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लॉकडाउन: बुंदेलखंड में सपेरा समुदाय की परेशानी, 'बाहर जाओ तो पुलिस मारती है, घर में रहेंगे तो भूख से मर जायेंगे'

सपेरा जाति के लोगों का प्रमुख व्यवसाय है सांप पकड़कर उसे गांव, कस्बों में घर घर जाकर दिखाना, उसके बदले में लोगों द्वारा द्वारा अनाज या पैसे दिए जाते हैं, जिससे वह अपनी रोजी-रोटी चलाने का काम करते हैं यही इनका आर्थिक स्रोत भी है, लाॅकडाउन से सपेरा जाति के लोगों के कमाई का जरिया ही बंद हो गया है।

लॉकडाउन: बुंदेलखंड में सपेरा समुदाय की परेशानी, बाहर जाओ तो पुलिस मारती है, घर में रहेंगे तो भूख से मर जायेंगे

ललितपुर(उत्तर प्रदेश)। लॉकडाउन के चलते देश भर में काम धंधे ठप पड़े हैं, इस संकट से उबरने के लिए केंद्र व राज्य सरकार मजदूरों और दूसरे कई लोगों को चिन्हित कर योजनाओं के माध्यम से आर्थिक राहत पहुंचाने का कर रही है, इसके बावजूद बुंदेलखंड के इस गाँव के सपेरा समुदाय को आर्थिक मदद न मिलने से इनके सामने रोजी-रोटी का संकट गहराने लगा है।

सपेरा जाति के लोगों का प्रमुख व्यवसाय है सांप पकड़कर उसे गांव, कस्बों में घर घर जाकर दिखाना, उसके बदले में लोगों द्वारा द्वारा अनाज या पैसे दिए जाते हैं, जिससे वह अपनी रोजी-रोटी चलाने का काम करते हैं यही इनका आर्थिक स्रोत भी है, लाॅकडाउन से सपेरा जाति के लोगों के कमाई का जरिया ही बंद हो गया है।

ललितपुर जनपद से पूर्व-दक्षिण दिशा महरौनी ब्लॉक के पचौड़ा गाँव में सपेरा जाति की 60 वर्षीय बड़ी बहू का परिवार रहता है, जिसमें सात सदस्य हैं। भूमिहीन होने की वजह से आय का कोई जरिया नहीं है, मजदूरी व सांप पकड़कर गाँवों में घूम-घूम कर लोगों को दिखाकर माँगने खाने से ही आर्थिक स्थिति जुड़ी हुई है, लाॅकडाउन की वजह से सारे काम ठप्प पड़े हैं। बड़ी बहू के पास पात्र गृहस्थी का राशन कार्ड है, जिसमें तीन लोग जुड़े हैं, कार्ड पर पाँच महीने से राशन नहीं मिला पहले 14 किलो राशन बड़ी बहू को मिलता था। लेकिन अब नही? लाॅकडाउन के बाद बड़ी बहू के परिवार को दो वक्त का भर पेट भोजन मिल पाना अपने आप में चुनौती है।


किसानों ने अपने गेहूं की फसलों की हार्वेस्टर से कटाई करवाई जिनमे कटाई के दौरान कुछ बलिया गिर जाती हैं, जिन्हें बड़ी बहू का परिवार बीनकर हर रोज बालियों की कुटाई कर गेहूँ निकालता है। वही गेहूँ को पिसाकर रोटी बनाती हैं और रूखा सूखा अपने बच्चों का पेट भरके दिन काट रही हैं। बड़ी बहू गेहूँ की बालियों को कूटते हुए कहती हैं,"घर से बाहर निकलना मुश्किल है, कहीं भी मजदूरी नहीं लगी। हम सपेरा जाति के हैं बस्ती से जो मिल जाता है। उसी से परिवार का पेट पालते हैं। अब तो गाँव कस्बों में जाना बंद हैं पुलिस डंडे मारती है। घर पर खाने को कुछ नहीं है।"

अपने कच्चे घर के सामने बालियां कूटते हुए बड़ी बहू कहती हैं ,"अभी गेहूँ की बी खेतों से बीनकर आये अब उन्हें कूटकर गेहूं निकाल रहे हैं, उसी को पिसाकर अगले दिन रोटियाँ बनेगी और रूखा सूखा खाकर पेट भरेगें। कभी रोटी मिलती तो सब्जी नहीं मिलती, सब्जी मिलती तो रोटी नहीं मिलती।

राशन कार्ड दिखाते हुऐ वो कहती हैं,"कोटेदार ने पाँच महीने से राशन नहीं दिया, अंगूठा लगवाता है और कहता है तुमारा राशन अभी नहीं आया, अगले महीने आयेगा आकर देख लेना। यह बात उसने कल ही कही थी। बिना राशन दिये भगा दिया।"


तभी कच्चे घर से बाहर निकलते हु बड़ी बहू के लड़के की पत्नी सविता नाथ (30 वर्ष) बोली, "राशन कार्ड बनवाने के लिए चार पांच बार प्रधान को कागज दिये लेकिन हमारा कार्ड बनवाकर नहीं दिया। अब इस विपदा में कौन खाने को देगा, हमारे घर के लोग भूखों मर रहे हैं।"

बड़ी बहू के परिवार की तरह जरूरतमंद लोगों को योगी सरकार तीन माह तक लगातार गुजारा भत्ता के साथ फ्री राशन देने के लिए प्रयासरत है। किसी भी परिवार पर आर्थिक संकट ना आये, खाने में खाद्यान की कमी ना हो, गुजारे भत्ते से ऐसे लोग खाने पीने की जरूरतें पूरी कर सके। लेकिन गाँव में बड़ी बहू के परिवार की तरह अधिकतर परिवार गुजारे भत्ते और राशन से वंचित होने की वजह से भूखों मरने की कगार पर है।


पचौड़ा गाँव में नाथ समुदाय के 150 परिवार हैं तीन सौ पचास वोटर्स हैं करीब 600 से अधिक की आबादी है। ललितपुर जिले के बारह गाँवो में नाथ समुदाय (सपेरा जाति) के लोग रहते हैं। जिसमें सपेरा जाति की सबसे अधिक आबादी वाला यह पचौड़ा गाँव है। ये कहानी अकेले बड़ी बहू के परिवार की नहीं है। बल्कि अधिकतर परिवारों की यही कहानी है। लाॅकडाउन होने से मजदूरी से लेकर सब काम बंद हैं, ये लोग भुखमरी की कगार पर आ गये।

"सपेरा जाति के 25 प्रतिशत लोगों के पास आधा एकड़ से दो एकड़ तक तक भूमि होने का हवाला देते हुऐ इस समुदाय का पड़े लिखे मनीष नाथ (30 वर्ष) कहते हैं, "बाकी परिवार भूमिहीन हैं, 30-40 परिवारों के पास राशन कार्ड बने हैं बाकी के पास नहीं हैं, अब वो लोग आधा पेट भरकर गुजारा कर रहे हैं, भूखों मर रहे हैं।"


वो आगे कहते हैं, "साँप को पकड़कर पिटारे में रखकर आसपास के गाँव कस्बों में बीन बजाकर लोगों को सांप दिखाते हैं, वो खुश होकर आटा, पैसा दे देते हैं उसी से परिवार चलता था। लाॅकडाउन से घूमना फिरना बंद हैं, नाथ लोगों के पास जो भी राशन पानी था खत्म हो गया, अधिकतर परिवारों को खाने के लाले पड़े हैं।"

इसी गाँव के भूमिहीन बहादुर नाथ आर्थिक संकट से जूझ रहे है, घर में साग सब्जी की व्यवस्था नहीं है। सूरज ढलते वक्त वो अपने घास-फूस और पाॅलीथीन के टपरे के बाहर सिल बट्टे पर टमटी (छोटे टमाटर) की चटनी पीसते हुए बहादुरनाथ (65 वर्ष) कहते हैं, "इसी चटनी के सहारे रोटी खाकर पेट भरेंगे। तेल साग-सब्जी के गुजारे लायक भी पैसा नहीं है। इसके बिना तो चल जायेगा लेकिन रोटी के बिना पेट नहीं भरेगा।"


यह कहते हुऐ बहादुर नाथ पाॅलीथीन के टपरे में जाकर एक बाल्टी उठा लाते हैं। उस बाल्टी में रखे आटे को दिखाते हुए उनकी आँखे भर आई। दर्द भरी आवाज में वो कहते हैं, "साहब इसे देख लो दो किलो आटा बचा हैं, ग्यारह लोगों का परिवार हैं आज तो रोटी बन गई कल इसी आटे से ग्यारह लोगों को रोटी कैसे बनेगी चिंता सता रही हैं कि अब कहाँ से प्रबंध करें।

इसी गाँव में नाथों की बैंड पार्टी में घनश्याम (55 वर्ष) काम करते हैं। अपने कच्चे घर के बाहर बैठे घनश्याम बताते हैं," मेरी पत्नी गुलाबरानी के खाते में जनधन योजना के पाँच सौ रूपया आये थे। उन्हीं पैसों से जरूरी खाने पीने का कुछ सामान ले आये। सात लोगों का परिवार में चलाने में दिक्कत है। शादी समारोह में नाथ बैंड पार्टी को काम मिलता था। अब वो भी बंद हैं।घर में रूखा सूखा खाकर बुरा वक्त निकाल रहे हैं।"

इस गाँव के सपेरा समुदाय में 5-7 लोगों को वृद्धा पेंशन मिलती है। गाँव में हीरानाथ जैसे करीब 15 से 20 महिला और पुरूष बुजुर्ग हैं उन्हें बुढापे के गुजारे के लिए कोई राहत नहीं मिलती। हीरानाथ (62 वर्ष) कहते हैं, " पेंशन के लिए पाँच छह माह पहले फार्म भरे थे, पूछने कई बार प्रधान के पास गये। सरकारी काम की बात करते हुए टाल देते हैं, अगर पेंशन मिल रही होती तो ये बुरा वक्त कट जाता।"


सपेरा जाति के लोगों के आर्थिक हालात खराब होने से परदेश मजदूरी करने निकल गये थे। कुछ लोग जैसे तैसे वापस आ गये और कुछ लोग परदेश में बसे हैं। राजाबाई नाथ का लड़का और बहू परदेश में फंसे हैं, भूमिहीन राजाबाई (65 वर्ष) खाना खाते समय साप के पिटारे की ओर इशारा करते हुऐ कहती हैं, "इसी के सहारे डुकरा (पति) गाँव बस्ती में मांगने खाने का काम करते हैं। एक महीना होने को हैं कहीं भी जा नहीं, घर कैसे चले एक भी पैसा नहीं हैं।"

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