मछली पालन का भविष्य: स्वदेशी प्रजातियाँ बन सकती हैं सबसे बड़ा सहारा
Gaon Connection | Jan 03, 2026, 11:28 IST
भारत की स्वदेशी मछली प्रजातियाँ सिर्फ भोजन नहीं, बल्कि जैव विविधता, स्थानीय संस्कृति और ग्रामीण आजीविका की रीढ़ हैं। कुछ गिनी-चुनी प्रजातियों पर निर्भरता बढ़ने से जोखिम भी बढ़ा है।
भारत की नदियाँ, झीलें, तालाब, दलदल, खारे पानी के क्षेत्र और समुद्री तट मिलकर एक ऐसा विशाल जलीय संसार बनाते हैं, जिसमें मछलियों की असाधारण विविधता पाई जाती है। हिमालय से निकलने वाली नदियों से लेकर हिंद महासागर के गहरे पानी तक फैले इन जल-तंत्रों में स्वदेशी यानी देशी मछली प्रजातियाँ सदियों से मौजूद हैं। ये केवल भोजन का स्रोत नहीं हैं, बल्कि भारत के पारिस्थितिक संतुलन, स्थानीय संस्कृतियों और ग्रामीण आजीविका का अहम आधार भी रही हैं।
आज जब मछली की मांग लगातार बढ़ रही है और जलवायु परिवर्तन जैसे पर्यावरणीय संकट गहराते जा रहे हैं, तब स्वदेशी मछली प्रजातियों का संरक्षण और संवर्धन पहले से कहीं ज़्यादा जरूरी हो गया है।
स्वदेशी मछली प्रजातियाँ वे होती हैं, जो किसी खास इलाके की जलवायु, पानी की गुणवत्ता और पर्यावरण के अनुसार लंबे समय में खुद को ढाल चुकी होती हैं। भारत में मीठे पानी, खारे पानी और समुद्री क्षेत्रों में ऐसी हज़ारों प्रजातियाँ पाई जाती हैं। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के अनुसार, देश में अब तक 2800 से अधिक स्वदेशी मछली और शंख प्रजातियों की पहचान की जा चुकी है। इनमें से सैकड़ों प्रजातियाँ नदियों और तालाबों में, कई खारे पानी में और बड़ी संख्या में समुद्री जल में पाई जाती हैं। यह जैव विविधता भारत को दुनिया के सबसे समृद्ध मत्स्य संसाधन वाले देशों में शामिल करती है।
पिछले कुछ दशकों में भारत ने मत्स्य पालन के क्षेत्र में तेज़ प्रगति की है। वैज्ञानिकों ने 80 से अधिक मछली और झींगा प्रजातियों के लिए प्रजनन और बीज उत्पादन की तकनीकें विकसित की हैं। इसके बावजूद हकीकत यह है कि देश के कुल मत्स्य उत्पादन में कुछ गिनी-चुनी प्रजातियों का ही दबदबा है। मीठे पानी में रोहू, कतला और मृगाल जैसी प्रमुख कार्प प्रजातियाँ अधिकांश उत्पादन का आधार बनी हुई हैं। इसी तरह खारे पानी में एक विदेशी झींगा प्रजाति का अत्यधिक उपयोग हो रहा है, जबकि कई स्वदेशी झींगा और मछली प्रजातियाँ पीछे छूट गई हैं। इस असंतुलन के कारण जैव विविधता पर दबाव बढ़ रहा है और किसानों की आय भी सीमित विकल्पों पर निर्भर हो गई है।
यही कारण है कि अब मत्स्य पालन में विविधीकरण की आवश्यकता महसूस की जा रही है। स्वदेशी मछली प्रजातियाँ इस दिशा में एक मजबूत समाधान प्रस्तुत करती हैं। ये प्रजातियाँ स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल होती हैं, इसलिए इनमें रोग का खतरा अपेक्षाकृत कम होता है और इन्हें कम रासायनिक हस्तक्षेप की जरूरत पड़ती है। साथ ही, स्थानीय बाज़ारों में इनका मूल्य भी अधिक होता है, क्योंकि लोगों की खान-पान की आदतें इन प्रजातियों से जुड़ी होती हैं। कई इलाकों में तो ये मछलियाँ पारंपरिक व्यंजनों, त्योहारों और सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा हैं।
स्वदेशी मछलियों को बढ़ावा देने से केवल उत्पादन नहीं बढ़ता, बल्कि पर्यावरणीय संतुलन भी बना रहता है। ये प्रजातियाँ अपने जल-पर्यावास में अन्य जीवों के साथ संतुलन बनाकर रहती हैं और पूरे इको-सिस्टम को स्वस्थ बनाए रखती हैं। इसके उलट, सीमित विदेशी प्रजातियों पर अत्यधिक निर्भरता से रोग फैलने, पानी की गुणवत्ता बिगड़ने और स्थानीय जैव विविधता के नष्ट होने का खतरा बढ़ जाता है।
आर्थिक व क्षेत्रीय महत्व के आधार पर कई स्वदेशी प्रजातियाँ आज मत्स्यपालन के लिए तैयार उम्मीदवार हैं- जैसे फ्रिंज्ड-लिप्ड कार्प (Labeo fimbriatus), ऑलिव बार्ब (Systomus sarana), पेंगबा (Osteobrama belangeri), स्ट्राइप्ड मुर्रेल (Channa striata), पाब्दा (Ompok spp.), सिंघी (Heteropneustes fossilis), एशियन सीबास (Lates calcarifer), पर्ल स्पॉट (Etroplus suratensis), पोम्पानो (Trachinotus spp.), मड क्रैब (Scylla spp.) और Penaeus indicus। इनकी प्रजनन, बीज उत्पादन और पालन तकनीकें उपलब्ध हैं, अब ज़रूरत है इन्हें बड़े पैमाने पर अपनाने की।
हालांकि, स्वदेशी मछली प्रजातियों को अपनाने में सबसे बड़ी चुनौती जागरूकता और तकनीकी ज्ञान की कमी है। कई किसानों को यह जानकारी ही नहीं होती कि इन प्रजातियों का व्यावसायिक पालन कैसे किया जाए, बीज कहाँ से मिले और बाजार तक पहुँच कैसे बनाई जाए। इसी कमी को दूर करने के लिए सरकार और अनुसंधान संस्थान लगातार प्रयास कर रहे हैं। प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना जैसी योजनाओं के माध्यम से बीज उत्पादन, प्रशिक्षण, अवसंरचना विकास और वित्तीय सहायता उपलब्ध कराई जा रही है। इन योजनाओं का उद्देश्य मछुआरों और मत्स्य किसानों की आय बढ़ाना, रोजगार के नए अवसर पैदा करना और जलीय संसाधनों का टिकाऊ उपयोग सुनिश्चित करना है।
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद अपने विभिन्न संस्थानों के माध्यम से स्वदेशी मछली प्रजातियों पर गहन शोध कर रही है। इनमें उनके जीवन चक्र, प्रजनन व्यवहार, पर्यावास की ज़रूरतें और आनुवंशिक सुधार जैसे पहलू शामिल हैं। इसके साथ ही संकटग्रस्त और लुप्तप्राय प्रजातियों के संरक्षण के लिए विशेष कार्यक्रम भी चलाए जा रहे हैं, ताकि आने वाली पीढ़ियों के लिए यह जलीय विरासत सुरक्षित रह सके।
देश के अलग-अलग हिस्सों में स्वदेशी मछली प्रजातियों के उत्पादन और प्रसंस्करण के लिए विशेष क्लस्टर भी विकसित किए जा रहे हैं। इन क्लस्टरों का मकसद केवल उत्पादन बढ़ाना नहीं है, बल्कि पूरी मूल्य श्रृंखला को मजबूत करना है। इससे कटाई के बाद होने वाले नुकसान कम होते हैं, स्थानीय स्तर पर रोजगार पैदा होता है और महिलाओं व युवाओं को आजीविका के नए अवसर मिलते हैं। पूर्वोत्तर राज्यों, पहाड़ी क्षेत्रों और तटीय इलाकों में ऐसे क्लस्टर स्थानीय अर्थव्यवस्था को नई दिशा दे रहे हैं।
कुल मिलाकर, स्वदेशी मछली प्रजातियों का संवर्धन केवल मत्स्य पालन का मुद्दा नहीं है। यह खाद्य सुरक्षा, जैव विविधता संरक्षण, ग्रामीण रोजगार और पर्यावरणीय स्थिरता से जुड़ा हुआ एक व्यापक विषय है। यदि सही नीतियों, वैज्ञानिक सहयोग और किसानों की भागीदारी के साथ इन प्रजातियों को बढ़ावा दिया जाए, तो भारत न केवल अपने जलीय संसाधनों की रक्षा कर सकता है, बल्कि मत्स्य पालन को एक अधिक संतुलित, लाभकारी और टिकाऊ क्षेत्र में भी बदल सकता है।
आज जब मछली की मांग लगातार बढ़ रही है और जलवायु परिवर्तन जैसे पर्यावरणीय संकट गहराते जा रहे हैं, तब स्वदेशी मछली प्रजातियों का संरक्षण और संवर्धन पहले से कहीं ज़्यादा जरूरी हो गया है।
स्वदेशी मछली प्रजातियाँ वे होती हैं, जो किसी खास इलाके की जलवायु, पानी की गुणवत्ता और पर्यावरण के अनुसार लंबे समय में खुद को ढाल चुकी होती हैं। भारत में मीठे पानी, खारे पानी और समुद्री क्षेत्रों में ऐसी हज़ारों प्रजातियाँ पाई जाती हैं। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के अनुसार, देश में अब तक 2800 से अधिक स्वदेशी मछली और शंख प्रजातियों की पहचान की जा चुकी है। इनमें से सैकड़ों प्रजातियाँ नदियों और तालाबों में, कई खारे पानी में और बड़ी संख्या में समुद्री जल में पाई जाती हैं। यह जैव विविधता भारत को दुनिया के सबसे समृद्ध मत्स्य संसाधन वाले देशों में शामिल करती है।
पिछले कुछ दशकों में भारत ने मत्स्य पालन के क्षेत्र में तेज़ प्रगति की है। वैज्ञानिकों ने 80 से अधिक मछली और झींगा प्रजातियों के लिए प्रजनन और बीज उत्पादन की तकनीकें विकसित की हैं। इसके बावजूद हकीकत यह है कि देश के कुल मत्स्य उत्पादन में कुछ गिनी-चुनी प्रजातियों का ही दबदबा है। मीठे पानी में रोहू, कतला और मृगाल जैसी प्रमुख कार्प प्रजातियाँ अधिकांश उत्पादन का आधार बनी हुई हैं। इसी तरह खारे पानी में एक विदेशी झींगा प्रजाति का अत्यधिक उपयोग हो रहा है, जबकि कई स्वदेशी झींगा और मछली प्रजातियाँ पीछे छूट गई हैं। इस असंतुलन के कारण जैव विविधता पर दबाव बढ़ रहा है और किसानों की आय भी सीमित विकल्पों पर निर्भर हो गई है।
यही कारण है कि अब मत्स्य पालन में विविधीकरण की आवश्यकता महसूस की जा रही है। स्वदेशी मछली प्रजातियाँ इस दिशा में एक मजबूत समाधान प्रस्तुत करती हैं। ये प्रजातियाँ स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल होती हैं, इसलिए इनमें रोग का खतरा अपेक्षाकृत कम होता है और इन्हें कम रासायनिक हस्तक्षेप की जरूरत पड़ती है। साथ ही, स्थानीय बाज़ारों में इनका मूल्य भी अधिक होता है, क्योंकि लोगों की खान-पान की आदतें इन प्रजातियों से जुड़ी होती हैं। कई इलाकों में तो ये मछलियाँ पारंपरिक व्यंजनों, त्योहारों और सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा हैं।
आज जब मछली की मांग लगातार बढ़ रही है और जलवायु परिवर्तन जैसे पर्यावरणीय संकट गहराते जा रहे हैं, तब स्वदेशी मछली प्रजातियों का संरक्षण और संवर्धन पहले से कहीं ज़्यादा जरूरी हो गया है।
स्वदेशी मछलियों को बढ़ावा देने से केवल उत्पादन नहीं बढ़ता, बल्कि पर्यावरणीय संतुलन भी बना रहता है। ये प्रजातियाँ अपने जल-पर्यावास में अन्य जीवों के साथ संतुलन बनाकर रहती हैं और पूरे इको-सिस्टम को स्वस्थ बनाए रखती हैं। इसके उलट, सीमित विदेशी प्रजातियों पर अत्यधिक निर्भरता से रोग फैलने, पानी की गुणवत्ता बिगड़ने और स्थानीय जैव विविधता के नष्ट होने का खतरा बढ़ जाता है।
आर्थिक व क्षेत्रीय महत्व के आधार पर कई स्वदेशी प्रजातियाँ आज मत्स्यपालन के लिए तैयार उम्मीदवार हैं- जैसे फ्रिंज्ड-लिप्ड कार्प (Labeo fimbriatus), ऑलिव बार्ब (Systomus sarana), पेंगबा (Osteobrama belangeri), स्ट्राइप्ड मुर्रेल (Channa striata), पाब्दा (Ompok spp.), सिंघी (Heteropneustes fossilis), एशियन सीबास (Lates calcarifer), पर्ल स्पॉट (Etroplus suratensis), पोम्पानो (Trachinotus spp.), मड क्रैब (Scylla spp.) और Penaeus indicus। इनकी प्रजनन, बीज उत्पादन और पालन तकनीकें उपलब्ध हैं, अब ज़रूरत है इन्हें बड़े पैमाने पर अपनाने की।
हालांकि, स्वदेशी मछली प्रजातियों को अपनाने में सबसे बड़ी चुनौती जागरूकता और तकनीकी ज्ञान की कमी है। कई किसानों को यह जानकारी ही नहीं होती कि इन प्रजातियों का व्यावसायिक पालन कैसे किया जाए, बीज कहाँ से मिले और बाजार तक पहुँच कैसे बनाई जाए। इसी कमी को दूर करने के लिए सरकार और अनुसंधान संस्थान लगातार प्रयास कर रहे हैं। प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना जैसी योजनाओं के माध्यम से बीज उत्पादन, प्रशिक्षण, अवसंरचना विकास और वित्तीय सहायता उपलब्ध कराई जा रही है। इन योजनाओं का उद्देश्य मछुआरों और मत्स्य किसानों की आय बढ़ाना, रोजगार के नए अवसर पैदा करना और जलीय संसाधनों का टिकाऊ उपयोग सुनिश्चित करना है।
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद अपने विभिन्न संस्थानों के माध्यम से स्वदेशी मछली प्रजातियों पर गहन शोध कर रही है। इनमें उनके जीवन चक्र, प्रजनन व्यवहार, पर्यावास की ज़रूरतें और आनुवंशिक सुधार जैसे पहलू शामिल हैं। इसके साथ ही संकटग्रस्त और लुप्तप्राय प्रजातियों के संरक्षण के लिए विशेष कार्यक्रम भी चलाए जा रहे हैं, ताकि आने वाली पीढ़ियों के लिए यह जलीय विरासत सुरक्षित रह सके।
देश के अलग-अलग हिस्सों में स्वदेशी मछली प्रजातियों के उत्पादन और प्रसंस्करण के लिए विशेष क्लस्टर भी विकसित किए जा रहे हैं। इन क्लस्टरों का मकसद केवल उत्पादन बढ़ाना नहीं है, बल्कि पूरी मूल्य श्रृंखला को मजबूत करना है। इससे कटाई के बाद होने वाले नुकसान कम होते हैं, स्थानीय स्तर पर रोजगार पैदा होता है और महिलाओं व युवाओं को आजीविका के नए अवसर मिलते हैं। पूर्वोत्तर राज्यों, पहाड़ी क्षेत्रों और तटीय इलाकों में ऐसे क्लस्टर स्थानीय अर्थव्यवस्था को नई दिशा दे रहे हैं।
कुल मिलाकर, स्वदेशी मछली प्रजातियों का संवर्धन केवल मत्स्य पालन का मुद्दा नहीं है। यह खाद्य सुरक्षा, जैव विविधता संरक्षण, ग्रामीण रोजगार और पर्यावरणीय स्थिरता से जुड़ा हुआ एक व्यापक विषय है। यदि सही नीतियों, वैज्ञानिक सहयोग और किसानों की भागीदारी के साथ इन प्रजातियों को बढ़ावा दिया जाए, तो भारत न केवल अपने जलीय संसाधनों की रक्षा कर सकता है, बल्कि मत्स्य पालन को एक अधिक संतुलित, लाभकारी और टिकाऊ क्षेत्र में भी बदल सकता है।