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आज भी जिंदा है Mother India के सुक्खी लाला, किसान ने बेटे के इलाज के लिए लिया कर्जा, हड़प ली पूरी जमीन

सत्तर-अस्सी के दशक में हिंदी फ़िल्मों का वो विलेन जो गांव वालों को कर्ज़ देकर उसकी ज़मीन हड़प लेता था, आपको याद तो होगा। सोचिए तो लगता है गुज़रे ज़माने की बात है लेकिन इस रिपोर्ट को पढ़ने के बाद आपको यकीन होगा कि किसानों की आत्महत्या, सूखा और पलायन के लिए कुख्यात बुदंलेखंड में ऐसे तमाम 'लाला' आज भी मौजूद हैं। कोरोना फुट प्रिंट में पढ़िए आंक़ड़ों से इतर भारत के लाखों किसानों की हकीकत...

Arvind ShuklaArvind Shukla   25 July 2020 11:43 AM GMT

ललितपुर (बुंदेलखंड)। " हमारा जवान लड़का अस्पताल में भर्ती था। जेवर बेचकर और उधार लेकर डेढ़ लाख रुपए लगा चुके थे। इलाज के लिए और पैसे की ज़रुरत थी तो एक एकड़ खेत 26 हजार में गिरवी रख दिया। लेकिन बनिया (साहूकार) ने बेईमानी की और हमारी पूरी धरती (4 एकड़ ज़मीन) हड़प ली। बेटा और ज़मीन दोनों चले गए," कहते-कहते बुजुर्ग मथुराबाई पल्लू में मुंह छिपाकर फफक फफक कर रोने लगती हैं।

मथुराबाई के साथ 2008 में हुआ ये हादसा साल 1957 में आई फिल्म मदर इंडिया की याद दिलाता है। फिल्म के शुरुआती सीन में सुंदर चाची अपने बेटे श्यामू (राजकुमार) की शादी के लिए गांव के सुक्खी लाला से 500 रुपए कर्ज़ लेती हैं, कर्ज़ लेते समय तय हुआ था कि सुक्खी लाला फसल का एक चौथाई हिस्सा ब्याज के रुप में लेगा, लेकिन फसल पकने पर पता चलता है कि लाला तीन हिस्से लेगा और सुंदर चाची श्यामू को एक हिस्सा मिलेगा। लाला ने सुंदर चाची से सादे कागज़ पर अंगूठा लगवा रखा था।

साहूकारों और बेईमान बनियों के बीच पिसते किसानों पर आधारित थी मदर इंडिया

भारत में साहूकार, बेईमान बनिया और सेठों के बीच पिसते किसानों की जिंदगी पर बनी इस फिल्म को आए दशकों हो गए। इन सालों में दुनिया बदल गईं, आदमी चांद पर पहुंच गया, कई सरकारें आईं, चली गईं लेकिन सुक्खी लाला कहीं नहीं गए। वो चेहरा और नाम बदलकर आज भी किसानों का खून चूस रहे हैं, ज़मीनें हड़प रहे हैं।

मथुरा बाई का वीरान घर बुंदेलखंड (यूपी वाले हिस्से) के ललितपुर जिले के गगनिया गांव में है। इलाज के दौरान जिस बेटे की मौत हुई थी, उसकी पत्नी, अपने दो बच्चों को लेकर मायके चली गई। दूसरा बेटा हरियाणा में अपने परिवार के साथ रहकर मज़दूरी करता है। गांव में बचे मथुरा बाई और उनके पति भगवान दास कभी बनिया को कोसते हैं तो कभी अपनी किस्मत को।

"इस उम्र में हम दोनों से मज़दूरी नहीं होती। बहू भी हमें छोड़कर चली गई क्योंकि यहां खाने पीने की दिक्कत थी। दूसरा बेटा परदेश में है। ये खाली घर हमें काटने को दौड़ता है।" अपनी जिंदगी में आई इन मुश्किलों के लिए वो ज़मीन गिरवी रखने वाले बनिया (साहूकार) को ज़िम्मेदार मानती हैं।

पथरीली ज़मीन और अक्सर सूखे का सामने करने वाले बुंदेलखंड में कर्ज़ लोगों की ज़िंदगी का हिस्सा है। बुंदेलखंड में खेती, खनन और पलायन तीन आजीविका के ज़रिया हैं। ज्यादातर ज़मीन खेती योग्य नहीं, जहां फसल होती भी है वहां अक्सर मौसम की मार पड़ जाती है। मौसम से फसलें बर्बाद होती हैं तो बैंकों के बाहर घूम रहे उन्हें कर्ज़ के चुंगल में फंसा देते हैं। थक-हार कर किसान साहूकारों के पास पहुंचते हैं, फिर वो कर्ज़ के चक्रव्यूह में फंसते चले जाते हैं। कई किसान आत्महत्या कर लेते हैं, पिता का कर्ज़ बेटे उतारते हैं तो ज्यादातर अपनी जमीनें गंवा देते हैं, बिल्कुल वैसे जैसे भगवान दास के साथ हुआ।

Read in English- 'Merchant of Venice' in UP? Couple who lent money from a moneylender for son's treatment now landless

मथुराबाई और उनके पति भगवान दास

मथुराबाई और उनके पति भगवान दास

भगवान दास बताते हैं, "हम अपने एक रिश्तेदार के साथ महरौनी (ब्लॉक मुख्यालय) में बनिया के पास गए थे। उसने कहा ठीक है, पैसा दे देंगे लेकिन एक एकड़ ज़मीन लिखनी पड़ेगी। उसने हमें 26 हज़ार रुपए दिए हमने कागज पर अंगूठा लगा दिया। कचहरी में भी लिखा-पढ़ी हो गई। तीन साल बाद हमने बाकी की ज़मीन पर बैंक से कर्ज़ (किसान क्रेडिट कार्ड) लेकर बनिया को 50 हज़ार रुपए वापस कर दिए। और अपनी ज़मीन वापस मांगी।"

भगवान दास के मुताबिक उन्होंने 2 फीसदी ब्याज पर 26 हजार रुपए का कर्ज़ लिया था, उसके बदले उन्होंने एक एकड़ ज़मीन साहूकार के नाम लिखी। 13 मार्च 2008 अपनी एक एकड़ ज़मीन (खसरा संख्या 50/5 रकबा 0.405 हेक्टेयर) साहूकार (दूसरे के नाम कराया) के नाम लिखी। जबकि उन्होंने अपनी बाकी साढ़े तीन एकड़ ज़मीन (खसरा संख्या 100/11 रकबा (1.241) पर बाद में बैंक से किसान क्रेडिट कार्ड (केसीसी) बनाकर फ़सली ऋण लिया और 50 हजार रुपए बनिया को वापस कर दिए।

ज़मीन को भगवान दास ही जोत बोर रहे थे (आज भी उनका कब्जा है) तो उन्हें किसी तरह की धोखाधड़ी का शक भी नहीं हुआ। लेकिन साल 2015 में बुंदेलखंड में ज़बर्दस्त सूखा पड़ा और साल 2016 में किसानों के खातों में सरकार की तरफ से मुआवजा पहुंचा। गांव में सभी पट्टेदार (ज़मीन के मालिक) किसानों के पास पैसा पहुंचा, सिवाए मथुरा दास के।

"सूखा राहत का पैसा हमें काहे नहीं मिला ये जानने के लिए हम पटवारी के पास गए तो उसने जांचकर बताया कि उनको पैसा नहीं मिलेगा, क्योंकि उनके नाम कोई ज़मीन नहीं है। हमारी बाकी ज़मीन भी सेठ ने अपना नाम लिखवा ली थी।" अपने साथ हुए धोखे को बताते हुए मथुरादास की आंखें डबडबा जाती हैं।

भगवान दास के मुताबिक वो भागते हुए सेठ के पास गए तो सेठ ने उन्हें भगा दिया। वो कहते हैं, हमने बनिया से कहा ये आपने क्या किया हमने तो आपका पूरा पैसा लौटा दिया था, आपने हमारी पूरी ज़मीन हड़प ली, तो उसने कहा, "तुमने ज़मीन मेरे नाम बेची है। यहां से भाग जाओ, ज्यादा शोर मचाया तो मरवा दूंगा।"

भगवानदास की पत्नी मथुराबाई बताती हैं, "बनिया ने एक-दो बार और धमकी दी तो मैंने इन्हें (भगवानदास) को जाने नहीं दिया, खुद गई लेकिन वो नहीं माना। थाने भी गई लेकिन सुनवाई नहीं हुई। फिर हमने कार्रवाई (कोर्ट की शरण) की।"

दो साल बनिया का चक्कर लगाने के बाद 26 अप्रैल 2018 को कोर्ट के आदेश पर महरौनी थाने में भगवान दास की रिपोर्ट दर्ज की गई। पुलिस ने भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 420 (धोखाधड़ी), 120 बी आपराधिक षड्यंत्र, 467, 468, 406 और 471 यानि जालसाजी (ज़मीन हड़पना आदि) के तहत मामला दर्ज किया। फिलहाल मामला कोर्ट में विचाराधीन है।


"पेट फड़वाकर मिली थी ज़मीन"

भगवान दास और मथुराबाई भूमिहीन गड़रिया समुदाय से हैं। ये ज़मीन उन्हें 1992 में ग्राम समाज से पट्टे के तहत मिली थी। "1992 में जो लोग जो महिलाएं दो बच्चे होने के बाद नसबंदी कराती थी, तो उन्हें ज़मीन मिलती थी, तो ये ज़मीन हमें पेट फड़वाकर मिली थी। लेकिन बनिया ने वो भी हड़प ली।" मथुराबाई साड़ी के पल्लू से आंखें पोछते हुए बताती हैं।

भगवानदास के मुताबिक वो ऐसे पचासों लोगों को जानते हैं, जिन्होंने साहूकार से कर्ज़ लिया फिर उनकी ज़मीन चली गई। कर्ज़ लेने वालों में उनके कई सगे रिश्तेदार भी हैं जो अब भूमिहीन हो चुके हैं।

भगवानदास की तरह ही ललितपुर ज़िले में ही अमौरा गांव के जगन्नाथ पाल कभी साढ़े पांच एकड़ ज़मीन के मालिक थे। उनके तीन बेटे हैं। बड़े बेटे रामकिशन ने खेती की बागडोर संभाली तो अपने खेतों के अलावा दूसरे किसानों के बटाई खेत लेकर फसल बोनी शुरु कर दी। यहां तक सब ठीक चल रहा था फिर एक दिन वो भी कर्ज़ के चक्रव्यूह में फंस गया।

रामकिशन बताते हैं, "मेरा बनिया के यहां आना जाना था, फ़सल बोनी हो या फिर कोई दूसरा काम होता था तो जेवर वगैरह रखकर पैसा ले लेते थे। एक बार उसने हमसे कहा कि मिलकर खेती करते हैं। तो हमने 40 एकड़ ज़मीन ठेके पर ले ली। बनिया ने कहा कि हम लागत निकालकर बांट लेंगे। तो खेती में जो ख़र्च लगा उसने वो हमारे मत्थे कर दिया। और हमारी ज़मीन गिरवीं रख ली। हमने ये सोचा कि इतनी ज़मीन पर खेती कर रहे हैं सब ठीक हो जाएगा। ज़मीन भी वापस ले लेंगे लेकिन ऐसा हुआ नहीं।"

रामकिशन के मुताबिक खेती में इतनी बड़ी खेती में खाद, बीज और डीजल में लाखों रुपए की लागत आती। जो हमने सेठ ये समझ कर लिया था कि लागत बनिया लगा रहा है और खेती का ख़र्च काटकर जो बचेगा उसे आधा-आधा बांट लेंगे। रामकिशन की मेहनत रंग भी लाई थी और खूब पैदावार हुई।

रामकिशन बताते हैं, "उस साल बटाई की ज़मीन पर 300 कुंतल जौ, हमारे दूसरे खेतों में 50 कुंतल गेहूं पैदा हुआ था। और करीब ढाई लाख की लागत आई थी। लेकिन बनिया ने खर्च में कोई पैसा अपने हिस्से में किया नहीं और पूरा अनाज (300 कुंतल जौ, 50 कुंतल गेहूं) ले लिया। सारी लागत को हमारे हिस्से का कर्ज़ बना दिया था तो हमने 50 हजार रुपए भी उसे दिए। लेकिन उसने हिसाब नहीं बताया। सब काम भरोसे पर चलता रहा।"

रामकिशन के दूसरे भाई रामदास का भी भरोसा इस व्यवस्था से उठ चुका है। उन्होंने जो कुछ झेला उसके बाद वो मानते हैं कि इस देश में ग़रीब आदमी की मदद करने के सरकारी दावे खोखले हैं। वो कहते हैं, "सेठ ने हमें धोखा दिया, हम जब भी हिसाब करने जाते वो हमें गाली देकर भगा देता। हम उस तक पहुंच नहीं पाते थे, गेट से ही भगा दिया जाता था। हमारा न पुलिस ने साथ दिया न किसी और ने। गरीब का कोई साथ नहीं देता। अब हम लोग मजदूरी कर अपने बच्चों का पेट पाल रहे।'

रामदास इंदौर में मजदूरी करते हैं, लॉकडाउन लगने के बाद वापस अपने गांव आए हैं और कोरोना महामारी के ख़त्म होने के बाद वापस इंदौर लौट जाएंगे।

बुंदेलखंड में कर्ज़ कैसे किसानों को अपने गिरफ्त में लिए हैं रामकिशन के तीसरे भाई मोती बताते हैं, "हमारे यहां आपने 1000-2000 का कर्ज़ लिया तो प्रेम भाव में मिल जाता है। इसके ऊपर सोना चांदी रखना पड़ता है और ज्यादा के लिए ज़मीन। लेकिन बिना कर्ज़ के किसी का काम नहीं चलता। जब जो बनिया कर्ज़ देता है वो जल्दी जान-बूझकर हिसाब नहीं करता जब तक वो 2000 रुपए का 2 लाख न हो जाए। फिर सोना या ज़मीन घर सब हड़प ही जाना होता है।"

रामकिशन बताते हैं, साझे की खेती में घाटे के चलते हम लोगों को उसी बनिया को पहले ढाई एकड़ जमीन बेचनी पड़ी फिर बाकी भी, क्योंकि उसका कर्ज़ा इतना ज्यादा हो गया था और हमारे कागज़ उसके पास थे। उसने हमसे कहा तुम्हारे गांव में जमीन महंगी है ये बेच दो और हम तुम्हें दूसरी जगह जमीन दिला देंगे, तो हमने वहां की जमीन बेच दी। लेकिन दूसरे गांव में जो उसने हमें जमीन दिलाई वो लिखापढ़ी अपने ही नाम करवा ली है। पैसा मेरा था, लेकिन जमीन उसके नाम है।

भगवान दास हो या जगन्नाथ या फिर खेती में कुछ नया करने का सपना देखने वाले रामकिशन, एक बार कर्ज़ के चक्रव्यूह में फंसे तो जमीन जाना लगभग तय होता है।

रामकिशन के परिवार में करीब 20 लोग हैं। जिनसे बड़ों में कई बढ़ा लिखा नहीं। ज़मीन जाने के बाद चारों भाई आपस में लड़ते झगड़ते जिंदगी बसर कर रहे। दो भाई यहां गांव में रहते हैं, जबकी दो कमाने के लिए बाहर चले गए हैं। रामदास के मुताबिक बनिया लोग ज़मीन हड़पने के लिए पूरी साजिश करते हैं, जैसे हमारे बड़े भाई (रामकिशन) को पैसे दिए दारू पिलाई। फिर हम लोगों से लड़ाई करवाई। ये चाहते ही नहीं कि हम जैसे लोग कभी सुख से कमा खा सकें।

जगन्नाथ पाल अपने परिवार के साथ

जगन्नाथ पाल अपने परिवार के साथ

क्या हैं कानूनी उपाय?

भगवानदास अकेले नहीं है जो अपने साथ हुए धोखाधड़ी के लिए कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं। उनके जैसे तमाम किसान बुंदेलखंड में अपनी खोई हुई ज़मीन को वापस पाने की आस में कोशिशे कर रहे हैं। गांव कनेक्शन ने राजस्व मामलों के अधिवक्ता और प्रॉपर्टी के जानकार करुणेश तिवारी से बात कर ये समझा कि क्या खेत, घर ज़मीन के ऐसी धोखाघड़ी के बाद पीडित के बाद क्या कानूनी विकल्प बचते हैं?

करुणेश तिवारी बताते हैं, "साहूकार जो होते हैं वो पैसे देने के बाद कंडीशनल सेल डीड (बंधकनामा) कराते हैं। ऐसे मामलों में ज़मीन की हेराफेरी या गलत तरीके से ज़मीन अपने नाम कराए जाने के बाद पीड़ित के पास तीन विकल्प कानूनी तौर पर उसके पास बचते हैं। जिस अदालत में आरोपी से ज़मीन अपने नाम कराई (दाखिल खारिज) वहां रिकॉल याचिका दायर कर नाम निरस्त कराया जाए। दूसरा वो सिविल कोर्ट में सिविल जज के सामने बंधकनामा को निरस्त करने का केस दायर करे। तीसरा किसी ने एक एक बीघा ज़मीन लिया है और 4 बीघा लिखवा लिया है तो वो धोखाखड़ी फौजदारी का केस कर सकता है।"

अधिवक्ता करुणेश तिवारी आगे बताते हैं, "साहूकार जो सेल-डीड (बंधननामा) कराते हैं, जिसमें लिखित में कब्जा हो जाता है। लेकिन कई बार ज़मीन पर कब्जा तुरंत नहीं लेते। उसी के आधार पर दाखिल-ख़ारिज (नाम स्थारंतरण) करवा लेते हैं। लेकिन अगर कोई लोन लेने वाला अगर पैसा दे दिया है साहूकार ज़मीन वापस नहीं कर रहा है तो कोर्ट का सहारा लिया जा सकता है क्योंकि नामांत्रण न्यायालय जब तक उस व्यक्ति को नोटिस नहीं देता है जिस व्यक्ति ने ज़मीन का बंधन या विक्रय नामा किया है जबतक नामांत्रण का आदेश एक पक्षीय होता है। और इस एक पक्षीय प्रोसिडंग को निरस्त कराने के लिए हमारे राजस्व न्यायलय 2006 में में इसमें धारा 2014 में धारा सीपीसी की धारा 9 लागू होती है। और आदेश 13 के तहत उस अप्लीकेशन को निरस्त कराया जा सकता है।"

लेकिन कोर्ट की लड़ाई एक लंबा प्रक्रिया है। भारत के गांवों में कहा जाता है कि ज़मीन का मुकदमा बाबा शुरु करता है और पोता लड़ता है (बेटे का बेटा) है।

बुंदेलखंड में गांव के किसानों और ग्रामीणों की दशा को रामदास सही शब्दों में बया करते हैं। "हमारे यहां किसी ने बनिया से 5-10 हजार कर ले लिया तो समझो वो उसका गुलाम हो गया। वो 5-10 साल वो कुछ बोलेगा नहीं, उसे दारू अलग से पिलाएगा, उसे बिगाडेगा, फिर एक दिन हिसाब करेगा और बोलेगा कि तुम पर 200000-250000 ढाई लाख कर्ज़ है, जल्दी वापस करो वर्ना जमीन-घर देना होगा।"

वो आगे कहते हैं, बैंक से हम लोग कर्ज़ लेते हैं लेकिन वो चुका नही पाते तो बैंक दोबारा कर्ज़ नहीं देता। चुकाएं कैसे, खेती अच्छी होती नहीं और दूसरा कोई जरिया नहीं। फिर दवा, शादी बारात से लेकर मरे जिए में ये साहूकार ही पैसा देते हैं और ज़मीन हड़पते हैं।


क्या कहता है आरोपी पक्ष

गांव कनेक्शन की टीम जिस वक्त बुंदलेखंड में थी आरोपी पक्ष से बात नहीं हो पाई थी, लेकिन बाद में फोन पर बात होने पर उन्होंने सबसे पहले सभी आरोपों को बेबुनियाद और दुश्मनी से प्रेरित बताया।

"पहली बात तो ये मैं गिरवीं गांठ या ब्याज पर पैसे देने का काम नहीं करता हूं। दूसरा जमीन मेरे नाम नहीं है। भगवानदास ने जमीन की जब रजिस्ट्री की उस वक्त मैं कोर्ट में एक गवाह के तौर शामिल था। मामला फर्जी है, उन्होंने हम पर सिविल फौजदारी दो केस किए हैं, जो कोर्ट में हैं। कोर्ट जो फैसला करेगा सब उसे मानेंगे।" भगवान दास ने जिनके नाम रिपोर्ट दर्ज कराई है उन्होंने कहा।

गांव कनेक्शन ने उनसे सवाल किया, अगर जमीन सही में रजिस्ट्री हुई थी तो आप नहीं आप के परिचित (असल रिस्तेदार) ही सही, लेकिन उन्होंने जमीन अब तक अपने कब्जे में क्यों नहीं ली?

इसके जवाब में उन्होंने कहा-" इन लोगों (भगवानदास गड़रिया) ने कहा कि हम बटाई बोते रहेंगे। 2008 में रजिस्ट्री हुई उसके बाद 7-8 साल ये लोग अनाज भी दिए, लेकिन बाद में इन्हें किसी ने समझा दिया तो नियत बदल गई तो पुलिस और कोर्ट कर दिया।"

आरोपी के मुताबिक भगवान दास दरुअल (शराबी है) और झूठा आदमी है। वो ये भी कहते हैं, रजिस्ट्री में उनका बेटा भी गवाह था, अब वो है नहीं है। अब अगर ये सही आदमी होते तो 10 साल बाद मुद्दा क्यों उठाते?"

वहीं आरोपी की बात पर भगवानदास कहते हैं, "नियत हमारी नहीं साहूकार की खराब है। हमारी मजबूरी, गरीबी और अनपढ़ होने का फायदा साहूकार ने उठाया अगर साहूकार की नियत खराब नहीं होती, तो एक साथ दाखिल खारिज कराता, उसने 7-8 साल बाद सारी जमीन अपने रिश्तेदार के नाम कराई है। हमें धोखा देकर बर्बाद कर दिया।"

राजस्व के कागजातों के मुताबिक रजिस्ट्री के 35 दिन बाद भगवान दास के नाम की एक एकड़ जमीन का दाखिल खारिज 15/4/2008 में करवाया गया। सात साल बाद बाकी तीन एकड़ जमीन का दाखिल खारिज (नामांतरण) 10 जुलाई 2015 की तारीख में हुआ।

जमीन भले ही कई खातों में हो, विक्रेता जब जमीन की रजिस्ट्री कराता है उस वक्त रकबे के जो खाते (जमीन) रजिस्ट्री में लिखे जाते हैं उसी के मुताबिक उन सभी नम्बरों का दाखिल खारिज (नामांतरण) जब भी होगा एक साथ होगा।

कैसे होता है कर्ज़ वाला धंधा ?

ललितपुर के एक सामाजिक कार्यकर्ता ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, बुंदेलखंड में ब्याज पर कर्ज़ देने का करोड़ों रुपए का धंधा है। पांच हजार से 10-20 हजार तक का पैसा कई बार लोग गांव में देते देते हैं, ये सिर्फ बुंदेलखंड नहीं भारत के हजारों गांवों में होता है। लेकिन बड़ी रकम शहरों के बड़े कारोबारी और पैसे वाले लोग करते हैं। ये लोग किसान से सीधे जेवर या उसकी जमीन गिरवीं या कई बार रजिस्ट्री करवाकर पैसा देता हैं। इसमे किसान को पैसा तो मिल जाता है लेकिन उसका चौतरफा शोषण हो जाता है।"

वो एक उदाहरण देकर समझाने की कोशिश करते हैं, जैसे किसी किसान ने अपना एक एकड़ खेत एक लाख रुपए में गिरवीं रखा तो साहूकार उसकी बकायदा रजिस्ट्री कराएगा, जिसमें अगर 20 हजार रुपए खर्च होते हैं तो वो किसान के खाते में जाएगा, अब यहां 2 बाते होंगी अब या तो वो एक लाख में 20 हजार रुपए कटवाकर 80 हजार कैश ले या फिर उसका कर्ज़ एक लाख 20 हजार का जुड़ेगा, कई बार इन पैसों के बारे बताया नहीं जाता। दूसरा अगर कुछ समय बाद किसान मूलधन और ब्याज चुकाकर (एक लाख या एक लाख 20 हजार मूलधन और ब्याज) अपनी जमीन वापस पाना चाहता है तो वो फिर रजिस्ट्री कराएवा और फिर उसे रजिस्ट्री का पैसा अपनी जेब से देना होगा। इसीलिए एक बार जो बनिया-साहूकारों के कर्ज़ के जाल में फंसा वो ऊबर नहीं पाता है।"

जमीन रजिस्ट्री करा लेते हैं फिर उस पर भौतिक कब्जा क्यों नहीं लेते साहूकार?

इस सवाल के जवाब में वो कहते हैं, साहूकार लोग जो जमीन लिखवाते हैं वो बेहद कम दाम पर होती है, एक लाख की जमीन होगी तो बेहद कम 10-20 हजार देकर वो उसे अपने किसी परिचित के नाम लिखवा लेते हैं। वो तुरंत विवाद नहीं चाहते इसलिए इंतजार करते हैं, फिर वो जमीन किसी दबंग आदमी को बेच देते हैं या फिर उस किसान से कई गुना ज्यादा कीमत वसूल कर वापस कर देते हैं, जमीन कब्जा न करने भी समझिए उनकी चाल होती है।

गांव कनेक्शन के पास आरोपी पक्ष की रिकॉर्डिंग, मामले की FIR copy मौजूद, लेकिन मामला कोर्ट में विचाराधीन है इसलिए नाम नहीं लिखा जा रहा है। वैसे भी ये एक व्यक्ति मामला नहीं, जिसने भी ऐसे ठेकेदारों से कर्ज़ लिया वो चक्रव्यूह में फंस गया।

वीडियो- यश सचदेव, रिपोर्टिंग सहयोग- अरविंद सिंह परमार

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