महाराष्ट्र: तीन तलाक कानून के तहत पहला मामला हुआ दर्ज

महाराष्ट्र: तीन तलाक कानून के तहत पहला मामला हुआ दर्ज

तीन तलाक बिल पारित होने के दो दिन बाद ही इस कानून के तहत पहला मामला दर्ज हुआ। महाराष्ट्र के ठाणे में पुलिस ने कथित रूप से वाट्सएप्प से तीन तलाक देने के मामले में यह मुकदमा दर्ज किया।

आरोपी पति के खिलाफ आईपीसी की धारा 498-ए और मुस्लिम महिला (वैवाहिक अधिकारों की रक्षा) अधिनियम की धारा चार के तहत मामला दर्ज किया गया है। वरिष्ठ पुलिस निरीक्षक मधुकर काड ने बताया कि 31 वर्षीय महिला की शिकायत पर उसके पति के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया है।

महिला ने पुलिस को बताया कि 2015 से 2018 के बीच उसके पति, सास और ननद ने दहेज के लिए उसका उत्पीड़न किया और पति ने फोन और वाटसएप्प पर तीन तलाक दिया। महिला ने कहा कि अब जब तीन तलाक के खिलाफ एक सख्त कानून बना है तब मैं अपना केस दर्ज करा रही हूं। हालांकि इस मामले में अभी तक कोई भी गिरफ्तारी नहीं हुई है।

हरियाणा में भी हुआ एक मामला दर्ज

उधर हरियाणा के नूंह में भी तीन तलाक का एक मामला दर्ज हुआ। यह मामला नगीना थाना क्षेत्र का है, जहां पर खेड़ी कंकर गांव की निवासी पीड़िता ने अपने पति और ससुराल वालों के खिलाफ तीन तलाक और दहेज का मामला दर्ज कराया है।

पीड़िता ने बताया कि उनकी शादी जुलाई 2017 में हुई थी। लेकिन शादी के बाद से उसके पति और ससुराल वाले खुश नहीं थे। इसलिए पीड़िता ने उनके खिलाफ दहेज उत्पीड़न का मामला दर्ज कराया था। जब इस मुकदमे की सूचना पति को मिली तो उसने पीड़िता को फोन करके तीन तलाक दे दिया। अब पीड़िता ने दहेज उत्पीड़न के साथ-साथ तीन तलाक का भी केस अपने पति के खिलाफ किया है।

आपको बता दें कि 30 जुलाई को संसद में तीन तलाक बिल पारित होकर कानून बना था। इस कानून के तहत पत्नी को तीन तलाक देने वाले पति को तीन साल के कारावास और जुर्माने की सजा सुनाई जा सकती है।

तीन तलाक कानून को हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में मिली चुनौती

तीन तलाक पर नए कानून को सुप्रीम कोर्ट और दिल्ली हाई कोर्ट में चुनौती मिली है। केरल स्थित एक मुस्लिम संगठन ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करते हुए कहा कि यह कानून मुस्लिम पतियों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है।

केरल में सुन्नी मुस्लिम विद्वानों और मौलवियों का धार्मिक संगठन केरल जमीयत-उल-उलेमा और दिल्ली के वकील शाहिद अली ने दावा किया कि यह कानून संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 21 का उल्लंघन है इसलिए इसे निरस्त किया जाना चाहिए।

समर्थकों की संख्या के लिहाज से केरल में मुस्लिमों का सबसे बड़ा संगठन होने का दावा करने वाले इस धार्मिक संगठन ने कहा कि यह कानून मुस्लिमों के लिए है और इस कानून की मंशा तीन तलाक को खत्म करना नहीं बल्कि मुस्लिम पतियों को सजा देना है।

'इस कानून से माहौल बिगड़ेगा'

सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई याचिका में कहा गया है कि इस कानून में धार्मिक पहचान के आधार पर एक खास वर्ग के व्यक्तियों लिए दंड का प्रावधान किया गया है। यह जनता के साथ बहुत बड़ी शरारत है जिसे यदि नहीं रोका गया तो उससे समाज में ध्रुवीकरण हो सकता है और सौहार्द्र का माहौल बिगड़ सकता है।

वहीं दिल्ली हाईकोर्ट में दायर याचिका में कहा गया है कि तीन तलाक को गैर जमानती अपराध घोषित करने वाला यह कानून पति और पत्नी के बीच समझौता करने की सभी गुंजाइशों को खत्म कर देगा। इस याचिका पर अगले सप्ताह सुनवाई हो सकती है।

हाईकोर्ट में याचिका दायर करने वाले याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार की मंशा संविधान के साथ-साथ सुप्रीम कोर्ट के फौरी तलाक के फैसले को गैरकानूनी घोषित करना है। याचिका में दावा किया गया है कि तीन तलाक को अपराध के दायरे में लाने का दुरुपयोग हो सकता है क्योंकि कानून में ऐसा कोई तंत्र उपलब्ध नहीं है जिससे आरोपों की सच्चाई का पता चल सके।

(भाषा से इनपुट के साथ)

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