मेघालय के बंशैलांग मुखिम: लोक संगीत की टूटती परंपरा को बचाने वाले सुरों के जादूगर

Gaon Connection | Jan 21, 2026, 15:19 IST
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मेघालय के स्मिट गाँव में हर दिन लोक संगीत की धुनें पहाड़ों से बातें करती हैं। इस आवाज़ को ज़िंदा रखने की जिम्मेदारी उठाई है बंशैलांग मुखिम ने, जिन्होंने खासी लोक संगीत और भाषा को बचाने के लिए एक म्यूज़िक इंस्टीट्यूट शुरू किया।

<p>खासी विरासत को बचा रहे हैं बंशैलांग मुखिम।<br></p>

मेघालय के पहाड़ हर सुबह किसी अनसुनी धुन के साथ जागते हैं। हवा जब घाटियों से गुजरती है, तो ऐसा लगता है जैसे कोई पुराना गीत फिर से सांस ले रहा हो। स्मिट गाँव में संगीत सिर्फ़ सुना नहीं जाता, वह महसूस किया जाता है। लेकिन कुछ बरस पहले तक यही संगीत धीरे-धीरे ख़ामोश होने लगा था। नई पीढ़ी मोबाइल की धुनों में उलझ रही थी और लोक सुर पीछे छूटते जा रहे थे। उसी ख़ामोशी के बीच एक इंसान ने टूटती डोर को थाम लिया ताकि सुर फिर से गूँज सकें, ताकि पहचान बची रहे।



ये कहानी है मेघालय के पूर्व खासी ज़िले के स्मिट गाँव के बंशैलांग मुखिम की जो लोक संगीत को बचाने के लिए सिर्फ़ गाते नहीं, बल्कि उसे जीते हैं।



हर सुबह, युवाओं के बीच बैठकर दुईतारा के तारों को छेड़ते हुए बंशैलांग मुखिम अभ्यास करते हैं। यह कोई साधारण रियाज़ नहीं है। यह एक संस्कृति को ज़िंदा रखने की कोशिश है। उन्होंने खासी लोक संगीत की विरासत को अगली पीढ़ी तक पहुँचाने के लिए स्मिट म्यूज़िक इंस्टीट्यूट की नींव रखी। एक ऐसा स्थान, जहाँ सुरों के साथ आत्मा को भी प्रशिक्षण मिलता है।



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बंशैलांग कहते हैं, "मैं लोक संगीत में बदलाव नहीं, बल्कि उसकी उड़ान चाहता हूँ। मैं चाहता हूँ कि हमारी धुनें नई ऊँचाइयों तक जाएँ। अगर दुनिया के दूसरे समुदाय अपने संगीत को आगे ले जा सकते हैं, तो हम क्यों नहीं? यही सवाल मुझे हर दिन आगे बढ़ाता है।"



उनका संगीत सफर बचपन से ही शुरू हो गया था। घर में मां खासी भाषा की शिक्षिका और गीतकार थीं। इसलिए बचपन से ही उनके आसपास किताबों के शब्दों से ज़्यादा सुरों की गूँज थी। लोकगीतों की धुनें, पारंपरिक वाद्य यंत्रों की आवाज़ और भाषा की मिठास ने उनके भीतर एक रिश्ता बना दिया, मिट्टी से, परंपरा से, पहचान से।



इसी लगाव ने उन्हें Martin Luther Christian University (MLCU), शिलांग तक पहुँचाया, जहाँ उन्होंने संगीत में मास्टर्स की पढ़ाई पूरी की और विशेष रूप से लोक संगीत व पारंपरिक वाद्य यंत्रों पर शोध किया। लेकिन डिग्री उनके लिए मंज़िल नहीं थी, बल्कि जिम्मेदारी थी।



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बंशैलांग कहते हैं, "जब किसी की भाषा धीरे-धीरे उसके हाथों से फिसलने लगती है, जब अपने ही बच्चे अपनी मातृभाषा बोलने में झिझकने लगते हैं, तो वह दर्द शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता। यही दर्द उन्हें भीतर से झकझोरता रहा।" उन्होंने ठान लिया कि खासी भाषा और संगीत को किताबों में नहीं, लोगों की सांसों में ज़िंदा रखना है।



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आज उनके साथ कई युवा जुड़ चुके हैं। वे सीख रहे हैं, गा रहे हैं, बजा रहे हैं और सबसे अहम बात अपनी जड़ों पर गर्व करना सीख रहे हैं।



बंशैलांग युवाओं को खासी जनजाति का पारंपरिक वाद्य यंत्र दुईतारा भी सिखाते हैं। यह सिर्फ़ एक इंस्ट्रूमेंट नहीं, बल्कि सदियों पुरानी कहानी है। इसे बजाने के लिए जिस एलेक्ट्रम का इस्तेमाल होता है, उसे खासी भाषा में थैम्लोंग कहा जाता है और इसके तारों को येसाइमुक। हर तार में इतिहास की थरथराहट छुपी है।



उनके योगदान को पहचान भी मिली। North East Zone Cultural Centre (NEZCC) ने उन्हें Young Talented Artist Award से सम्मानित किया। लेकिन बंशैलांग के लिए सबसे बड़ा सम्मान तब होता है, जब कोई बच्चा पहली बार लोक गीत गाते हुए मुस्कुराता है।



वे कहते हैं, "संगीत हमारी पहचान है। यह बताता है कि हम कहाँ से आए हैं, हम कौन हैं और किस मिट्टी से बने हैं। संगीत के ज़रिए ही हम अपनी बोलियों, परंपराओं और रीति-रिवाज़ों को अगली पीढ़ी तक पहुँचाते हैं। यह किसी भी समुदाय की आत्मा होती है।"



उनका सपना है कि उनके शिष्य उनसे भी आगे जाएँ] देश-विदेश में खासी संस्कृति का परचम लहराएँ और यह साबित करें कि लोक संगीत सिर्फ़ अतीत नहीं, भविष्य भी है। स्मिट गाँव की यह कहानी सिर्फ़ सुरों की कहानी नहीं है। यह अपनी पहचान बचाने की जंग है। यह उस पीढ़ी की लड़ाई है, जो जड़ों को थामकर आसमान छूना चाहती है।



शायद यही सबसे बड़ी सीख है कि हमारी जड़ें हमें बाँधती नहीं, बल्कि उड़ान देती हैं और जब कोई एक इंसान सुरों के साथ समाज को जगाने निकलता है तो पहाड़ भी सुनने लगते हैं।



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