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घेवर मिठाई बनाने वाले कारीगरों के सामने रोजी-रोटी का संकट, सावन महीने में होता था इस मिठाई का सबसे बड़ा व्यापार

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सावन महीने की ख़ास मिठाई घेवर की मिठास को इस बार कोरोना महामारी ने फीका कर दिया है। सावन महीने में इस मिठाई का सबसे बड़ा व्यापार होता था लेकिन इस बार ऐसा नहीं है।

Mohit SainiMohit Saini   29 July 2020 6:30 AM GMT

घेवर मिठाई बनाने वाले कारीगरों के सामने रोजी-रोटी का संकट, सावन महीने में होता था इस मिठाई का सबसे बड़ा व्यापार

कोरोना महामारी के चलते इस बार पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सावन महीने में बिकने वाली ख़ास मिठाई घेवर के कारोबारियों के सामने रोजी-रोटी का संकट मंडराया हुआ है। यहाँ के कारोबारियों को इस बार इस मिठाई की लागत निकालना भी मुश्किल हो रहा है।

यूपी के शामिली जिले में घेवर मिठाई से जुड़े व्यापारियों और कारोबारियों को इस साल का सबसे बड़ा नुकसान उठाना पड़ रहा है। जिस वजह से इस व्यवसाय से जुड़े लोगों के सामने अपने परिवार का खर्च चलाना मुश्किल हो रहा है।

इन व्यापारियों के सामने एक संकट और है कि ये मिठाई रक्षाबंधन के दो तीन दिन पहले खूब बिकती है लेकिन इस बार शनिवार और रविवार पड़ने की वजह से इन दो दिन लॉकडाउन रहेगा जिससे इनके बाजार पर और असर पड़ेगा।


घेवर की मिठाई बनाने वाले सोनू कुमार बताते हैं, "सावन महीने में सबसे ज्यादा घेवर तैयार होता था, हर वर्ष हमारे यहां घेवर मिठाई बनाने के लिए चार भट्टियां जलती थीं लेकिन इस बार एक ही भट्टी चलाई है उसमें भी कारीगर और सामान का खर्चा नहीं निकल पा रहा है।"

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सावन महीने में बहन-बेटियों को लोग सिंधारे में शगुन के तौर पर घेवर मिठाई भेजते हैं। यहाँ घेवर मिठाई सावन की स्पेशल मिठाई मानी जाती है। लेकिन इस बार कोराना महामारी ने घेवर व्यापारियों की कमर तोड़ दी है। जिसके चलते घेवर विक्रेताओं को अपनी लागत और मजदूरों की मजदूरी निकालने में बहुत जद्दोजहद करना पड़ रहा है। इस समय दुकानों पर घेवर केवल शोपीस की तरह सजा दिख रहा है, इसे खरीदने वाले इक्का-दुक्का ग्राहक ही नजर आ रहे हैं।

घेवर बनाने वाले एक कारीगर ने बताया, "हम लोग सावन महीने में हर साल इससे अच्छा ख़ासा मुनाफा कमा लेते थे लेकिन इस बार व्यापर ठप्प पड़ा है। पिछले साल की तुलना में इस बार कमाई आधे से भी कम हो गयी है।"


लोग आज भी सबसे ज्यादा घेवर मिठाई पसंद करते हैं क्योंकि इसमें मिलावट बहुत कम होती है। शामली जनपद में तो इस मिठाई का अच्छा कारोबार है पर इस बार फायदा तो दूर की बात लागत निकलना ही मुश्किल हो रहा है।

दीपक कुमार बताते हैं, "घेवर बहुत पुरानी मिठाई है, गांव के बड़े बुजुर्ग लोग आज भी घेवर को ही पसंद करते हैं क्योंकि यह सावन मास में ही बनाया जाता है। शगुन के तौर पर सभी बेटियों को यहाँ इस मिठाई को भेजने की यहाँ परम्परा है। इस मिठाई में सबसे कम मिलावट होती है और खाने में भी इसका स्वाद अच्छा होता है।"

"ये मिठाई दूर-दूर बिकने जाती थी लेकिन इस बार तो स्थानीय बाजार में ही बिकना मुश्किल हो रहा है। इस बार कोरोना वायरस के डर से बाजार में ग्राहक ही बहुत कम आ रहे हैं," घेवर मिठाई बनाने वाले कारीगर नीरज कुमार ने बाजार का संकट बताया।

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