बीता आधा मानसून सीजन, क्या पूरा हो पाएगा सामान्य बारिश का पूर्वानुमान?

अभी तक सामान्य से 9 प्रतिशत कम बारिश। देश का 45 फीसदी हिस्सा सूखे से ग्रस्त। मौसम विभाग का अगस्त महीने में अच्छी बारिश का अनुमान।

Nidhi JamwalNidhi Jamwal   1 Aug 2019 1:21 PM GMT

बीता आधा मानसून सीजन, क्या पूरा हो पाएगा सामान्य बारिश का पूर्वानुमान?

आधिकारिक रूप से दक्षिण पश्चिम मानसून का आधा सीजन बीत चुका है। जहां जून महीने में सामान्य से 33 फीसदी कम बारिश हुई थी, वहीं जुलाई महीना समाप्त होते-होते यह आंकड़ा कम होकर -9 फीसदी पर आ गया। भारत के मौसम विज्ञान विभाग ने अगस्त महीने में अच्छी बारिश का पूर्वानुमान लगाया है। भू विज्ञान मंत्रालय के सचिव एम. राजीवन ने गांव कनेक्शन को बताया, "इस साल सामान्य बारिश होगी, जैसा कि हमने पूर्वानुमान भी लगाया था।"

भारत के मौसम विभाग के मुताबिक जुलाई महीने में अच्छी बारिश हुई। इस महीने भारत के 36 मौसम उपक्षेत्रों में से 19 उपक्षेत्रों में सामान्य बारिश हुई जबकि 14 उपक्षेत्रों में सामान्य से कम बारिश हुई, वहीं तीन ऐसे भी उपक्षेत्र रहे जहां पर सामान्य से अधिक बारिश हुई। ये उपक्षेत्र- कोंकण-गोवा, मध्य महाराष्ट्र और पूर्वी राजस्थान थे।


भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) के वरिष्ठ मौसम वैज्ञानिक और पूर्व महानिदेशक आर. आर. केलकर ने गांव कनेक्शन को बताया, "जून और जुलाई की तुलना करें तो निश्चित रूप से जुलाई महीने में अच्छी बारिश हुई। लेकिन कई ऐसे क्षेत्र भी हैं जहां पर बारिश बहुत कम हुई है, वहां पर खरीफ की फसल प्रभावित हुई है।"

आईआईटी के ड्रॉट मॉनीटर मैप के 28 जुलाई के आंकड़ों के अनुसार, भारत का 45 फीसदी हिस्सा अभी भी सूखे से ग्रस्त है।


एक ही राज्य में सामान्य से कहीं कम और कहीं अधिक बारिश

जुलाई महीने में पश्चिम महाराष्ट्र में भारी बारिश हुई। पुणे में सामान्य से 98 फीसदी अधिक बारिश हुई। वहीं मराठवाड़ा का आधा से अधिक इलाका सूखे से ग्रस्त है। मराठवाड़ा में सामान्य से काफी कम बारिश हुई है। हालांकि जुलाई महीने के आखिरी सप्ताह में इन क्षेत्रों में अच्छी बारिश हुई। इससे खरीफ के फसल की बुआई में देरी आई।

31 जुलाई तक, जब मानसून आधे से अधिक बीत चुका है, बीत, पारभानी, लातूर और नांदेड़ जिलों में सामान्य से क्रमशः 37, 35, 35 और 23 फीसदी कम बारिश हुई है। लेकिन महाराष्ट्र के कई हिस्सों में अच्छी बारिश हुई इसलिए यह राज्य सामान्य मानसूनी बारिश वाला राज्य बन गया।

भू विज्ञान मंत्रालय के सचिव एम. राजीवन के अनुसार इस साल सामान्य बारिश होगी। "दक्षिण भारत के जिन क्षेत्रों में कम बारिश हुई है, वहां अगस्त और सितंबर महीने में अच्छी बारिश होगी। हालांकि तीन या चार उपक्षेत्र ऐसे होंगे, जहां पर सामान्य से कम बारिश होगी। यह हर साल होता है, जब तीन या चार उपक्षेत्रों में सामान्य से कम बारिश होती है।", राजीवन गांव कनेक्शन को बताते हैं।


'स्काईमेट वेदर' के कम बारिश का अनुमान

हालांकि निजी मौसम एजेंसी 'स्काईमेट वेदर' के अनुसार इस साल 93 फीसदी बारिश के साथ सामान्य से कम बारिश होगी। स्काईमेट वेदर के संस्थापक और निदेशक जतिन सिंह ने गांव कनेक्शन को बताया, "भले ही अगस्त-सितंबर में अच्छी बारिश का अनुमान लगाया गया है, लेकिन हम अपने सामान्य से कम बारिश के पूर्वानुमान पर कायम रहेंगे।"

"अगस्त का महीना काफी महत्वपूर्ण होता है क्योंकि इस महीने में पूरे मानसून का 33 प्रतिशत बारिश होता है। लेकिन हमारे पूर्वानुमान के अनुसार इस साल 10 अगस्त के बाद काफी कम बारिश होगी। इसलिए हम सामान्य से कम बारिश के अपने पूर्वानुमान पर टिके हुए हैं।", जतिन सिंह आगे कहते हैं।

वहीं आईआईटी मुंबई में क्लाइमेट स्टडीज विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर श्रीधर बालासुब्रमण्यम 'स्काइमेट वेदर' के अनुमान को खारिज करते हैं। उनके अनुसार इस साल मानसून सामान्य रहेगा।

"दक्षिण-पश्चिमी मानसून जुलाई महीने में बहुत सक्रिय रहता है। इसके अलावा अल-नीनो के प्रभाव में कमी और इंडियन ओसियन डायपोल (आईओडी) में बढ़त भी अगस्त में अच्छी बारिश में सहायक रहेगी। इसलिए हम इस साल सामान्य बारिश का अनुमान कर रहे हैं। इसके अलावा अगस्त के पहले पखवाड़े में मैडेन-जूलियन ऑसीलेशन (एमजेओ) का प्रभाव भी सामान्य बारिश में उपयोगी रहेगा।", बालासुब्रमण्यम बताते हैं।


जुलाई में औसत से अधिक बारिश

इस साल मानसून एक जून के बजाय आठ जून को केरल के तट पर पहुंचा। 'वायु' साइक्लोन से भी मानसून में देरी हुई। मुंबई, जहां पर सामान्यतया 10 जून तक मानसून पहुंच जाता है, वहां 25 जून तक मानसून पहुंचा। लेकिन मानसून में दो हफ्ते की देरी के बावजूद मुंबई और आस-पास के इलाकों में भारी बारिश हुई। 31 जुलाई के आंकड़ों के अनुसार मुंबई में 1979.9 मिलीमीटर बारिश हुई जो कि औसत सलाना बारिश का 86 प्रतिशत है।

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस के 2 जुलाई के बयान के अनुसार मुंबई में सिर्फ तीन दिन में ही 550 मिलीमीटर बारिश हुई जो कि पूरे जून महीने में होने वाली औसत बारिश है। इसी तरह जुलाई में भी औसत से अधिक बारिश हुई। जुलाई के औसतन 799 मिलीमीटर के मुकाबले सान्ताक्रूज मुंबई में 1464.8 मिलीमीटर बारिश हुई, जो कि 1959 के बाद दूसरी सबसे अधिक बारिश का रिकॉर्ड है। जुलाई महीने में सर्वाधिक बारिश 2014 में हुई थी जब शहर ने 1468.5 मिलीमीटर का बाढ़ झेला था।

इसी तरह पूर्वोत्तर राज्यों में भी जुलाई महीने में औसत से अधिक बारिश देखी गई। यही राज्य जुलाई के शुरूआत में सूखे का सामना कर रहे थे। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग के डाटा के अनुसार पूर्वोत्तर राज्यों में 11 जुलाई से 17 जुलाई के बीच 90.1 मिलीमीटर बारिश हुई। जबकि इस दौरान सिर्फ त्रिपुरा में 317.9 मिलीमीटर बारिश हुई जो कि औसत से 253 प्रतिशत अधिक था।

इसी तरह मिजोरम, सिक्किम, मेघालय, अरूणाचल प्रदेश और असम में क्रमशः 158 प्रतिशत, 125 प्रतिशत, 111 प्रतिशत, 105 प्रतिशत और 76 प्रतिशत अधिक बारिश हुई। इसकी वजह से क्षेत्र में बाढ़ आया। जुलाई के दूसरे पखवाड़े में लगभग इसी समय उत्तरी बिहार में भी बाढ़ आई, जहां पर 88 लाख से अधिक लोग प्रभावित हुए और 130 की जान गई।

इस बीच 31 जुलाई को गुजरात के बड़ोदरा में 12 घंटों में 554 मिलीमीटर की बारिश हुई, जो कि इससे पहले 43 फीसदी मानसूनी बारिश की कमी से जूझ रहा था। यह बड़ोदरा में 12 घंटों में हुई बारिश का नया रिकॉर्ड था। अब यह शहर बाढ़ से जूझ रहा है और एनडीआरएफ की टीमें वहां भेज दी गई हैं।


कहीं बाढ़, कहीं सूखा

हालांकि जब देश के कुछ हिस्से बाढ़ से प्रभावित हैं, देश का एक बड़ा हिस्सा ऐसा भी है जो सूखे की मार झेल रहा है। 31 जुलाई तक के आंकड़ों के अनुसार महाराष्ट्र के मराठवाड़ा में 25 फीसदी से कम बारिश हुई है। अगस्त, 2018 में जहां केरल में बाढ़ आई थी, वह अब 32 फीसदी कम बारिश के साथ सूखा झेल रहा है। पिछले साल सूखा झेलने वाला झारखंड में इस बार भी 36 फीसदी कम बारिश हुई है।

खरीफ की फसल प्रभावित

देर से मानसून और देश के कुछ हिस्सों में बारिश कम होने से खरीफ की फसल भी प्रभावित हुई है। हालांकि जुलाई के दूसरे पखवाड़े में अधिक बारिश के कारण किसानों को कुछ राहत मिली है। मराठवाड़ा, विदर्भ और झारखंड के कुछ हिस्सों में जहां पर किसान बारिश की राह देख रहे थे, उन्होंने अब बुआई चालू कर दी है।

भारत के कृषि विभाग के अनुसार 26 जुलाई तक देश के 185.14 लाख हेक्टेयर भूमि पर धान की बुआई हुई, जो कि पिछले साल के 275.71 लाख हेक्टेयर भूमि से 14 प्रतिशत कम है। ठीक इसी तरह दाल की बुआई वाले कृषि क्षेत्र में 10 फीसदी की कमी आई है। इसी तरह दलहन की बुआई वाले क्षेत्रों में भी कमी आई है।

महाराष्ट्र में जहां सामान्यतया 17.529 लाख हेक्टेयर भूमि पर दलहन की खेती होती थी, वहीं इस साल सिर्फ 15.855 लाख हेक्टेयर भूमि पर ही दलहन की खेती हुई है। महाराष्ट्र के लातूर के सोनवती गांव के किसान संदीपन बदगिरे कहते हैं कि हालांकि अब बुआई हो चुकी है लेकिन बुआई में देरी की वजह से किसानों को जरूर कुछ नुकसान होगा।


आईआईटी मुंबई में क्लाइमेट स्टडीज विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर श्रीधर बालासुब्रमण्यम कहते हैं, "सामान्य बारिश वाले साल में भी कई जगहों पर सूखे जैसी स्थिति होती है। इस साल तो केरल, तमिलनाडु, गुजरात और उत्तर भारत के कुछ राज्यों में सामान्य से कम बारिश हुई है। इसलिए सूखे की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।"

स्काईमेट वेदर के संस्थापक और निदेशक जतिन सिंह के अनुसार पिछले एक दशक में सामान्य से अधिक बारिश सिर्फ 2016 में हुई थी। तब से मानसूनी बारिश की हालत खराब ही रही है, इसलिए देश का एक बड़ा हिस्सा सूखे से ग्रसित रहता है। जतिन सिंह कहते हैं, "सरकार को जलविज्ञान संबंधी एक मजबूत प्रणाली अक्टूबर तक जरूर विकसित कर लेनी चाहिए ताकि अगले साल की गर्मी में पानी का संकट ना उत्पन्न हो।"

पिछले साल से सूखे की समस्या से जूझ रहे महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे राज्य कृत्रिम रूप से बादल बनाकर बारिश कराने के प्रयोग में लगे हैं। इस बारे में श्रीधर बालासुब्रमण्यम का अलग मत है। वह कहते हैं, "कृत्रिम विधि से बारिश कराना सूखे जैसी समस्या का हल नहीं है। यह प्रयोग में बहुत महंगा है। इसके बदले सरकारों को रेनवाटर हार्वेस्टिंग, झीलों और तालाबों के पुनर्निर्माण पर जोर देना चाहिए।"

वहीं भू विज्ञान मंत्रालय के सचिव एम. राजीवन किसी भी तरह के जल संकट की समस्या से इनकार करते हैं। वह कहते हैं, "इस साल बारिश अच्छी होगी। सरकार को भी ऐसे किसी भी तरह के संकट से निपटने के सुझाव दिए जा चुके हैं। इसके अलावा थोड़ी सी देरी से शुरू होने के बावजूद भी खरीफ फसल की बुआई अब पटरी पर आ गई है। डैम में भी जलस्तर ऊंचा हो रहा है। इसलिए किसी भी तरह के संकट से हम निपटने के लिए तैयार हैं।"

कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि अगस्त और सितंबर का महीना काफी महत्वपूर्ण है। इन दो महीनों में होने वाली मानसूनी बारिश ही देश में खेती और जल संसाधनों के संकट की दशा-दिशा तय करेगी।

(अनुवाद- दया सागर)

इस स्टोरी को अंग्रेजी में यहां पढ़ें- Half the monsoon season is over with pockets of floods and regions of drought. Will it be a 'normal' monsoon year?

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