झारखंडः साल 2019 तक सिर्फ 61 हजार आदिवासियों को मिल पाया जमीन का पट्टा

झारखंड के करीब 91 फीसदी लोग प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से जंगल पर आश्रित हैं। लेकिन जमीन के स्थायी पट्टे के लिए आबादी के अनुपात में आवेदकों की कम संख्या पर सवाल उठ रहे हैं।

झारखंडः साल 2019 तक सिर्फ 61 हजार आदिवासियों को मिल पाया जमीन का पट्टाझारखंड में आबादी के 86 लाख के 91 प्रतिशत लोग जंगलों पर निर्भर। फोटो-नीतू सिंह

मो. असग़र खान

सामाजिक कार्यकर्ता ग्लैडसन डुंगडुंग कहते हैं कि झारखंड की पिछली सरकार आदिवासियों से जुड़े अधितकतर मुद्दे पर विफल रही है। इसी तरह की नाराजगी भाजपा के वरिष्ठ नेता व पूर्व सांसद कड़िया मुंडा भी कई बार जाहिर कर चुके हैं। इनके मुताबिक झारखंड में रघुवर सरकार ने आदिवासियों और मूलवासियों को प्रथामिकता नहीं दी। आदिवासियों की जमीन से संबंधित सीएनटी-एसपीटी एक्ट को बिना समझे-बूझे संशोधन करने की कोशिश की।

ग्लैडसन डुंगडुंग की आयी नयी किताब 'आदिवासिस एंड देयर फॉरेस्ट' के मुताबिक पूर्व की रघुवर दास के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार झारखंड के वनों पर आश्रित आदिवासी व अन्य परंपरागत वन निवासियों को उनका अधिकार नहीं दिला पाई।

किताब के चैप्टर नंबर 13, पेज नंबर 149 में वो लिखते हैं, "17 जून 2016 को झारखंड के तत्कालीन मुख्यमंत्री रघुवर दास ने एक कार्यक्रम में कहा कि अगस्त 2016 के अंत तक 3.5 लाख परिवार को जमीन पट्टा दिया जाएगा, इसे लक्ष्य के तौर पर निर्धारित किया गया था। यानी जंगलों पर उन्हें मालिकाना हक के कागजात।"

लेकिन सरकारी आंकड़ों मुताबिक राज्य में दिसंबर 2019 तक करीब 61 हजार ही परिवार को जमीन का पट्टा दिया गया है। इस तरह तत्कालीन मुख्यमंत्री रघुवर दास की घोषणा और सरकारी आकंड़ों के जमीनी हकीकत में बड़ा अंतर दिखाई देता है। यानी 2016 अगस्त तक मुख्यमंत्री के 3.5 लाख परिवार को पट्टा देने वाली घोषणा के अनुसार दिसंबर 2019 तक पौने एक लाख परिवार को भी अभी तक पट्टा नहीं मिल पाया है।


लक्ष्य पूरा नहीं करने के सवाल पर भाजपा झारखंड के स्टेट प्रवक्ता दिनदयाल बर्णवाल का मानना है कि लक्ष्य और सोच हमेशा बड़ी रखनी चाहिए। तत्तकालीन मुख्यमंत्री रघुवर दास ने इसी कड़ी में यह बात कही होगी। इसे असफल या राजनीति नहीं कह सकते हैं।

आगे वो कहते हैं, "रघुवर दास ने अपने कार्यकाल में आदिवासियों को लेकर सोच हमेशा सकारात्मक रखी है। उन्होंने आदिवासियों के लिए कई कल्याणकारी योजनाएं चलाई हैं। 61 हजार परिवार को जो पट्टा मिला है वो भी रघुवर दास की ही उपलब्धि है।"

अब इस आकंड़ें को हम फॉरेस्ट राइट एक्ट 2006 के अनुसार मिलने वाले जमीन के पट्टे को देखें तो कानून के लागू (1 फरवरी 2008) होने के बाद झारखंड में सरकारी आंकड़ों के अनुसार दिसंबर 2018 तक लगभग 1.11 लाख सरकार ने पट्टे के आवेदन प्राप्त किए हैं, जिनमें करीबन 1.7 लाख व्यक्तिगत और 4 हजार सामुदायिक पट्टे के लिए आवेदन आएं। इसमें से सरकार ने 27 हजार के करीब पट्टे के दावों को खारिज कर दिया था।

86 लाख के 91 प्रतिशत लोग जंगलों पर निर्भर

2011 के जनगणना के मुताबिक आदिवासियों की आबादी झारखंड में 86 लाख बतायी जाती है। इसका 80 फीसदी हिस्सा जंगलों में रहता है। किताब में 2011 के जनगणना को आधार बताते हुए लिखा गया है, "झारखंड में आदिवासियों की कुल आबादी का 91 प्रतिशत लोग परोक्ष-अपरोक्ष रूप से जंगल और जमीन पर आश्रित हैं। वहीं 20 राज्यों में ऐसे रहने वाले लोग 89.1 प्रतिशत हैं और इनकी संख्या करीबन 9 करोड़ के करीब है।"

लेकिन झारखंड में वन-अधिकार कानून के तहत मिलने वाले पट्टे की संख्या और विभाग को प्राप्त आवेदन इतने कम क्यों हैं?

इसके जवाब में ग्लैडसन डुंगडुंग कहते हैं, "वन अधिकार कानून को लेकर सरकार ने सही से लोगों को जागरूक नहीं किया और ना ही वन अधिकार कानून 2006 को सही से राज्य में क्रिन्यान्वित किया गया। राज्य में कई ऐसा गांव और प्रखंड है जहां जानबूझकर पट्टे के आवेदन रद्द किए हैं। मेरा मानना है कि इसके लिए सरकार और संबंधित अधिकारी सीधे तौर पर जिम्मेदार हैं। वन अधिकार कानून 2006 को मजबूती से राज्य में लागू नहीं करने के पीछे माइनिंग हित छिपा रहा है।"

इसी सवाल के जवाब में झारखंड वन अधिकार मंच के संयोजक सुधीर पाल कहते, "पट्टे के आवेदन इतने कम क्यों है, इसकी वजह यह भी है कि संबंधित विभाग के पास पट्टे के लिए जो आवेदन आएं। उसमें से जो अस्वीकृत आवेदन हुए उसे विभाग ने लंबित नहीं माना। ऐसे आवेदन को वापस कर दिया गया और कहा गया है कि हमारे पास इतने ही आवेदन आएं, जो सरकारी आकंड़ों में बताए जा रहे हैं।"

गौरतलब है कि इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा कि 9 राज्यों ने जमीन के पट्टे के दावों को खारिज करते समय तय प्रक्रिया का पालन नहीं किया। जंगलों से बेदखली वाला पूरा मामला तब सुर्खियों में आया जब सर्वोच्य न्यायलय ने 16 राज्यों के करीब 11 लाख आदिवासियों व अन्य परंपरागत वन निवासियों को जंगलों पर अतिक्रमणकारी मानते हुए जंगल से बेदखल करने के आदेश दिया था, हालांकि बाद में केंद्र सरकार के दखल के बाद कोर्ट ने अपने आदेश पर रोक लगा दिया था। फिलहाल अब भी मामला सुप्रीम कोर्ट में चल रहा है।


क्या कहता है विभाग है?

इधर गड़बड़ी के आरोप पर अनुसूचित जनजाती, अनुसूचित जाती, अल्पसंख्यक एवं पिछड़ा वर्ग समाज कल्याण विभाग का कहना है कि कई ऐसे विवादित मामले उनके संज्ञान में आए हैं, पर स्टेट से कुछ नही किया जा सकता।

लेकिन पूर्व की सरकार के द्वारा 3.5 लाख परिवार को पट्टे दिलाने वाले दावों पर विभाग के विशेष सचिव एसके सोरेंग कहते हैं, "जो डाटा है और संख्या विभाग के पास है हम उसी के आधार पर कह सकते हैं। दिसंबर 2019 तक 61 हजार ही परिवार को पट्टा दिया गया है। विभाग को 2018 दिसंबर तक पट्टा के लिए 1.11 लाख आवेदन आएं। इसमें 28 हजार 107 दावों को खारिज कर दिया गया था। खारिज दावों को सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद हम लोगों ने एनालिसिस किया। अब वो घटकर 19 हजार 559 हो गए हैं। सुप्रीम कोर्ट निर्देशानुसार इसकी फाइल बनाकर फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया को भेज दिया गया है।"

आगे वो कहते हैं, "जो अस्वीकृत दावे विभाग के पास शेष हैं, उसके लिए हमलोगों ने सुप्रीम कोर्ट से 20 मार्च 2020 तक का समय लिया है। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर फाइनल स्क्रूटनी करके सेव फाइल फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया को भेज दिया जाएगा।"

वरिष्ठ पत्रकार फैसल अनुराग कहते हैं कि पूर्व मुख्यमंत्री का बयान एक राजनीतिक वादा था, जिसे घोषणा पत्रों में नहीं बल्कि बीच में किया गया वादा समझा जा सकता है। अब वादा के दावों और हकीकत को देखें तो आसमान-जमीन का अंदर दिखाई देता है। ( यह स्टोरी एनएफआई मीडिया फेलोशिप प्रोग्राम 2019-20 के तहत प्रकाशित की गई है)


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