राकेश खत्री; जिन्होंने गौरैया के लिए बनाएं हैं 73 हज़ार से ज़्यादा घोंसले
Gaon Connection | Mar 20, 2025, 15:42 IST
राकेश खत्री; जिन्हें लोग Nest Man of India के नाम से जानते हैं; उन्होंने देश भर में 7,30,000 से ज़्यादा घोंसले बना दिए हैं, जिनमें गौरैया रहने लगीं हैं।
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याद है जब घर का आँगन चिड़ियों के चहचहाहट से गुलज़ार रहा करता था, लेकिन ऐसा क्या हुआ कि हमारी नन्ही दोस्त हम से रूठ गई, और हमसे दूर चली गई; और हमने उन्हें वापस बुलाने के लिए क्या किया?
लेकिन कुछ ऐसे भी लोग हैं जिन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी इन्हीं गौरया के नाम कर दी; ये हैं राकेश खत्री, जो एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म निर्माता थे, ने 2008 में अपनी पूरी जिंदगी को पर्यावरण संरक्षण के लिए समर्पित कर दिया। उनका विशेष ध्यान एक ऐसी समस्या पर था, जो उनके दिल के करीब थी - मानव आबादी के आसपास रहने वाली गौरैया चिड़ियों की घटती संख्या।
उन्होंने कई नवाचार और प्रयोग किए, जिनमें से सबसे सफल घोंसले का निर्माण था। उन्होंने बांस, कपड़ा, जूट, सूती जैसे प्राकृतिक सामग्रियों का उपयोग करके चिड़ियों के लिए घोंसले बनाए। यह प्रयास इतना सफल हुआ कि अब उनके द्वारा बनाए गए घोंसलों का अपनाने का दर 85% से अधिक है। गौरैया चिड़ियों की जो संख्या 2008 में तेजी से घट रही थी, वह अब एक सुरक्षित और स्थिर स्तर पर पहुँच गई है।
इसके अलावा, राकेश खत्री ने कई अन्य नवाचारी परियोजनाओं को भी संचालित किया है, जो विभिन्न कॉरपोरेट्स और संस्थानों के समर्थन से चलाई जा रही हैं। इन परियोजनाओं का मुख्य उद्देश्य पर्यावरण संरक्षण और सामुदायिक विकास गतिविधियों की सोच और कार्य को प्रेरित करना है।
राकेश खत्री इको रूट्स फाउंडेशन के संस्थापक हैं। वह इस संस्था के विजन और कार्यक्रमों के पीछे की मुख्य शक्ति हैं। उनकी कोशिशों ने संस्था को पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में महत्वपूर्ण स्थान दिलाया है। इको रूट्स फाउंडेशन पिछले 18 वर्षों से न केवल दिल्ली में बल्कि पूरे भारत में पर्यावरण संरक्षण की दिशा में काम कर रहा है।
इस फाउंडेशन के तहत 7,538 से अधिक "घोंसला निर्माण वर्कशॉप" आयोजित की जा चुकी हैं। इन वर्कशॉप के माध्यम से अब तक 7,30,000 घोंसले बनाए जा चुके हैं और 16,71,314 से अधिक लोग इन वर्कशॉप में शामिल हो चुके हैं।
राकेश खत्री बताते हैं, “हमारा बचपन आँगन में चिड़ियों की चहचहाहट से भरा रहता था, लेकिन आज के समय में न तो वह आँगन रहे और न ही चिड़ियों की चहक। हम सभी ने अपने घरों को इतना संकुचित कर लिया है कि चिड़ियों के लिए भी जगह नहीं बची।”
लेकिन राकेश खत्री ने इन चिड़ियों को वापस लाने के लिए घोंसले बनाना शुरू किया।
वो आगे कहते हैं, "पहला घोंसला जब मैंने लगाया, तो हर दिन बैठकर देखता था कि चिड़िया आती है या नहीं। जब चिड़िया आयी और वहाँ रहने लगी, तो मुझे बहुत अच्छा लगा कि चिड़िया को घर पसंद आ गया।"
यह भावना ही थी जिसने उन्हें आगे बढ़ने की प्रेरणा दी और अब वे हजारों घोंसले बना चुके हैं।
राकेश खत्री ने अपने घोंसला निर्माण की यात्रा के बारे में बताया कि 90 के दशक के अंत में उन्होंने नारियल के अंदर का हिस्सा निकालकर घोंसले बनाने की शुरुआत की थी। हालाँकि, वह सामग्री जल्दी सूख जाती थी, इसलिए उन्होंने बांस की डंडियों से घोंसले बनाना शुरू किया। आज, उनके द्वारा बनाए गए घोंसले प्राकृतिक सामग्रियों से बनते हैं, और उनका उद्देश्य एक लाख घोंसले बनाने का है।
अब तक, राकेश खत्री ने 17 राज्यों के 24 शहरों में एक लाख से अधिक बच्चों को घोंसले बनाना सिखाया है।
राकेश खत्री का यह प्रयास केवल स्थानीय नहीं है, बल्कि वैश्विक स्तर पर भी पहचाना गया है। उनकी संस्था इको रूट्स फाउंडेशन को 2014 में इंटरनेशनल ग्रीन ऐपल अवॉर्ड से नवाजा गया था और 2017 में उन्हें लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में दर्ज किया गया। अर्थ डे नेटवर्क ने भी उनके कार्य को सकारात्मक शुरुआत के रूप में सराहा है।
उन्होंने "नीर, नारी और विज्ञान" नामक एक जागरूकता अभियान भी शुरू किया है, जिसके तहत उन्होंने समाज में विज्ञान और प्रकृति के प्रति जागरूकता बढ़ाने का प्रयास किया है।
राकेश खत्री बताते हैं कि शुरुआत में उन्हें डीएनडी फ्लाईओवर पर घोंसला लगाने में काफी दिक्कत हुई। लेकिन जब चिड़िया सौ-पचास की संख्या में वहाँ आने लगीं, तब उन्हें लगा कि उनकी मेहनत सफल हो रही है। आज देशभर से उन्हें फोन आते हैं कि चिड़ियाँ वापस आ रही हैं, जो उनके लिए सबसे बड़ी खुशी की बात है।
दिल्ली सरकार ने गौरैया को राजधानी का राजपक्षी घोषित कर दिया है, जो इसे संरक्षित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। वहीं, राकेश खत्री का प्रयास है कि न केवल भारत, बल्कि विदेशों में भी जहाँ गौरैया की संख्या गिर रही है, वहाँ भी इन चिड़ियों को बचाया जाए।
राकेश खत्री का उद्देश्य स्पष्ट है—पर्यावरण संरक्षण के लिए सामुदायिक प्रयासों को बढ़ावा देना और आने वाली पीढ़ियों को इस दिशा में जागरूक करना।
उन्होंने साबित कर दिया है कि अगर सही नीयत और समर्पण हो, तो एक व्यक्ति भी पूरे समाज में परिवर्तन ला सकता है।
लेकिन कुछ ऐसे भी लोग हैं जिन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी इन्हीं गौरया के नाम कर दी; ये हैं राकेश खत्री, जो एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म निर्माता थे, ने 2008 में अपनी पूरी जिंदगी को पर्यावरण संरक्षण के लिए समर्पित कर दिया। उनका विशेष ध्यान एक ऐसी समस्या पर था, जो उनके दिल के करीब थी - मानव आबादी के आसपास रहने वाली गौरैया चिड़ियों की घटती संख्या।
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इसके अलावा, राकेश खत्री ने कई अन्य नवाचारी परियोजनाओं को भी संचालित किया है, जो विभिन्न कॉरपोरेट्स और संस्थानों के समर्थन से चलाई जा रही हैं। इन परियोजनाओं का मुख्य उद्देश्य पर्यावरण संरक्षण और सामुदायिक विकास गतिविधियों की सोच और कार्य को प्रेरित करना है।
इको रूट्स फाउंडेशन: एक अनोखी पहल
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बचपन की यादें बनी प्रेरणा
लेकिन राकेश खत्री ने इन चिड़ियों को वापस लाने के लिए घोंसले बनाना शुरू किया।
वो आगे कहते हैं, "पहला घोंसला जब मैंने लगाया, तो हर दिन बैठकर देखता था कि चिड़िया आती है या नहीं। जब चिड़िया आयी और वहाँ रहने लगी, तो मुझे बहुत अच्छा लगा कि चिड़िया को घर पसंद आ गया।"
यह भावना ही थी जिसने उन्हें आगे बढ़ने की प्रेरणा दी और अब वे हजारों घोंसले बना चुके हैं।
घोंसला बनाने की शुरूआत
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सामुदायिक और राष्ट्रीय स्तर पर पहचान
उन्होंने "नीर, नारी और विज्ञान" नामक एक जागरूकता अभियान भी शुरू किया है, जिसके तहत उन्होंने समाज में विज्ञान और प्रकृति के प्रति जागरूकता बढ़ाने का प्रयास किया है।
गौरैया बचाने का अनोखा प्रयास
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अभी और भी बहुत कुछ है करना
उन्होंने साबित कर दिया है कि अगर सही नीयत और समर्पण हो, तो एक व्यक्ति भी पूरे समाज में परिवर्तन ला सकता है।