देते हैं।
पराली से पैदावार तक: बाग में मशरूम उगाकर किसान ने रचा टिकाऊ खेती का मॉडल
राजेंद्र का यह मॉडल सिर्फ़ आमदनी तक सीमित नहीं है। वे पराली खरीदते नहीं, बल्कि आसपास के किसानों से इकट्ठा करते हैं। वे किसानों को समझाते हैं कि पराली जलाने से मिट्टी, हवा और सेहत को नुकसान होता है, जबकि वही पराली मशरूम उत्पादन का आधार बन सकती है। आज वे हर साल 400–500 एकड़ खेतों की पराली इकट्ठा कर लेते हैं। इससे न सिर्फ़ खेतों में आग लगने की घटनाएँ कम हुई हैं, बल्कि खेतों की मेड़ों पर लगे पेड़-पौधे भी सुरक्षित रहे हैं और इलाके में धीरे-धीरे कृषि-वन का दायरा बढ़ा है।
आर्थिक रूप से देखें तो राजेंद्र की कुल मासिक आमदनी लगभग 3 लाख रुपये तक पहुँच जाती है। सभी खर्च, मज़दूरी और निवेश निकालने के बाद औसतन 1 से 1.5 लाख रुपये का शुद्ध मुनाफ़ा बचता है। वे इसका एक हिस्सा फिर से खेती में लगाते हैं और बाकी से परिवार की ज़रूरतें पूरी करते हैं। इसके साथ ही वे आसपास के किसानों को मुफ़्त प्रशिक्षण भी देते हैं, ताकि दूसरे लोग भी इस मॉडल को अपनाकर कम लागत में सुरक्षित और स्थायी आमदनी कमा सकें।
राजेंद्र कुमार साहू ने साबित कर दिया कि खेती में नवाचार का मतलब हमेशा महंगी तकनीक नहीं होता। कभी-कभी समाधान खेत के पास ही मौजूद होता है, बस उसे देखने और समझने की ज़रूरत होती है। मशरूम की खेती को अंधेरे कमरों से निकालकर बागों तक ले आना न सिर्फ़ किसानों की आय बढ़ाने का रास्ता है, बल्कि यह पर्यावरण संरक्षण और पराली जलाने जैसी गंभीर समस्याओं का भी व्यावहारिक समाधान बन सकता है।