टिम्बर माफियाओं के खिलाफ मुहिम छेड़कर ओडिशा की महिलाओं ने बचाया अपना जंगल

ससी मौसी (67 वर्ष) की अगुवाई में ओडिशा की इन महिलाओं ने एक वन समिति बनाकर जंगलों को पुनर्जीवित करने का अभियान छेड़ा। इससे ना सिर्फ जंगल बचे बल्कि उन्हे आजीविका का भी एक साधन मिला।

टिम्बर माफियाओं के खिलाफ मुहिम छेड़कर ओडिशा की महिलाओं ने बचाया अपना जंगल

- प्रिय रंजन साहू

ओडिशा के नयागढ़ जिले के रानपुर ब्लॉक में दो तरफ से पहाड़ियों से घिरे एक छोटे से गांव डेंगाझारी में कोंध आदिवासियों के 21 और दलितों के 10 परिवार मिलाकर कुल 31 घर हैं।

1970 के दशक में टिम्बर माफियाओं द्वारा पेड़ों की अंधाधुंध कटाई की वजह से डेंगाझारी की पहाड़ियां लगभग बंजर हो गई थीं। इसका परिणाम यह हुआ कि पहाड़ी से वन्यजीव गायब हो गए, यहां से निकलने वाली चार जलधाराएं सूख गईं और खेत बंजर होने लगे।

परंपरागत रूप से, ये ग्रामीण इन पहाड़ियों पर बसे घने जंगलों पर निर्भर थे। लेकिन कम होते जंगल ने उनकी आजीविका को प्रभावित किया। इसलिए उन्होंने इसके खिलाफ अपनी लड़ाई शुरु की। ये पहाड़ियां 'साल' के पेड़ों से भरी हुई थीं, जिसके लकड़ी की बाजार में कीमत बहुत अधिक होती है।

लेकिन जैसे-जैसे पहाड़ियों पर कुछ हरियाली आने लगी, टिम्बर माफिया फिर से सक्रिय हो गए। 1980 के दशक के मध्य तक गाँव के पुरुषों को बाहरी लोगों और लकड़ी माफियाओं के साथ लगातार संघर्ष करना मुश्किल हो रहा था।


"घुसपैठियों के साथ हमारा कई मुठभेड़ हुआ। पेड़ों की कटाई का विरोध करने पर कई ग्रामीणों पर आपराधिक तत्वों द्वारा हमला किया गया। एक छोटे से गांव के निवासी के रूप में, हमारे पास उपद्रवियों से लड़ने के लिए पर्याप्त संसाधन नहीं थे। इन उपद्रवियों और टिम्बर माफियाओं को क्षेत्र के तमाम प्रभावशाली लोगों का समर्थन प्राप्त था, " गौरंगा प्रधान बताते हैं।

ऐसे समय में गांव की एक युवती ससी प्रधान ने वन संरक्षण का नेतृत्व अपने हाथ में लेने का फैसला किया। ससी ने जंगलों में किसी भी बाहरी घुसपैठ को बंद करने के लिए डेंगाझारी की अन्य महिलाओं को संगठित करके मां मणिनगा जंगला सुरक्ष्या समिति नाम का एक संगठन बनाया।

ससी ने इन महिलाओं के समूह से तीन-तीन सदस्यीय गश्ती दलों का गठन किया, जो रोटेशन प्रणाली के आधार पर हाथ में लाठी लिए जंगल का देखभाल करती थीं। उन्होंने इसे 'थेंगापाली' का नाम दिया। (थेंगा का मतलब लाठी और पाली का मतलब रोटेशन होता है।)

महिलाओं का घुसपैठियों के साथ कई टकराव हुए। घुसपैठियों ने गालियों और अपशब्दों के साथ महिलाओं को अपमानित करने और शर्मिंदा करने की कोशिश की। लेकिन ससी और उनकी टीम डंटी रही और अंततः वे लोग टिम्बर माफियाओं को अपने जंगल से भगाने में सफल रहें।


अब 67 साल की हो चली ससी उन दिनों को याद करते हुए मुस्कुरा देती हैं। वह कहती हैं, "जब भी उन्होंने हम पर हमला किया, हमने दोगुनी ताकत से उसका जवाब दिया। अंत में महिलाओं का धैर्य, दृढ़ता और साहस काम आया और उन्होंने लगभग असंभव काम को संभव करके दिखा दिया।"

अक्सर एक साधारण सूती साड़ी पहनने वाली ससी प्रधान, जिन्हें आस-पास के लोग ससी मौसी भी कहते हैं, अपने आस-पास के घने जंगल को देखकर बहुत खुश होती हैं। उन्हें इस बात की संतुष्टि है कि उनकी महिला ब्रिगेड ने अपने साहस से 1,500 एकड़ के घने जंगल को बचा लिया।

सैल का प्राकृतिक आवास होने के अलावा, डेंगाझारी के जंगल अन्य उष्णकटिबंधीय प्रजातियों जैसे कि मेहुल, आम, छत के लिए इस्तेमाल की जाने वाली एक विशेष घास की विविधता भी जंगलों में बहुतायत से बढ़ती है।

डेंगाझारी के इस जंगल में प्रमुख रुप से साल उगता है। लेकिन इसके अलावा यह जंगल कई उष्षकटिबंधीय पेड़ों आम, जामुन, कटहल, काजू, केंदू, बांस और कई प्रकार के औषधीय पेड़ों से भरा पड़ा है। इसके अलावा झोपड़ी बनाए जाने वाले एक विशेष घास से भी यह जंगल भरा पड़ा है। ग्रामीणों का कहना है कि वन विभाग के अधिकारी महिला समूह के कामकाज में हस्तक्षेप नहीं करते हैं क्योंकि उन्हें पता है कि जंगल सुरक्षित हाथों में हैं।

जैसे-जैसे जंगल फिर घने होते गए, सभी जलधाराओं में पानी फिर से वापस आ गया। 2006 में ग्रामीणों ने भुवनेश्वर स्थित एक गैर-लाभकारी संस्था 'वसुंधरा' की मदद से इस पानी को अपने धान के खेतों में प्रयोग किया। इस पानी से 100 एकड़ भूमि पर कम से कम एक फसल के लिए सिंचाई की जा सकती है। यहां पर धान के अलावा दाल और सब्जियां भी किसान उगाते हैं।

ग्रामीणों ने इस पानी को संग्रहित करने के लिए दो एकड़ का तालाब भी खोदा है। हाल ही में भुवनेश्वर स्थित गैर-लाभकारी संस्था 'माध्यम' और टाटा ट्रस्ट के सहयोग से ग्रामीणों ने शुद्ध पेयजल के लिए एक नई योजना शुरू की है। "यह सब ससी मौसी और उनकी महिला ब्रिगेड के प्रयासों के कारण संभव हो पाया है। इनकी वजह से डेंगाझारी का नाम राष्ट्रीय पटल पर भी उभरा है। गांव के पुरुष भी महिलाओं के इन प्रयासों में कदम से कदम मिला रहे हैं, " गांव के बालमुकुंद झारा कहते हैं।



जंगल के स्वाभाविक रुप से पुनर्जीवित होने से क्षेत्र में एक मजबूत पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण हुआ। 'वसुंधरा' के एक शोधकर्ता हेमंत साहू बताते हैं, "ससी के नेतृत्व में महिलाओं ने वृक्षारोपण के बजाय पेड़ों को फिर से जिंदा करने का प्रयास किया। हिरण, सूअर, मोर, बंदर और भालू सहित कई वन्यजीवों और कई प्रकार के पक्षियों को जंगल में वापस आने से डेंगाझारी का पारिस्थितिकी तंत्र और समृद्ध हुआ।"

जंगल और समृद्ध पारिस्थितिकी तंत्र ने लोगों को आजीविका प्रदान की। वन उपजों के संग्रहण से लोगों की आमदनी में कई गुना का ईजाफा हुआ। साल के पत्तों और काजू के संग्रहण से ग्रामीणों को एक बड़ी आजीविका मिली। वहीं कंद-मूल-फलों से ग्रामीणों की पोषक आवश्यकताएं भी समृद्ध हुईं। इसके अलावा ग्रामीणों के पास अपने व्यक्तिगत जमीनों पर भी काजू के पेड़ हैं, जिससे उन्हें लगभग 20,000 रुपये की वार्षिक आय प्राप्त होती है।

डेंगाझारी के प्रत्येक घर की महिलाएं 'मां मणिनागा जंगला सुरक्ष्या समिति' की सदस्य हैं। इस समिति की 12 कार्यकारी सदस्य भी हैं। महिलाओं ने खपरैल की छत वाले एक सुंदर झोपड़ी का निर्माण किया है, जो समिति का कार्यालय है। निशा प्रधान बताती हैं, "हम यहां नियमित रूप से वन संरक्षण की योजनाओं का निर्माण करने के लिए बैठकें करते हैं।"

महिला समिति की गतिविधियों का सभी खर्च समिति के एक कोष से आता है, जो समिति की सभी सदस्यों के योगदान से बनाया गया है। किसी भी समय इस कोष में लगभग 25,000 रुपये होते हैं। लेकिन महिलाओं के अनुसार, उन्हें बहुत कम ही इस कोष के धन की आवश्यकता होती है क्योंकि वे अपना जीविकोपार्जन स्वयं करने में सक्षम हो चुकी हैं।

हर साल ग्रामीण अपने घरों को जंगलों से प्राप्त सामग्री जैसे- लकड़ी, मिट्टी और घास से फिर से बनाते हैं। किसी को भी अपने घर की मरम्मत के लिए जंगल से सामग्री लाना है, तो उसे समिति की मंजूरी लेनी होती है।


संरक्षण गतिविधियों ने डेंगाझारी को एक चिरस्थायी स्थायी आर्थिक इकाई के रूप में बदल दिया है। ग्रामीणों ने गर्व के साथ कहा कि उन्हें जंगलों से अपने दैनिक जीवन के लिए लगभग हर चीज की आवश्यकता होती है, तेल और नमक जैसी वस्तुओं को छोड़कर। कुछ पड़ोसी गांवों के लोगों ने भी, इसे संरक्षित करने के लाभों को महसूस करने के बाद वनों की रक्षा के लिए मदद की।

डेंगाझारी के जंगलों में इन दिनों बहुत से घुसपैठिए नहीं हैं। लेकिन ससी और महिला वन समिति के लिए, कोई कसर नहीं छोड़ते और वे जंगलों में गश्त करते रहते हैं। ससी कहती है कि वह एक ब्रेक लेना चाहती है और युवा पीढ़ी के लिए बैटन पास करना चाहती है, लेकिन डेंगाझारी में महिलाएं इस बात पर जोर देती हैं कि वह उनकी नेता बनी रहे। "वह हमारी आशा और ममता का प्रतीक है। वह एक अच्छी आयोजक और मोबिलाइज़र है। हम उनके नेता नहीं होने के बारे में सोच भी नहीं सकते हैं, "छतनी जननी ने कहा, उनके 50 के दशक के मध्य की महिला।

दिलचस्प बात यह है कि महिला गश्ती टीमों को कभी भी किसी जंगली जानवर के हमलों का सामना नहीं करना पड़ा। ससी ने कहा: "जानवरों को अच्छी तरह पता है कि हम उनके रक्षक हैं, दुश्मन नहीं।"

वन संरक्षण की गतिविधियों ने डेंगाझारी को एक स्थायी आर्थिक इकाई के रूप में बदल कर रख दिया है। ग्रामीण बड़े गर्व के साथ कहते हैं कि तेल और नमक जैसी वस्तुओं को छोड़कर उन्हें दैनिक जीवन के लिए जरुरी लगभग हर सामान जंगल से उपलब्ध हो जाती है। कुछ पड़ोसी गांव के लोग भी जंगल के महत्व और लाभ को समझते हुए इसके संरक्षण के लिए आगे आए हैं।

डेंगाझारी के जंगल आजकल घुसपैठिओं से सुरक्षित हैं। लेकिन ससी मौसी और उनकी महिला वन समिति कभी भी जंगल की कश्ती और सुरक्षा में कोई कसर नहीं छोड़ते। ससी कहती है कि वह अब आराम चाहती हैं और युवा पीढ़ी को वन-संरक्षण का यह बैटन पास करना चाहती हैं। लेकिन डेंगाझारी की महिलाओं का इस बात पर जोर देती हैं कि ससी उनकी नेता बनी रहें। "वह हमारी आशा की प्रतीक हैं। हम उनके नेतृत्व के नहीं होने के बारे में सोच भी नहीं सकते हैं," छतनी जननी (50 वर्ष) कहती हैं।

दिलचस्प बात यह है कि महिला गश्ती टीम को कभी भी किसी जंगली जानवर के हमले का सामना नहीं करना पड़ा। ससी कहती हैं, "जंगल के जानवरों को अच्छी तरह पता है कि हम उनके रक्षक हैं, दुश्मन नहीं।"

(प्रिय रंजन साहू ओडिशा स्थित एक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

अनुवाद- दया सागर

इस रिपोर्ट को अंग्रेजी में यहां पढ़ें- Village women in Odisha fight timber mafia, reclaim lost forests

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