जब स्वाद बचाने निकली एक महिला, मेघालय का Mei-Ramew Café
Gaon Connection | Jan 09, 2026, 15:48 IST
शहरों और पैकेज्ड फूड के बढ़ते असर के बीच, मेघालय के रिभोई ज़िले के एक छोटे से गाँव में Plantina Mujai ने अपने समुदाय के पारंपरिक स्वादों को बचाने की ठानी। खेतों से घिरे Mei-Ramew Café में खासी जनजाति का खाना सिर्फ़ परोसा नहीं जाता, बल्कि उसकी कहानी सुनाई जाती है।
शहरों में रहने वाले बहुत से लोग अक्सर कहते हैं-“यार, अपने गाँव की वो डिश याद आती है… दादी के हाथ का वो स्वाद अब कहीं नहीं मिलता।”
कभी-कभी यह रिश्ता बना रह पाता है, लेकिन ज़्यादातर बार वह सिर्फ़ एक याद बनकर रह जाता है। समय के साथ स्वाद बदल जाते हैं, रेसिपियाँ छूट जाती हैं और खाने के साथ जुड़ी कहानियाँ भी धुंधली पड़ने लगती हैं।
लेकिन यह कहानी सिर्फ़ शहरों तक सीमित नहीं है। आज गाँवों में भी वही हालात हैं। शहरों और दुनिया भर के नए-नए व्यंजन गाँवों तक पहुँच चुके हैं। इंस्टेंट नूडल्स, पैकेज्ड फूड, बाहर के स्वाद, सब कुछ आसानी से मिल रहा है। ऐसे में एक डर लगातार बना रहता है, कहीं ऐसा न हो कि हमारे अपने गाँवों की पारंपरिक डिशेज़, हमारी देसी रेसिपियाँ, धीरे-धीरे विलुप्त हो जाएँ।
भारत में शायद ही कोई ऐसा इंसान होगा, जिसे अपने बचपन के खाने का दर्द न हो। वो व्यंजन, जो दादी-नानी बनाती थीं। वो स्वाद, जो सिर्फ़ पेट नहीं भरता था, बल्कि अपनापन देता था। असल में वे व्यंजन सिर्फ़ खाना नहीं थे, वे हमारी संस्कृति थीं, हमारी कहानियाँ थीं, पीढ़ियों से चली आ रही स्मृतियाँ थीं।
अगर ये स्वाद खो गए, तो हम अपनी जड़ों से भी कुछ खो देंगे। लेकिन मेघालय में शुरू हुई एक छोटी, लेकिन अहम पहल।
मेघालय के रिभोई ज़िले के क्वेन्ग गाँव में रहने वाली प्लांटिना मुजाई (Plantina Mujai) ने इसी दर्द को गहराई से महसूस किया। लेकिन उन्होंने सिर्फ़ अफ़सोस नहीं कियाए उन्होंने कुछ करने का फैसला लिया। यहीं से जन्म हुआ Mei-Ramew Café का।
Mei-Ramew सिर्फ़ एक रेस्टोरेंट या कैफे नहीं है। यह एक कोशिश है, खासी समुदाय के पारंपरिक खाने को ज़िंदा रखने की, आने वाली पीढ़ी को अपने स्वाद से जोड़ने की और गाँव को उसकी रसोई से फिर से पहचान दिलाने की।
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खेतों से घिरा हुआ यह कैफे बांस से बनाया गया है, सादा, प्राकृतिक और ज़मीन से जुड़ा। यहाँ परोसा जाता है खासी जनजाति का पारंपरिक खाना। ऐसा खाना, जो पीढ़ियों से जंगल, खेत और मौसम के साथ जुड़ा रहा है।
प्लांटिना खुद कैफे के पास कई सब्ज़ियाँ उगाती हैं। कई बार वे आसपास के खेतों से ताज़ा सामग्री लेकर आती हैं। उनका मानना है कि खाना तभी सच्चा होता है, जब उसकी जड़ें आसपास की मिट्टी में हों।
Mei-Ramew का मतलब ही है- “माँ धरती”। और यही भावना इस कैफे की आत्मा है।
Mei-Ramew शुरू करने से पहले प्लांटिना का जीवन बहुत साधारण था। कभी घर का काम, कभी खेतों में मेहनत। लेकिन उनके मन में एक सवाल हमेशा चलता रहता था—“मैं अपना कुछ कैसे शुरू करूँ?” उन्होंने जोखिम उठाया। एक छोटे से कैफे से शुरुआत की। आज यह कैफे सिर्फ़ उनका नहीं रहा, यह पूरे गाँव का बन गया है।
प्लांटिना बताती हैं, “हमारा पूरा परिवार यहाँ काम करता है और हमने कुछ गाँव वालों को भी रोज़गार दिया है। मेरे काम का हमारे समुदाय पर सकारात्मक असर पड़ा है। अब गाँव के लोग सब्ज़ियाँ बाज़ार में बेचने की बजाय यहीं मेरे कैफे में बेच देते हैं, क्योंकि बाज़ार बहुत दूर है। मुझे भी ख़ुशी होती है कि सब्ज़ियाँ, चावल, मीट, अब मुझे बाहर से नहीं खरीदने पड़ते।”
यह सिर्फ़ एक व्यवसाय नहीं है, यह स्थानीय अर्थव्यवस्था को मज़बूत करने का तरीका भी है।
Mei-Ramew Café यह साबित करता है कि अगर हम अपने खान-पान को सहेज लें, तो संस्कृति अपने आप बचने लगती है। यह कैफे बच्चों को सिखाता है कि उनका खाना सिर्फ़ पुराना नहीं, बल्कि कीमती है। यह पर्यटकों को बताता है कि मेघालय की असली पहचान उसके जंगलों के साथ-साथ उसकी रसोई में भी बसती है।
आप भी ज़रा रुककर सोचिए, आपके गाँव की कौन-सी डिश अब शायद कहीं नहीं बनती? कौन-सा स्वाद है, जो सिर्फ़ यादों में रह गया? शायद आज अपने घर की रसोई में कुछ ऐसा बनाइए, जिसकी खुशबू ज़मीन से जुड़ी हो, जिसका ज़ायका आपको वापस ले जाए, आपके गाँव तक। क्योंकि कभी-कभी, खाने के ज़रिये ही सबसे मज़बूत ‘गाँव कनेक्शन’ बनता है।
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कभी-कभी यह रिश्ता बना रह पाता है, लेकिन ज़्यादातर बार वह सिर्फ़ एक याद बनकर रह जाता है। समय के साथ स्वाद बदल जाते हैं, रेसिपियाँ छूट जाती हैं और खाने के साथ जुड़ी कहानियाँ भी धुंधली पड़ने लगती हैं।
लेकिन यह कहानी सिर्फ़ शहरों तक सीमित नहीं है। आज गाँवों में भी वही हालात हैं। शहरों और दुनिया भर के नए-नए व्यंजन गाँवों तक पहुँच चुके हैं। इंस्टेंट नूडल्स, पैकेज्ड फूड, बाहर के स्वाद, सब कुछ आसानी से मिल रहा है। ऐसे में एक डर लगातार बना रहता है, कहीं ऐसा न हो कि हमारे अपने गाँवों की पारंपरिक डिशेज़, हमारी देसी रेसिपियाँ, धीरे-धीरे विलुप्त हो जाएँ।
भारत में शायद ही कोई ऐसा इंसान होगा, जिसे अपने बचपन के खाने का दर्द न हो। वो व्यंजन, जो दादी-नानी बनाती थीं। वो स्वाद, जो सिर्फ़ पेट नहीं भरता था, बल्कि अपनापन देता था। असल में वे व्यंजन सिर्फ़ खाना नहीं थे, वे हमारी संस्कृति थीं, हमारी कहानियाँ थीं, पीढ़ियों से चली आ रही स्मृतियाँ थीं।
अगर ये स्वाद खो गए, तो हम अपनी जड़ों से भी कुछ खो देंगे। लेकिन मेघालय में शुरू हुई एक छोटी, लेकिन अहम पहल।
पैकेज्ड फूड के दौर में देसी स्वाद की जंग
मेघालय के रिभोई ज़िले के क्वेन्ग गाँव में रहने वाली प्लांटिना मुजाई (Plantina Mujai) ने इसी दर्द को गहराई से महसूस किया। लेकिन उन्होंने सिर्फ़ अफ़सोस नहीं कियाए उन्होंने कुछ करने का फैसला लिया। यहीं से जन्म हुआ Mei-Ramew Café का।
Mei-Ramew सिर्फ़ एक रेस्टोरेंट या कैफे नहीं है। यह एक कोशिश है, खासी समुदाय के पारंपरिक खाने को ज़िंदा रखने की, आने वाली पीढ़ी को अपने स्वाद से जोड़ने की और गाँव को उसकी रसोई से फिर से पहचान दिलाने की।
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खेतों से घिरा हुआ यह कैफे बांस से बनाया गया है, सादा, प्राकृतिक और ज़मीन से जुड़ा। यहाँ परोसा जाता है खासी जनजाति का पारंपरिक खाना। ऐसा खाना, जो पीढ़ियों से जंगल, खेत और मौसम के साथ जुड़ा रहा है।
प्लांटिना खुद कैफे के पास कई सब्ज़ियाँ उगाती हैं। कई बार वे आसपास के खेतों से ताज़ा सामग्री लेकर आती हैं। उनका मानना है कि खाना तभी सच्चा होता है, जब उसकी जड़ें आसपास की मिट्टी में हों।
Mei-Ramew का मतलब ही है- “माँ धरती”। और यही भावना इस कैफे की आत्मा है।
घर से खेत तक, खेत से कैफे तक
जब एक गाँव ने अपने स्वाद को विलुप्त होने से बचा लिया
प्लांटिना बताती हैं, “हमारा पूरा परिवार यहाँ काम करता है और हमने कुछ गाँव वालों को भी रोज़गार दिया है। मेरे काम का हमारे समुदाय पर सकारात्मक असर पड़ा है। अब गाँव के लोग सब्ज़ियाँ बाज़ार में बेचने की बजाय यहीं मेरे कैफे में बेच देते हैं, क्योंकि बाज़ार बहुत दूर है। मुझे भी ख़ुशी होती है कि सब्ज़ियाँ, चावल, मीट, अब मुझे बाहर से नहीं खरीदने पड़ते।”
यह सिर्फ़ एक व्यवसाय नहीं है, यह स्थानीय अर्थव्यवस्था को मज़बूत करने का तरीका भी है।
खाने के ज़रिये जुड़ता गाँव
आप भी ज़रा रुककर सोचिए, आपके गाँव की कौन-सी डिश अब शायद कहीं नहीं बनती? कौन-सा स्वाद है, जो सिर्फ़ यादों में रह गया? शायद आज अपने घर की रसोई में कुछ ऐसा बनाइए, जिसकी खुशबू ज़मीन से जुड़ी हो, जिसका ज़ायका आपको वापस ले जाए, आपके गाँव तक। क्योंकि कभी-कभी, खाने के ज़रिये ही सबसे मज़बूत ‘गाँव कनेक्शन’ बनता है।
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