आनंद बक्शीः एक ऐसा गीतकार जिसने हिंदी सिनेमा को हुस्न बख्शा

70 और 80 के दशक में आनंद बक्शी ने हिंदी फिल्मों के लिए एक से एक बेहतरीन और सदाबहार गाने लिखे।

आनंद बक्शीः एक ऐसा गीतकार जिसने हिंदी सिनेमा को हुस्न बख्शा

-हृदेश सिंह

लखनऊ। भारत को गीतों का देश कहा जाता है। हमारे यहां हर मौसम के लिए गीत हैं। यहां तक कि हमारे देश में जन्म से लेकर मृत्यु तक के लिए गीत हैं। लेकिन ये सब न भी होते तो भी हमारे देश में एक शख्स ऐसा हुआ है जिसके लिखे गीतों के बल पर भारत को गीतों का देश कह सकते हैं। इस शख्स का नाम है आनंद बक्शी। 70 और 80 के दशक में आनंद बक्शी ने हिंदी फिल्मों के लिए एक से एक बेहतरीन और सदाबहार गाने लिखे।

आनंद बक्शी की शख्सियत और गीतों का मियार इतना ऊंचा है कि वहां तक पहुंचना हर गीतकार का एक सपना होता है। ये कहें कि जिस तरह के गीत 50 और 60 के दशक में लिखे जा रहे थे, गीतों की इस परंपरा को आनंद बक्शी ने बड़ी ही खुबसूरती से निखारा। इतना ही नहीं बल्कि आनंद बक्शी ने गीतों को एक यौवन प्रदान करते हुए उसमें गोटे और बेलबूटे टांकने का भी काम किया है।

आनंद बक्शी ने भारतीय सिनेमा को रोमांस की एक नई जुबान दी। गीतों के जरिए आनंद बक्शी ने लोगों को मोहब्बत करना सिखाया। सीधी सरल और आसान लब्जों में गंभीर बात कह देना ही आनंद बक्शी की सबसे बड़ी खासियत है, जो उन्हें और गीतकारों से एकदम अलग रखती है। अपने गीतों से आनंद बक्शी ने हिंदी सिनेमा को एक हुस्न बक्शा है।



21 जुलाई 1930 को पाकिस्तान के रावलपिंडी में एक ब्राह्मण परिवार में जन्मे आनंद बक्शी जब पांच वर्ष के थे तो उनका परिवार दिल्ली आ गया। जब भारत पाकिस्तान का विभाजन हुआ तब आनंद बक्शी की उम्र 17 साल की थी। विभाजन का आनंद बक्शी के जेहन पर गहरा असर पड़ा। इसके बाद उनका परिवार पूना और फिर उत्तर प्रदेश के मेरठ और अंत में उनका परिवार वापस दिल्ली में आकर बस गया।

जवानी में आनंद बक्शी इंडियन आर्मी की सिग्नल कोर रेजीमेंट में भर्ती हो गए। गीत लिखने का शौक उन्हें किशोरावस्था से ही था, लेकिन सेना में होने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रमों ने आनंद बक्शी को मंच प्रदान किया। आनंद बक्शी को गाने का भी शौक था। आनंद बक्शी की इस प्रतिभा को सेना के अधिकारियों ने प्रोत्साहित किया। 1956 में आनंद बक्शी ने गीतकार बनने के लिए मुंबई आ गए।

उन्हें गीत लिखने के लिए पहला मौका 1958 में बृज मोहन की फिल्म 'भला आदमी' में मिला। भगवान दादा इस फिल्म के हीरो थे। उनका गीतकार कहीं चला गया तो वे परेशान अपने ऑफिस में बैठे थे। आनंद बक्शी भी उसी ऑफिस में बैठे थे। उन्हें देखकर भगवान दादा ने उनसे पूछा कि क्या करते हो? आनंद बक्शी ने बताया कि वे गीतकार हैं और गीत लिखते हैं। इस पर उन्होंने कहा कि गीत लिखकर दिखाओ। आनंद बक्शी ने वहीं बैठे बैठे एक नहीं चार गीत लिख दिए।


1965 में फिल्म 'जब फूल खिले' में लिखे गीतों से आनंद बक्शी को पहचान मिली। यहीं से आनंद बक्शी की कामयाबी का सफर शुरू हुआ। अभिनेता दिलीप कुमार से लेकर सदी के महानायक अमिताभ बच्चन तक आनंद बक्शी के गीतों के मुरीद हैं। भारत रत्न स्वर कोकिला लता मंगेशकर ने एक बार खुश होकर आनंद बक्शी को एक कलम भेंट की। इसी कलम से आनंद बक्शी ने 'जिंदगी के सफर में गुजर जाते हैं जो मुकाम वे फिर नहीं आते' जैसा सदाबहार गीत लिखा।

जीवन के दर्शन को समेटे इस गीत को सुनने के बाद मशहूर गीतकार, गजलकार, पटकथा लेखक जावेद अख्तर इतने प्रभावित हुए कि आनंद बक्शी से वही कलम मांगी। आनंद बक्शी ने उस कलम को देने से इंकार करते हुए जावेद अख्तर से बड़ी विनम्रता से कहा कि भाई यह कलम इसलिए नहीं दे सकते क्योंकि यह कलम लताजी ने उन्हें दी है। लेकिन आनंद बक्शी ने उसी तरह की एक कलम बाद में जावेद अख्तर को उनके घर पर भिजवायी।

आनंद बक्शी ने सबसे ज्यादा काम संगीतकार लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल के साथ किया। इस मशहूर जोड़ी के लिए आनंद बक्शी ने 304 फिल्मों के लिए 1200 गीत लिखे। उनकी लोकप्रियता का अदांजा इसी बात से लगा सकते हैं कि फिल्मफेयर पुरस्कार के लिए आनंद बक्शी का नामांकन 40 बार किया गया। आनंद बक्शी को चार बार फिल्मफेयर का पुरस्कार मिला।

1972 में फिल्म 'मोम की गुड़िया' के एक गाने बागों में बहार आई के लिए उन्होंने आवाज दी। लता मंगेशकर ने भी इसमें आवाज दी। यह गीत बेहद मशहूर हुआ। राजेश खन्ना को सुपर स्टार बनाने में आनंद बक्शी के गीतों का बहुत बड़ा योगदान है। आराधना, अमर प्रेम, कटी पतंग जैसी दर्जनों फिल्मों के गीत आज भी पूरी शिद्दत से सुने और गुनगुनाए जाते हैं।


आंनद बक्शी ने संगीत के जीनियस कहे जाने वाले आरडी बर्मन के साथ भी खूब काम किया और सैकड़ों हिट गाने दिए। पंजाब की मिट्टी से उन्हें बेहद लगाव था। पंजाब की संस्कृति और लोकसंगीत की झलक आनंद बक्शी के गीतों में साफ महसूस की जा सकती है। फिल्म 'दिल वाले दुल्हनिया ले जाएंगे' के गीत इसका उदहारण हैं। फिल्म 'नाम' का गाना 'चिट्टी आई है' को सुनकर आज भी विदेश में रह रहे लाखों भारतीयों की आखें नम हो जाती हैं। यही वो गीत है जिसे सुनकर आज भी एनआरआई अपने वतन लौटने के लिए मचल उठते हैं।

आनंद बक्शी चलते-फिरते गीत लिख देते थे। उनके बारे में कहा जाता है कि वे पहले ऐसे गीतकार थे जो गीत लिखने में सबसे कम समय लेते थे। उनके प्रशंसकों में शामिल मशहूर फिल्म निर्माता और निर्देशक सुभाष घई उनकी इस प्रतिभा से बेहद प्रभावित थे। एक बार दिल्ली में किसी कार्यक्रम में आनंद बक्शी ने सुभाष घई से पूछा कि आजकल किस फिल्म पर काम कर रहो हो। सुभाष घई ने बताया कि 'सौदागर' नाम से फिल्म बना रहे हैं। इस पर आनंद बक्शी ने फौरन ही उसका टाइटल सॉन्ग बना दिया। जो बाद में 'सौदागर सौदा कर दिल ले ले दिल देकर' के रूप सामने आया।

सुभाष घई को शोमैन का दर्जा दिलाने में आनंद बक्शी के गीतों का भी बड़ा योगदान है। उन्होंने घई के फिल्मों कर्ज, कर्मा, ताल के लिए सुपरहिट गाने लिखे। आनंद बक्शी ने अपना अंतिम गीत भी सुभाष घई की फिल्म 'यादें' के लिए लिखा।


राजकपूर, यश चोपड़ा, दिलीप कुमार और सुभाष घई आनंद बक्शी के सबसे करीब थे। आनंद बक्शी ने राजकपूर के लिए 'बॉबी' फिल्म के गीत लिखे। अमर अकबर एंथोनी, एक दूजे के लिए, शोले ऐसी फिल्में थी जिनके गीतों ने बॉक्स आफिस पर सफलता के नए कीर्तिमान रचे और इन फिल्मों के गीतों ने आनंद बक्शी को सफलता की बुलंदियों पर पहुंचा दिया। आनंद बक्शी ने अपने जीवन में चार हजार गीत लिखे।

आनंद बक्शी ने संगीतकार राहुल देव बर्मन से लेकर एआर रहमान के साथ काम किया। उनके गीतों की खास बात ये थे कि उन्होने कभी चलताऊ गीत नहीं लिखे। उनकी तुकबंदी में भी एक शायरी होती थी। उनके गीतों में एक संदेश और जिदंगी का दर्शन होता था। कठिन बात को भी वे बड़ी सरलता से कह देना ही आनंद बक्शी को बड़ा गीतकार बनाते हैं। गीतकार जावेद अख्तर ने एक बार कहा था, "ऐसी कौन सी घड़ी है। जिंदगी का ऐसे कौन से जज्बात हैं। ऐसी कौन सी ऋतु है जिस पर आनंद बक्शी की कलम से गीतों के झरने न फूटते हों।"

गीत की विद्या को आनंद बक्शी ने फिल्मों के माध्यम से सम्मान दिलाने का काम किया। उनके गीतों में इंसानी जज्बातों की फिक्र और कद्र साफ दिखाई देती है। 1980 में फिल्म 'आशा' का एक गीत 'जाने में हम सड़क के लोगों से महलों वाले क्यों जलते हैं' से पता चलता है कि आनंद बक्शी के दिल में मजदूर वर्ग के लिए बड़ा सम्मान था। उनके गीत में मजदूर मजबूर तो हो सकता है लेकिन लाचार आरै बेचारा नजर नहीं होता था।


मजदूर और कमजोर वर्ग की जब वे बात करते हैं तो उनके गीतों में उम्मीद की एक रोशनी हमेशा कायम नजर आती है। फिल्म 'हाथी मेरे साथी' के गीत 'नफरत की दुनिया को छोड़ के प्यार की दुनिया में खुश रहना मेरे यार' इंसान और जानवर के रिश्ते को समझने के लिए इससे बेहतर गीत शायद ही हो। आनंद बक्शी ने तोता, मैना, बुलबुल पर भी हिट गीत लिखे। उनके गीत निराशा पैदा नहीं करते। आनंद बक्शी जीवन के हर रंग को जिंदादिली से पेश करते हैं। आनंद बक्शी गीतों के राजकुमार हैं।

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