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बीजेपी छोड़ पंजाब के सभी सियासी दल कृषि अध्यादेश के विरोध में

सर्वदलीय बैठक में पारित प्रस्ताव में जोर दिया गया है कि कृषि व मंडीकरण संविधान की सातवीं अनुसूची के अनुसार राज्यों का विषय है। कृषि अध्यादेश-2020 संघीय ढांचे के खिलाफ है।

बीजेपी छोड़ पंजाब के सभी सियासी दल कृषि अध्यादेश के विरोध में

- अमरीक

नरेंद्र मोदी सरकार के नए कृषि अध्यादेशों के खिलाफ बीजेपी को छोड़ पंजाब के तमाम सियासी दल एक मंच पर आ गए हैं। गठबंधन में बीजेपी के सहयोगी शिरोमणि अकाली दल सहित राज्य की प्रमुख सियासी पार्टियों ने सर्वदलीय बैठक में एकमत से प्रस्ताव पारित किया कि केंद्र सरकार नए कृषि अध्यादेश तत्काल वापस ले और फसलों पर दिए जाने वाले न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) से कोई छेड़छाड़ न करे।

बीजेपी ने इस प्रस्ताव का विरोध किया लेकिन वह बेअसर रहा। शिरोमणि अकाली दल ने भी उसका साथ नहीं दिया और अध्यादेशों तथा एमएसपी पर दूसरे दलों से सहमति जताई। बाद में शिरोमणि अकाली दल अध्यक्ष सांसद सुखबीर सिंह बादल ने यह कहकर एकबारगी फिर अकाली-बीजेपी गठबंधन सरकार का भीतरी सच खोला कि किसान हित सर्वोपरि हैं और किसानों के लिए मंत्री पद की भी बलि दी जा सकती है। सुखबीर सिंह बादल की पत्नी हरसिमरत कौर बादल केंद्र में कैबिनेट मंत्री हैं।

शिरोमणि अकाली दल ने ऑर्डिनेंस के खिलाफ प्रधानमंत्री व केंद्रीय कृषि मंत्री के पास जाने वाले प्रतिनिधिमंडल का हिस्सा बनने पर भी मुखर सहमति दी है। उक्त प्रतिनिधिमंडल मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह की अगुवाई में प्रधानमंत्री और केंद्रीय कृषि मंत्री से मिलेगा। सुखबीर सिंह बादल ने कहा कि वह खुद प्रतिनिधिमंडल का हिस्सा बनेंगे और प्रधानमंत्री से आश्वासन लेंगे की एमएसपी व पहले से चला रहा मंडीकरण यथावत जारी रहेगा।

उन्होंने कहा, "अकाली दल के लिए किसान हितों से बढ़कर न कोई मंत्रालय है और न ही कोई सरकार व गठबंधन! हम संघीय ढांचे के लिए प्रतिबद्ध हैं।" जिक्र-ए-खास है कि सुखबीर सिंह बादल के इस कथन ने बीजेपी में पंजाब से लेकर दिल्ली तक खलबली मचा दी है। प्रसंगवश, सुखबीर ने डीजल की बढ़ती कीमतों को लेकर भी इशारों-इशारों में केंद्र सरकार की आलोचना की और कहा कि अकाली दल शीघ्र ही डीजल की कीमतों में कमी की मांग को लेकर केंद्र के पास सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल लेकर जाएगा।

गौरतलब है कि सर्वदलीय बैठक में पारित प्रस्ताव में जोर दिया गया है कि कृषि व मंडीकरण संविधान की सातवीं अनुसूची के अनुसार राज्यों का विषय है। कृषि अध्यादेश-2020 संघीय ढांचे के खिलाफ है। सर्वदलीय बैठक पांच घंटे चली।

बैठक में मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने कहा कि वह पंजाब के लोगों और किसानों के साथ खड़े रहेंगे। जैसे वह पानी के विभाजन के मुद्दे पर खड़े रहे थे। कृषि के मसले पर केंद्र सरकार को दखल देने का कोई हक नहीं है। सुखबीर सिंह बादल सहित पंजाब के तमाम नेताओं को दिल की आवाज सुननी चाहिए। केंद्र के नए कृषि अध्यादेशों से पंजाब में अभूतपूर्व संकट पैदा हो जाएगा।

बैठक में शिरोमणि अकाली दल प्रधान सुखबीर सिंह बादल ने कहा कि यह गंभीर मामला है और हम इस पर किसानों के साथ हैं। संसद के दोनों सदनों में इसे शिद्दत से उठाएंगे। आम आदमी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष सांसद भगवंत मान ने कहा कि कृषि अध्यादेशों से न केवल किसान बल्कि आढ़ती व छोटे व्यापारी भी प्रभावित होंगे। पंजाब तबाह हो जाएगा। केंद्र सरासर धक्केशाही कर रहा है। अध्यादेशों पर संसद में विस्तृत बहस होनी चाहिए थी।

कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष सुनील कुमार जाखड़ ने कहा कि केंद्र सरकार के ये अध्यादेश संघीय ढांचे की भावना का खुला उल्लंघन करते हैं। यह 2014 में शुरू हुई प्रक्रिया का हिस्सा हैं, जब बीजेपी के वरिष्ठ नेता शांता कुमार की अगुवाई वाली कमेटी ने एफसीआई को खत्म करने और पीडीएस स्कीम के अंतर्गत अनाज वितरण में कमी की सिफारिश की थी। ऑर्डिनेंस पंजाब को खत्म करने की साजिश हैं।

अकाली दल टकसाली के नेता व राज्यसभा सांसद सुखदेव सिंह ढींडसा ने कहा कि केंद्र के कृषि अध्यादेश किसान विरोधी तो हैं हीं, राज्यों के अधिकारों में सेंधमारी की बेजा कोशिश भी हैं। सर्वदलीय बैठक में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) के राज्य सचिव बंत सिंह बराड़, मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीएम) के प्रदेश सचिव सुखविंदर सिंह सेखों, बसपा के प्रदेशाध्यक्ष जसवीर सिंह गड़ी भी इन्हीं सुरों में बोले और ऑर्डिनेंस को घोर किसान विरोधी बताया। जबकि पंजाब बीजेपी अध्यक्ष अश्विनी शर्मा कृषि अध्यादेशों को किसान हितैषी बताते रहे।

(लेखक अमरीक सिंह पंजाब के वरिष्ठ पत्रकार हैं। उनसे amriksinghsurjit@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

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