चार लाख रूपये सालाना फीस के खिलाफ उत्तराखंड के मेडिकल छात्रों का विरोध

अन्य राज्यों के सरकारी मेडिकल कॉलेजों में अधिकतम फीस एक लाख 20 हजार रुपये तक है। कोई भी छात्र लगभग पांच लाख रुपये में अपना एमबीबीएस कोर्स पूरा कर सकता है, लेकिन उत्तराखंड के मेडिकल छात्र को सिर्फ एक साल में ही इतना फीस भरना पड़ रहा है।

Daya SagarDaya Sagar   14 July 2020 10:45 AM GMT

उत्तराखंड के सरकारी मेडिकल कॉलेजों के एमबीबीएस कोर्स के छात्र और उनके अभिभावक इन दिनों खासे परेशान हैं। उनके इस परेशानी का कारण कोरोना या लॉकडाउन नहीं बल्कि अप्रत्याशित रूप से आठ गुना से अधिक बढ़ी हुई फीस है। उन्हें इस महीने के आखिर (31 जुलाई) तक लगभग 4 लाख 30 हजार रूपये की अपनी सालाना फीस भरनी है, लेकिन उन्हें समझ नहीं आ रहा कि वे इस फीस को कैसे भर पाएंगे। एक तो यह फीस पहले से ही काफी अधिक थी, ऊपर से कोरोना ल़ॉकडाउन ने उनकी इस समस्या को और बढ़ा दिया है।

कमल गहतोड़ी एक ऐसे ही छात्र हैं। वह उत्तराखंड के पहाड़ी जिले चंपावत के निवासी और गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज हल्द्वानी में एमबीबीएस के छात्र हैं। उनके पिता एक दिहाड़ी मजदूर हैं और मजदूरी और छोटी सी खेती के सहारे अपना घर-बार चला रहे हैं। बेटे कमल ने सरकारी सीट पाने के लिए बारहवीं के बाद दो साल तक कड़ी मेहनत से ऑल इंडिया मेडिकल प्रवेश परीक्षा (नीट) की तैयारी की थी ताकि उन्हें सरकारी सीट मिल सके और एडमिशन लेने में उन्हें आर्थिक तौर पर कोई दिक्कत ना हो। कमल ऐसा करने में सफल भी हुए जब उन्होंने नीट 2019 की परीक्षा में राज्य में 500 से भी कम अंक लाया। लेकिन काउंसलिंग और एडमिशन के ठीक पहले आए उत्तराखंड सरकार के एक सरकारी आदेश ने उनकी इस सफलता की खुशी को मायूसी में बदल दिया।

दरअसल उत्तराखंड सरकार के जून, 2019 के इस शासनादेश के अनुसार सरकार ने राज्य के दो प्रमुख सरकारी मेडिकल कॉलेजों (देहरादून और हलद्वानी) में बांड सिस्टम को खत्म कर 50 हजार की सालाना फीस को बढ़ाकर 4 लाख 26 हजार रूपये कर दिया। ऐसा तब हुआ जब कॉउंसलिंग में एक हफ्ते से कम का भी समय बचा था। सीट खोने के डर से छात्रों और अभिभावकों ने किसी तरह पैसों की व्यवस्था की और एडमिशन लिया।

हल्द्वानी मेडिकल कॉलेज का फी स्ट्रक्चर, जिसे कमल और उनके जैसे सैकड़ों छात्रों को 31 जुलाई तक जमा करना है। इसके अलावा हॉस्टल के मेस का फीस और कॉपी-किताब का खर्चा अलग से लगेगा।

कमल गहतोड़ी के पिता ने भी रिश्तेदारों से उधार और खेत को गिरवी रखकर किसी तरह पैसों की व्यवस्था की। कमल की तरह सामान्य निम्नवर्गीय और निम्न मध्यमवर्गीय परिवारों के सैकड़ों ऐसे छात्र रहें जिन्होंने किसी तरह कर्ज लेकर, खेत या जमीन गिरवी रखकर, दोस्तों-रिश्तेदारों से उधार लेकर या एजुकेशन लोन लेकर इस फीस को भरा ताकि मेहनत से हासिल किए गया सीट हाथ से छूट ना जाए। वहीं कुछ ऐसे छात्र भी रहें जिनके अभिभावक पैसों की व्यवस्था नहीं कर सकें और उनका एमबीबीएस करने का सपना अधूरा रह गया।

पंतनगर के सुभाष सिंह ऐसे ही छात्र थे, जिनके लिए बढ़ी हुई फीस के साथ एडमिशन लेना संभव नहीं था, इसलिए वह नीट में बेहतर रैंक लाकर भी एमबीबीएस में प्रवेश नहीं ले सकें। हल्द्वानी मेडिकल कॉलेज की श्रद्धा तिवारी गांव कनेक्शन को फोन पर बताती हैं कि सुभाष सिंह जैसे उनके जान-पहचान में ऐसे दसियों छात्र थे, जो अचानक फीस बढ़ने के कारण एडमिशन नहीं ले सकें, जबकि ना जान-पहचान वाले छात्रों की संख्या सैकड़ों में होगी।

श्रद्धा और उनके भाई दोनों ने पिछले साल ही एमबीबीएस कोर्स में एडमिशन लिया था। वह कहती हैं, "पिछले साल किसी तरह मां-बाप ने एडमिशन ले लिया लेकिन हर साल फीस पर लगभग 9 लाख रुपये खर्च करना किसी भी तरह संभव नहीं है। इसलिए हम सरकार से चाहते हैं कि वह हमारी इस समस्या को समझे और हमारी फीस कम करे।"

श्रद्धा ने बताया कि उनके माता-पिता दोनों सरकारी स्कूल में अध्यापक हैं फिर भी उन्हें फीस भरने में दिक्कत हो रही है। "ऐसे में आप उन छात्रों का सोचिए जिनके घर में एक भी सरकारी नौकरी ना हो या जो लोग खेती-किसानी, मजदूरी, दुकान, व्यापार या किसी व्यवसाय पर निर्भर हों।"

श्रद्धा इस फीस को कम करने को लेकर अपना तर्क भी देती हैं। वह कहती हैं कि देश का कोई भी राज्य ऐसा नहीं है, जहां पर सरकारी मेडिकल कॉलेजों में इतना फीस है। देश के अधिकतर सरकारी मेडिकल कॉलेजों में सालाना फीस औसतन 50 हजार से एक लाख के बीच में है। इसके अलावा कई ऐसे मेडिकल कॉलेज भी हैं, जहां सालाना फीस कुछ सौ या हजार में है।

उत्तराखंड के पड़ोसी राज्यों में सरकारी मेडिकल कॉलेज की फीस


मसलन मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज, दिल्ली का सालाना फीस सिर्फ 240 रूपये है, इसी तरह तमिलनाडु के सरकारी मेडिकल कॉलेजों में यह फीस महज 4 हजार रूपये वार्षिक है। इसी तरह उत्तराखंड के पड़ोसी राज्यों हरियाणा, उत्तर प्रदेश, हिमाचल प्रदेश और पंजाब में क्रमशः 52 हजार, 54 हजार, 60 हजार और 80 हजार रूपये है। हालांकि इस सत्र से पंजाब सरकार भी मेडिकल फीस लगभग 80 फीसदी तक बढ़ाकर हर साल एक लाख 60 हजार रूपये सालाना करने जा रहा है। श्रद्धा कहती हैं कि जब अन्य राज्यों में सरकारी मेडिकल कॉलेजों के फीस इतने कम हैं तो सिर्फ उत्तराखंड में ही यह 5 गुना तक अधिक क्यों है। वह कहती हैं कि हम ये नहीं चाहते कि फीस में वृद्धि ही ना हो। अगर फीस में वृद्धि हो तो वह तार्किक हो, जिसे एक सामान्य छात्र भी आसानी से दे सके।

दरअसल उत्तराखंड सरकार ने नया राज्य बनने के बाद पहाड़ी क्षेत्रों में चिकित्सा सुविधा को बढ़ावा देने के लिए राज्य के सरकारी मेडिकल कॉलेजों में बांड की व्यवस्था की थी। इस बांड के अनुसार राज्य के मेडिकल कॉलेज में पढ़ने वाले एमबीबीएस छात्र को कम फीस के बदले राज्य के पहाड़ी इलाकों में सेवा देनी पड़ेगी। इस करार के अनुसार बांड लेने वाले छात्रों की फीस लगभग 15 हजार और बिना बांड के छात्रों की फीस लगभग ढाई लाख रूपये के लगभग रखी गई, जो समयांतर में बढ़कर 2010 में क्रमशः 50 हजार और चार लाख 26 हजार हो गई।

अब उत्तराखंड सरकार का कहना है कि पहाड़ी क्षेत्रों में उन्हें जितने डॉक्टर चाहिए थे, वे लगभग पूरे हो गए हैं। इसलिए बांड सिस्टम खत्म किया जाता है। ऐसा कहते हुए उत्तराखंड सरकार ने 26 जून 2019 को उत्तराखंड के दो प्रमुख मेडिकल कॉलेजों देहरादून मेडिकल कॉलेज और हल्द्वानी मेडिकल कॉलेज से बांड सिस्टम हटा लिया और वहां की फीस 4.26 लाख हो गई। सरकार ने चालाकी करते हुए उत्तराखंड के एक अन्य सरकारी मेडिक कॉलेज श्रीनगर मेडिकल कॉलेज, गढ़वाल से यह बांड सिस्टम नहीं हटाया ताकि पहाड़ी क्षेत्रों में अगर कभी डॉक्टरों की जरूरत पड़े तो वह उन्हें यहां से मिल जाए।


बांड सिस्टम खत्म करने हेतु उत्तराखंड सरकार का शासनादेश


दून मेडिकल कॉलेज, देहरादून में दूसरे वर्ष के छात्र भवनीत शर्मा कहते हैं, "यह तो सरासर हमारे साथ नाइंसाफी है। सरकार को अगर बांड सिस्टम खत्म करना है तो करे लेकिन उसी हिसाब से फीस को संशोधित भी तो करे। 4.26 लाख फीस बिना बांड के इसलिए रखा गया था ताकि अधिकतर छात्र बांड लेने पर मजबूर हों और अपनी शुरूआती सेवाएं पहाड़ी क्षेत्रों में दें। ऐसा होता भी था और 99 प्रतिशत तक छात्र इसी बांड के तहत ही एडमिशन लेते थे और कुछ सेवा भाव से और कुछ मजबूरी में ही सही पहाड़ी और दुर्गम क्षेत्रों में अपनी सेवाएं देते थे।"

"लेकिन अब जब सरकार को जरूरत खत्म हो गई है तो वह इसे हटा रही है। वह हटाए इसका विरोध नहीं है लेकिन फिर फीस भी तो उसी के अनुसार रिवाइज करना चाहिए ताकि समावेशी शिक्षा यानी सबको उच्च शिक्षा के लक्ष्य को पूरा किया जा सके।" भवनीश ने बताया कि उनके पिता एक किराना दुकानदार हैं और लॉकडाउन के दौरान तो दुकानदारी की कमर ही टूट गई। ऐसे में सरकार लगभग चार लाख से अधिक का फीस मांग रही है, जिसे भर पाना बहुत ही मुश्किल है।

ऐसे में कई छात्र एजुकेशन लोन लेने की योजना बना रहे हैं। ऊपर शुरूआत में जिस छात्र कमल गहतोड़ी की बात की गई है, उन्होंने गांव कनेक्शन को फोन पर बताया कि उनके पिता ने पास के ही स्टेट बैंक ऑफ इंडिया से एजुकेशन लोन लेने के लिए अप्लाई किया है, जिसमें उनसे उनके खेत और घर के कागजात को मांगा गया है ताकि लोन को सैक्शन किया जा सके। निराश कमल कहते हैं कि सरकार की तरफ से हमारी मांग पर कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा है इसलिए लग रहा है कि लोन ही एकमात्र विकल्प है।


2019 के सरकारी आंकड़ों के अनुसार उत्तराखंड राज्य के लोगों की सालाना औसत आय और मेडिकल कॉलेजों की फीस

कई छात्रों ने हमें बताया कि उन्हें बैंक से लोन लेने में भी दिक्कत आ रही है। एक तो बैंक लोन देने के लिए कोई जमीन या संपत्ति गिरवी (सिक्योरिटी) के तौर पर रखने की बात कर रहा है, ऊपर से ग्रामीण छात्रों को 7.5 लाख रूपये से अधिक का लोन मिल नहीं पा रहा है, जबकि उन्हें 4.5 साल की फीस के लिए 20 लाख रूपये से ऊपर की जरूरत है।

ऐसे ही एक छात्र मुकुल बमेटा गांव कनेक्शन को फोन पर बताते हैं कि उनके बैंक ने 7.5 लाख से अधिक लोन देने से मना कर दिया क्योंकि उनका घर गांव में पड़ता है। उन्होंने बताया कि ऐसे लगभग 80 फीसदी छात्र गांवों के हैं, उन्हें बताइए सरकारी लोन कैसे मिलेगा?

मुकुल बमेटा के पिता एक सहकारी समिति के कर्मचारी हैं, जो कि अगले साल रिटायर होने जा रहे हैं। मुकुल कहते हैं, "डॉक्टरी एक बहुत नोबल कार्य है। कोई बच्चा एक अच्छे भविष्य के साथ-साथ सेवाभाव का लक्ष्य भी लेकर इस प्रोफेशन में आता है। आप ही बताइए कि जिस पर 20 लाख रूपये का कर्ज रहेगा वह सेवा भाव से अपना काम करेगा या फिर लूट के उद्देश्य से जाएगा ताकि वह अपना कर्ज जल्द से जल्द चुका सकें।"

मुकुल को सरकार के इस फैसले से बहुत रोष है। वह कहते हैं कि अगर ऐसा ही रहेगा तो फिर सरकारी और प्राइवेट कॉलेजों में कोई अंतर ही नहीं रह जाएगा। "अमीर के बच्चे अब प्राइवेट कॉलेजों में पढ़ेंगे और अमीर के बच्चे ही सरकारी कॉलेजों में ही पढ़ेगे। गरीब और निम्न मध्यमवर्गीय छात्रों के लिए कोई जगह नहीं बचेगी।"

छात्रों और अभिभावकों के द्वारा सीएम को भेजी गई चिट्ठी


बेतहाशा फीस से परेशान ये छात्र और इनके अभिभावक थक हारकर सोशल मीडिया पर पिछले एक महीने से #WeDemandAReasonableFee और #FeesKamKaroNa नाम से कैंपेन चला रहे हैं। इन छात्रों और अभिभावकों का कहना है कि उन्होंने इसको लेकर मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत सहित राज्य के आला अधिकारियों और मंत्रियों को पत्र लिख चुके हैं, लेकिन कहीं से भी अभी तक कोई उम्मीद नहीं मिली है। छात्र और अभिभावक राज्य के प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस को भी जिम्मेदार विपक्ष होने का नाते इस मुद्दे को उठाने की अपील कर रहे हैं। अभिभावकों ने देश के शिक्षा मंत्री (मानव संसाधन विकास मंत्री) और राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री रहे रमेश पोखरियाल निशंक से भी इस मामले में हस्तक्षेप करने की अपील की है।

छात्रों का कहना है कि उन्होंने वरिष्ठ कांग्रेसी नेता और पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत, उत्तराखंड विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष इंदिरा हृदयेश और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष प्रीतम सिंह का भी इस मुद्दे की तरफ ध्यान आकर्षित कराया है, लेकिन कांग्रेस की तरफ से भी अभी तक इस मुद्दे को उठाने की कोई गंभीर कोशिश होती नहीं दिख रही है। हालांकि राज्य के यूथ कांग्रेस इकाई ने छात्रों की इस मांग का समर्थन किया है।

प्रदेश यूथ कांग्रेस के अध्यक्ष सुमित्तर भुल्लर ने इस संबंध में बताया कि वह लंबे समय से मेडिकल छात्रों की मांग को सरकार के सामने उठा रही है, लेकिन सरकार जो है कि सुनने को तैयार नहीं। इस संबंध में हमने राज्य के स्वास्थ्य शिक्षा विभाग के निदेशक और सचिवालय में एडिशनल सचिव युगल किशोर पंत से फोन पर बात की तो उन्होंने कहा कि फीस बढ़ाने और घटाने का मामला शासन और सचिवालय स्तर पर तय होता है। हमारा काम है शासन ने जो फीस तय की है उसे वसूलना और छात्रों को मेडिकल शिक्षा उपलब्ध कराना, जो कि हम कर रहे हैं।

इस मामले में किसी जिम्मेदार अधिकारी या मंत्री का संपर्क सूत्र मांगने पर उन्होंने कोई भी जानकारी देने से इनकार कर दिया। चूंकि स्वास्थ्य शिक्षा विभाग के मंत्री खुद मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत हैं और उनसे बातचीत संभव नहीं हो पाया। हमने इस संबंध में राज्य के स्वास्थ्य शिक्षा विभाग के प्रमुख सचिव अमित नेगी से भी संपर्क करने की कोशिश की लेकिन उनका नंबर लगातार घंटी जाने के बावजूद नहीं उठा। इसके बाद हमने स्वास्थ्य शिक्षा विभाग के सचिव, निदेशक और मंत्रालय तीनों को एक ई-मेल भेजा लेकिन दो दिन बीत जाने के बाद भी हमें उस मेल का जवाब नहीं मिल सका है। स्वास्थ्य शिक्षा विभाग का जवाब आने पर स्टोरी को अपडेट किया जाएगा।

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