मरुस्थलीकरणः बंजर होते देश और दुनिया, अब चेतने का समय

देश की 30 तो दुनिया की 23 फीसदी जमीन मरुस्थलीकरण की चपेट में। लगातार बढ़ रहा है खतरा।

Daya SagarDaya Sagar   12 Sep 2019 12:12 PM GMT

मरुस्थलीकरणः बंजर होते देश और दुनिया, अब चेतने का समय

राजस्थान की राजधानी जयपुर से लगभग 80 किलोमीटर पश्चिम में स्थित लपोरिया गांव लगभग 30 साल पहले मरुस्थलीकरण की समस्या से जूझ रहा था। भूमि ने अपनी उर्वरा शक्ति एकदम खो दी थी जिसकी वजह से गांव के लोग छह-छह महीने के लिए अपने मवेशियों सहित पलायन करने पर मजबूर थे। इस गांव में तालाब और कुएं भी थे लेकिन सब सूख गए थे। हालांकि गांव वालों की इच्छाशक्ति और सतत प्रयासों की वजह से तालाबों और कुओं को फिर जिंदा किया गया। तब जाकर पलायन की यह श्रृंखला रुकी।

लपोरिया गांव एक समय अकाल और पलायन की समस्या से जूझ रहा था और ऐसा मरूस्थलीकरण की वजह से था।लपोरिया गांव एक समय अकाल और पलायन की समस्या से जूझ रहा था और ऐसा मरूस्थलीकरण की वजह से था।

भारत सहित दुनिया भर में मरुस्थलीकरण का खतरा बढ़ता जा रहा है। संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक हर साल करीब एक करोड़ 20 लाख हेक्टेयर जमीन रेगिस्तान में तब्दील हो रही है। दुनिया भर के 23 फीसदी कृषियोग्य भूमि का मरुस्थलीकरण हो चुका है। वहीं भारत के 30 फीसदी हिस्से (लगभग 96.40 मिलियन हेक्टेयर) का मरुस्थलीकरण हुआ है।

मरुस्थलीकरण एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें खेती योग्य उत्पादक भूमि अपनी उत्पादकता खो देती है। मरुस्थलीकरण की प्रक्रिया में जमीन से नमी खत्म होती रहती है। ऐसे क्षेत्र में जल स्त्रोत भी सूख जाते हैं और जमीन बंजर होती जाती है। ऐसी जमीन खेती-किसानी के लिए उपयोगी नहीं रह जाती। इसके साथ ही पशु-पक्षी, वन्यजीव और वनस्पतियों का गुजारा भी मुश्किल हो जाता है।

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के 'मरुस्थलीकरण एटलस' के मुताबिक मरुस्थलीकरण से सबसे अधिक प्रभावित राज्य झारखंड है, जहां की लगभग 69 प्रतिशत जमीन बंजर हो गई है। इसके बाद राजस्थान, दिल्ली, गुजरात और गोवा का स्थान आता है। पर्यावरण मंत्रालय की एक रिपोर्ट के अनुसार, भू-क्षरण और मरुस्थलीकरण के कारण देश को 48.8 बिलियन अमेरिकी डॉलर का नुकसान हो रहा है।


नई दिल्ली में मरुस्थलीकरण पर आयोजित पत्रकारों के एक वर्कशॉप में सेंटर फॉर इन्वॉयरनमेंट एंड साइंस, दिल्ली (सीएसई) की महानिदेशक और प्रसिद्ध पर्यावरणविद सुनीता नारायण बताती हैं कि मरुस्थल और मरुस्थलीकरण को एक साथ नहीं मिलाना चाहिए क्योंकि दोनों अलग-अलग संरचनाएं हैं। जहां मरुस्थल खुद में एक संपूर्ण प्राकृतिक व्यवस्था (ईको सिस्टम) है, वहीं मरुस्थलीकरण एक प्राकृतिक आपदा की तरह है, जो जल और जमीन के अतिशय दोहन की वजह से होता है।

संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में बताया गया है कि हर चार में से तीन हेक्टेयर जमीन अपना स्वाभाविक स्वरुप खो रही है जबकि हर चार में से एक हेक्टेयर जमीन की उत्पादक क्षमता प्रभावित हो रही है। इससे दुनिया भर के लगभग 3.2 अरब लोग प्रभावित हो रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र का अनुमान है कि अगर स्थिति ऐसी बनी रही तो 70 करोड़ लोगों को पलायन पर मजबूर होना पड़ेगा, जबकि एक अरब 30 करोड़ लोगों को सूखे से जूझना पड़ेगा।

भारतीय मौसम विभाग, नई दिल्ली के उपमहानिदेशक डा. एसडी अत्री के मुताबिक जलवायु परिवर्तन और मरुस्थलीकरण दोनों एक दूसरे से जुड़ी हुई हैं। उनके मुताबिक मरुस्थलीकरण, जलवायु परिवर्तन का एक स्वरुप है। वह कहते हैं, "पर्यावरण परिवर्तन की वजह से पृथ्वी का तापमान बढ़ रहा है, जिससे जमीन में नमी की मात्रा कम हो रही है और जमीन शुष्क हो रहा है। इससे मिट्टी हल्का होकर हवा और पानी के सहारे आसानी से अपरदित हो रही है और जमीन बंजर होता जा रहा है।"

डा. एसडी अत्री का मानना है कि मरुस्थलीकरण से पूरे पारिस्थितिकी तंत्र का संतुलन प्रभावित होता है और ग्लोबल वार्मिंग को बढ़ावा मिलता है। मरुस्थलीकरण से सबसे अधिक प्रभावित अफ्रीका और एशिया महाद्वीप हैं, जहां दुनिया की सबसे अधिक जनसंख्या निवास करती है। संयुक्त राष्ट्र के ही रिपोर्ट के मुताबिक एशिया और अफ्रीका की लगभग 40 फीसदी आबादी ऐसे क्षेत्रों में रह रही है, जहां लगातार मरुस्थलीकरण हो रहा है। इनमें से अधिकतर लोग खेती और पशुपालन पर निर्भर हैं।


सुनीता नारायण कहती हैं कि मरुस्थलीकरण, क्लाइमेट चेंज और ग्लोबल वार्मिंग की तरह दुनिया के सामने कभी भी एक बड़ा मुद्दा नहीं बन पाया, जबकि मरुस्थलीकरण भी दुनिया के लिए क्लाइमेट चेंज जितना ही खतरनाक है। उन्होंने बताया कि इस पर चर्चा 1992 के 'रियो अर्थ समिट' में ही शुरु हो गई थी जब अफ्रीका और एशिया के विकासशील देशों ने इसे सामने रखा था। हालांकि विकसित देशों के लिए क्लाइमेट चेंज, जैव विविधता और वन्य-जीव संरक्षण ही एक बड़ा मसला था। इसलिए सुनीता नारायण मरुस्थलीकरण को रियो सम्मेलन का 'सौतेला संतान' कहती हैं।

सुनीता नारायण के अनुसार यदि हम जल और जमीन का उचित प्रबंधन कर पाएं तो मरुस्थलीकरण की समस्या का काफी हद तक सामना किया जा सकता है। हालांकि वह भी मानती हैं कि यह संपूर्ण उपाय नहीं है। उनका मानना है कि मरुस्थलीकरण के विरुद्ध दुनिया भर के लोगों को एकजुट होकर एक बेहतर रणनीति बनानी होगी।

मरुस्थलीकरण के बढ़ते खतरों को भापते हुए दुनिया भर के 196 देशों के लगभग 3000 प्रतिनिधि भारत में इकट्ठा हो रहे हैं। कन्वेंशन टू कॉम्बैट डेजर्टिफिकेशन नाम के इस सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मरुस्थलीकरण के विरुद्ध लड़ाई में हरसंभव मदद देने का ऐलान किया और कहा कि भारत अपने मित्र देशों को मरुस्थलीकरण के विरुद्ध रणनीति तैयार करने में सेटैलाइट और अंतरिक्ष तकनीकी की कम लागत वाली सहायता मुहैया कराएगा।


इस सम्मेलन के समाप्त होने तक उम्मीद की जानी चाहिए कि दुनिया मरुस्थलीकरण के विरुद्ध लड़ाई लड़ने के लिए एक बेहतर रोडमैप तैयार कर सकेगी।

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