जलवायु संकट का साल 2025: दुनिया भर में बाढ़, आग, सूखा और उजड़ती ज़िंदगियाँ
Seema Javed | Jan 05, 2026, 13:08 IST
रिपोर्ट यह भी दिखाती है कि आर्थिक नुकसान का बोझ अमीर देशों में ज़्यादा दिखाई देता है, क्योंकि वहां बीमा और संपत्ति का दायरा बड़ा है। लेकिन असल पीड़ा गरीब देशों में है, जहां लोग सब कुछ खो देते हैं और फिर भी आंकड़ों में उनकी तकलीफ पूरी तरह दर्ज नहीं हो पाती।
साल 2025 दुनिया के लिए सिर्फ़ एक और कैलेंडर वर्ष नहीं था। यह साल उन लाखों लोगों की यादों में दर्ज हो गया, जिनके घर बाढ़ में बह गए, जिनकी फसलें सूखे में जल गईं, और जिनके अपने किसी तूफ़ान, आग या गर्मी की लहर में हमेशा के लिए खो गए। कहीं बारिश ने सब कुछ डुबो दिया, तो कहीं महीनों तक एक बूंद पानी नहीं गिरा। कहीं जंगलों में आग ने बस्तियाँ राख कर दीं, तो कहीं समुद्र इतना गरम हो गया कि तूफ़ान रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे।
Christian Aid की रिपोर्ट Counting the Cost 2025 बताती है कि 2025 दुनिया के सबसे महंगे और विनाशकारी जलवायु वर्षों में से एक रहा। लेकिन इस “महंगे” शब्द का मतलब सिर्फ़ अरबों-खरबों डॉलर नहीं है। इसकी असली कीमत चुकाई है आम लोगों ने। अमेरिका के लॉस एंजेलिस में लगी आग ने पूरे-पूरे मोहल्ले मिटा दिए। कई परिवार ऐसे थे जिनके पास बीमा तक नहीं था। घर जला तो साथ में ज़िंदगी की सारी जमा-पूँजी भी राख हो गई।
इम्पीरियल कॉलेज लंदन की प्रोफेसर जोआना हेग के शब्दों में, “ये घटनाएं किसी अनहोनी का नतीजा नहीं, बल्कि उस रास्ते का परिणाम हैं जिसे हमने खुद चुना है। जब तक उत्सर्जन घटाने और अनुकूलन पर गंभीरता से काम नहीं होगा, तब तक यह तबाही बढ़ती ही जाएगी।”
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भारत और पाकिस्तान में मानसून की बारिश इतनी ज़्यादा थी कि नदियाँ गाँवों और शहरों के बीच का फर्क ही मिटा ले गईं। हज़ारों लोग बेघर हो गए, खेतों में खड़ी फसल बह गई, और जिनकी आजीविका ज़मीन से जुड़ी थी, उनके सामने पेट भरने का संकट खड़ा हो गया। ब्राज़ील में सूखे ने आदिवासी और ग्रामीण समुदायों को पीने के पानी के लिए भी जूझने पर मजबूर कर दिया। नदियाँ सिकुड़ गईं, कुएँ सूख गए और खेती ठप पड़ गई। फिलीपींस में एक के बाद एक आए तूफ़ानों ने लोगों को संभलने का मौका ही नहीं दिया। एक तूफ़ान गया नहीं कि दूसरा आ गया।
इस जलवायु तबाही का सबसे बड़ा बोझ उन लोगों ने उठाया, जिनका इस संकट को पैदा करने में लगभग कोई योगदान नहीं था, छोटे किसान, मछुआरे, दिहाड़ी मज़दूर, आदिवासी समुदाय, महिलाएँ और बच्चे। अमीर देशों में नुकसान का कुछ हिस्सा बीमा से कवर हो जाता है, लेकिन गरीब देशों में जब आपदा आती है तो लोग सब कुछ अपनी जेब और अपनी ज़िंदगी से चुकाते हैं। कई बार नुकसान का सही हिसाब तक नहीं लग पाता, क्योंकि टूटी ज़िंदगियों का कोई बीमा नहीं होता।
Christian Aid के सीईओ पैट्रिक वॉट कहते हैं कि जलवायु संकट अब भविष्य की चेतावनी नहीं, बल्कि आज की सच्चाई है। उनके मुताबिक, “यह पीड़ा एक राजनीतिक विकल्प का नतीजा है। अगर सरकारें अब भी जीवाश्म ईंधन से दूरी नहीं बनातीं और जलवायु वित्त पर अपने वादे पूरे नहीं करतीं, तो इसकी कीमत सबसे कमजोर लोगों को चुकानी पड़ेगी।”
जून से सितंबर 2025 के बीच भारत और पाकिस्तान के बड़े हिस्सों में असाधारण रूप से भारी मानसून देखने को मिला, जिसकी शुरुआत सामान्य से पहले ही हो गई और जिसने खासकर पहाड़ी इलाकों में घातक बाढ़, भूस्खलन, बादल फटने और अचानक आने वाली बाढ़ (फ्लैश फ्लड) की घटनाओं को जन्म दिया। पूरे क्षेत्र में नदियाँ उफान पर रहीं, खेत जलमग्न हो गए, ग्लेशियरों के पिघलने से बाढ़ और तेज़ हुई और हज़ारों कस्बे व गाँव पानी में डूब गए। अनेक समुदायों को अपने घर छोड़ने पड़े और मानवीय नुकसान बेहद गंभीर रहा- कम से कम 1,860 लोगों की मौत दर्ज की गई, जबकि कुछ क्षेत्रों के लिए यह मानसून हाल के वर्षों का सबसे जानलेवा साबित हुआ। अकेले पाकिस्तान में ही मानसूनी बारिश, ग्लेशियल फ्लड और नदीय बाढ़ ने 1,000 से अधिक लोगों की जान ली, 12,500 घर क्षतिग्रस्त किए, 240 पुल बहा दिए और कम से कम 6,500 पशुधन की मौत हुई; करीब 70 लाख लोग सीधे तौर पर प्रभावित हुए।
उधर भारत में मानसून का आग़ाज़ रिकॉर्ड के सबसे भीगे मई महीने के साथ हुआ और सितंबर तक देश में औसत से 8% अधिक वर्षा दर्ज की गई, इस दौरान 2,277 बाढ़ और भारी बारिश की घटनाएँ रिपोर्ट हुईं। लगातार और तीव्र बारिश ने खेती और ढाँचागत सुविधाओं को भारी नुकसान पहुँचाया-सीज़न के अंत तक भारत का कृषि क्षेत्र, जो अर्थव्यवस्था का लगभग 18% और करीब 1.4 अरब लोगों की आय का आधार है, उत्पादन में गिरावट से जूझता दिखा। पाकिस्तान में 13 लाख एकड़ फसल डूब गई, केवल कृषि में ही अनुमानित 1.4 अरब अमेरिकी डॉलर का नुकसान हुआ और 600 किलोमीटर से अधिक सड़कें क्षतिग्रस्त हुईं। कुल मिलाकर इस मानसून का संयुक्त आर्थिक नुकसान लगभग 3 अरब अमेरिकी डॉलर आंका गया।
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वैज्ञानिकों के अनुसार, गरम होते महासागर और वातावरण वाष्पीकरण को तेज़ करते हैं, हवा में नमी बढ़ाते हैं और अधिक तीव्र वर्षा को बढ़ावा देते हैं; साथ ही ये स्थितियाँ ग्लेशियर और पर्माफ्रॉस्ट के पिघलने को बढ़ाकर बाढ़ व भूस्खलन का जोखिम और बढ़ाती हैं। अध्ययनों ने मानसून की बढ़ती चरम तीव्रता को मानव-जनित जलवायु परिवर्तन से जोड़ा है। अनुमान है कि तापमान में हर 1 डिग्री सेल्सियस वृद्धि पर मानसूनी वर्षा लगभग 5% तक बढ़ सकती है; हालिया एट्रिब्यूशन अध्ययन के मुताबिक पाकिस्तान में 2025 की भारी मानसूनी बारिश जलवायु परिवर्तन के कारण करीब 12% अधिक तीव्र थी, जितनी वह बिना जलवायु परिवर्तन वाली दुनिया में होती।
साल 2025 दुनिया भर में जलवायु आपदाओं के लिहाज़ से असाधारण रूप से विनाशकारी और महंगा साबित हुआ। “Most expensive climate disasters of 2025” की सूची बताती है कि जनवरी में अमेरिका के लॉस एंजेलिस क्षेत्र में लगी Palisades और Eaton Fires ने 60 अरब डॉलर से अधिक का नुकसान किया और सैकड़ों जानें लीं। नवंबर में दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया में आए चक्रवातों और अत्यधिक मानसूनी बारिश ने थाईलैंड, इंडोनेशिया, श्रीलंका, वियतनाम और मलेशिया में भारी तबाही मचाई, जहाँ 1,750 से अधिक लोगों की मौत हुई और लगभग 25 अरब डॉलर का आर्थिक नुकसान हुआ।
जून से अगस्त के बीच चीन में भीषण बारिश और बाढ़ से 11.7 अरब डॉलर का नुकसान दर्ज किया गया। इसी साल हुरिकेन मेलिसा ने जमैका, क्यूबा और बहामास को झकझोर दिया, जिसका अनुमानित नुकसान करीब 8 अरब डॉलर रहा। सबसे गहरी मानवीय त्रासदियों में से एक जून से सितंबर के बीच भारत और पाकिस्तान में आई मानसूनी बाढ़ रही, जिसमें 1,860 से अधिक लोगों की जान गई और लगभग 5.6 अरब डॉलर का नुकसान हुआ। इसके अलावा फिलीपींस में लगातार आए तूफ़ानों से सैकड़ों मौतें हुईं, ब्राज़ील में लंबे सूखे से अरबों डॉलर की क्षति हुई, ऑस्ट्रेलिया में Ex-Tropical Cyclone Alfred, रीयूनियन द्वीप में Cyclone Garance और अमेरिका के टेक्सास में अचानक आई बाढ़ ने भी भारी जान–माल का नुकसान किया। यह पूरी सूची साफ़ दिखाती है कि 2025 में जलवायु संकट ने हर महाद्वीप को छुआ, लेकिन सबसे बड़ी कीमत इंसानी ज़िंदगियों और आजीविकाओं ने चुकाई।
रिपोर्ट साफ़ कहती है कि 2025 में जो कुछ हुआ, वह सिर्फ़ प्रकृति की मार नहीं थी। यह उस विकास मॉडल का नतीजा है, जो अब भी कोयला, तेल और गैस पर टिका है। वैज्ञानिक अब यह तक बता पा रहे हैं कि जलवायु परिवर्तन ने बारिश को कितना ज़्यादा तीव्र बनाया, तूफ़ानों को कितना ताक़तवर किया और गर्मी को कितना जानलेवा। यानी यह संकट अचानक नहीं आया। इसे इंसानी फैसलों ने और गहरा किया है।
2025 ने यह साफ़ कर दिया कि अगर दुनिया ने अब भी दिशा नहीं बदली, तो आने वाले साल और भी कठिन होंगे। लेकिन रिपोर्ट यह भी कहती है कि उम्मीद अभी बाकी है कि स्वच्छ ऊर्जा सस्ती हो रही है, लोग जलवायु कार्रवाई के समर्थन में हैं और कई समुदाय अपने स्तर पर बदलाव की कोशिश कर रहे हैं
ज़रूरत है कि अमीर देश ज़िम्मेदारी लें, गरीब देशों को जलवायु से निपटने के लिए संसाधन दें, और “नुकसान व क्षति” (Loss and Damage) के लिए बनाए गए फंड को सच में मज़बूत करें। 2025 हमें यह याद दिलाकर गया कि जलवायु संकट कोई भविष्य की कहानी नहीं है। यह आज, इसी समय, लोगों की ज़िंदगी को तोड़ रहा है। हर बहा हुआ घर, हर सूखी फसल और हर खोई हुई जान एक सवाल पूछती है क्या हम अब भी इंतज़ार करेंगे, या समय रहते सही फैसले लेंगे? क्योंकि जलवायु संकट की कीमत सिर्फ़ पैसों में नहीं, इंसानों की ज़िंदगी में चुकाई जा रही है।
(डॉ. सीमा जावेद पर्यावरणविद और कम्युनिकेशन विशेषज्ञ हैं)
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आँकड़ों के पीछे छिपी इंसानी कहानियाँ
इम्पीरियल कॉलेज लंदन की प्रोफेसर जोआना हेग के शब्दों में, “ये घटनाएं किसी अनहोनी का नतीजा नहीं, बल्कि उस रास्ते का परिणाम हैं जिसे हमने खुद चुना है। जब तक उत्सर्जन घटाने और अनुकूलन पर गंभीरता से काम नहीं होगा, तब तक यह तबाही बढ़ती ही जाएगी।”
ये भी पढ़ें: बाढ़ का बदला स्वरूप: क्यों कुछ राज्यों में धान अब पहले से ज़्यादा सुरक्षित दिख रहा है
भारत और पाकिस्तान में मानसून की बारिश इतनी ज़्यादा थी कि नदियाँ गाँवों और शहरों के बीच का फर्क ही मिटा ले गईं। हज़ारों लोग बेघर हो गए, खेतों में खड़ी फसल बह गई, और जिनकी आजीविका ज़मीन से जुड़ी थी, उनके सामने पेट भरने का संकट खड़ा हो गया। ब्राज़ील में सूखे ने आदिवासी और ग्रामीण समुदायों को पीने के पानी के लिए भी जूझने पर मजबूर कर दिया। नदियाँ सिकुड़ गईं, कुएँ सूख गए और खेती ठप पड़ गई। फिलीपींस में एक के बाद एक आए तूफ़ानों ने लोगों को संभलने का मौका ही नहीं दिया। एक तूफ़ान गया नहीं कि दूसरा आ गया।
सबसे ज़्यादा मार किस पर पड़ी?
Christian Aid के सीईओ पैट्रिक वॉट कहते हैं कि जलवायु संकट अब भविष्य की चेतावनी नहीं, बल्कि आज की सच्चाई है। उनके मुताबिक, “यह पीड़ा एक राजनीतिक विकल्प का नतीजा है। अगर सरकारें अब भी जीवाश्म ईंधन से दूरी नहीं बनातीं और जलवायु वित्त पर अपने वादे पूरे नहीं करतीं, तो इसकी कीमत सबसे कमजोर लोगों को चुकानी पड़ेगी।”
भारत-पाकिस्तान में बाढ़ की तबाही
एक जून से सितंबर के बीच भारत और पाकिस्तान में आई मानसूनी बाढ़ रही, जिसमें 1,860 से अधिक लोगों की जान गई और लगभग 5.6 अरब डॉलर का नुकसान हुआ।
ये भी पढ़ें: जलवायु परिवर्तन की नई मार: जब पराग एलर्जी और वायु प्रदूषण बन गए स्वास्थ्य का सबसे बड़ा खतरा
वैज्ञानिकों के अनुसार, गरम होते महासागर और वातावरण वाष्पीकरण को तेज़ करते हैं, हवा में नमी बढ़ाते हैं और अधिक तीव्र वर्षा को बढ़ावा देते हैं; साथ ही ये स्थितियाँ ग्लेशियर और पर्माफ्रॉस्ट के पिघलने को बढ़ाकर बाढ़ व भूस्खलन का जोखिम और बढ़ाती हैं। अध्ययनों ने मानसून की बढ़ती चरम तीव्रता को मानव-जनित जलवायु परिवर्तन से जोड़ा है। अनुमान है कि तापमान में हर 1 डिग्री सेल्सियस वृद्धि पर मानसूनी वर्षा लगभग 5% तक बढ़ सकती है; हालिया एट्रिब्यूशन अध्ययन के मुताबिक पाकिस्तान में 2025 की भारी मानसूनी बारिश जलवायु परिवर्तन के कारण करीब 12% अधिक तीव्र थी, जितनी वह बिना जलवायु परिवर्तन वाली दुनिया में होती।
कहाँ हुआ कितना नुकसान?
अमेरिका के लॉस एंजेलिस में लगी भीषण जंगल की आग ने पूरे-पूरे मोहल्ले निगल लिए।
जून से अगस्त के बीच चीन में भीषण बारिश और बाढ़ से 11.7 अरब डॉलर का नुकसान दर्ज किया गया। इसी साल हुरिकेन मेलिसा ने जमैका, क्यूबा और बहामास को झकझोर दिया, जिसका अनुमानित नुकसान करीब 8 अरब डॉलर रहा। सबसे गहरी मानवीय त्रासदियों में से एक जून से सितंबर के बीच भारत और पाकिस्तान में आई मानसूनी बाढ़ रही, जिसमें 1,860 से अधिक लोगों की जान गई और लगभग 5.6 अरब डॉलर का नुकसान हुआ। इसके अलावा फिलीपींस में लगातार आए तूफ़ानों से सैकड़ों मौतें हुईं, ब्राज़ील में लंबे सूखे से अरबों डॉलर की क्षति हुई, ऑस्ट्रेलिया में Ex-Tropical Cyclone Alfred, रीयूनियन द्वीप में Cyclone Garance और अमेरिका के टेक्सास में अचानक आई बाढ़ ने भी भारी जान–माल का नुकसान किया। यह पूरी सूची साफ़ दिखाती है कि 2025 में जलवायु संकट ने हर महाद्वीप को छुआ, लेकिन सबसे बड़ी कीमत इंसानी ज़िंदगियों और आजीविकाओं ने चुकाई।
यह सिर्फ़ ‘प्राकृतिक आपदा’ नहीं है
हर आपदा एक चेतावनी है
ज़रूरत है कि अमीर देश ज़िम्मेदारी लें, गरीब देशों को जलवायु से निपटने के लिए संसाधन दें, और “नुकसान व क्षति” (Loss and Damage) के लिए बनाए गए फंड को सच में मज़बूत करें। 2025 हमें यह याद दिलाकर गया कि जलवायु संकट कोई भविष्य की कहानी नहीं है। यह आज, इसी समय, लोगों की ज़िंदगी को तोड़ रहा है। हर बहा हुआ घर, हर सूखी फसल और हर खोई हुई जान एक सवाल पूछती है क्या हम अब भी इंतज़ार करेंगे, या समय रहते सही फैसले लेंगे? क्योंकि जलवायु संकट की कीमत सिर्फ़ पैसों में नहीं, इंसानों की ज़िंदगी में चुकाई जा रही है।
(डॉ. सीमा जावेद पर्यावरणविद और कम्युनिकेशन विशेषज्ञ हैं)
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